जीवन की पहली सीख by राजन

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जीवन की पहली सीख

राजन,शिक्षक,अमृतसर

वैसे तो हर बीता हुआ पल, हर क्षण हमें कोई न सीख देकर ही जाता है और हमें सीख लेनी भी चाहिए। मैं तो हर क्षण को आनंद से जीने की चाह रखता हूँ और कुछ न कुछ सीखने का प्रयास करता हूँ। वैसे तो जब से होश संभाला है, तब से जीवन में सीख ही रहा हूँ और शायद जब तक शरीर में प्राण रहेंगे, तब तक सीखता ही रहूँगा। पर यहां बात चल रही है *जीवन की पहली सीख* की। तो पहली सीख ही आपसे सांझा करूंगा।

बात कक्षा दशम की है। मैं आरम्भ से सह शिक्षालय में ही रहा। मेरी कक्षा में मेरी एक मित्र *योगिता मग्गू* मेरे साथ ही बैठती और हम शिक्षा संबंधी समस्याओं के बारे विचार चर्चा करते रहते। पढ़ाई में वह बहुत अच्छी थी। हमेशा द्वितीय स्थान पर रहती लेकिन हमेशा मेरा प्रथम स्थान हासिल करता चाहती थी। दसवीं बोर्ड की परीक्षाओं के पश्चात अचानक एक दिन मुझे पता कि उसका देहांत हो गया है। मेरे पांव तले से जमीन निकल गई। इतनी होशियार और मां बाप की इकलौती पुत्री को क्या हो गया? शाम को खबर मिली थी और तब तक उसका दाह संस्कार भी हो चुका था। पूरी रात इसी सोच में कट गई कि कब सुबह हो और मैं उसके घर पहुंच जाऊं। सुबह मैं और मेरे दो मित्र योगिता के घर पहुंच गयें। उसके मां बाप का विलाप आज भी याद करके रोंगटे खड़े कर देता है। हमारा भी रोना बंद न हो रहा था। लेकिन मैंने हिम्मत करके पूछ ही लिया कि योगिता को हुआ क्या था?
उसके पापा ने कहा कि उसकी मौत का कारण मैं हूँ। उन्होंने बताया कि वो उस रात इसी जिद्द पर अड़ी थी कि आज छत पर सोना है और उसके पिता जी ने छत पर सोने को मना कर दिया। जिद्द करते रहने पर पापा ने एक थप्पड़ मार दिया और गुस्से में आकर योगिता ने अपने ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली। जब आग ज्यादा हो गई तो अपने आप को बचाने के लिए वह बाहर की और दौड़ी। हवा की वजह से आग और भड़क गई और वह नब्बे प्रतिशत जल गई। अस्पताल लेजाया गया परंतु वह बच न सकी। लेकिन उसके अंतिम शब्द ये ही थे कि मुझे माफ करना पापा, मैंने गुस्से में यह सब कर लिया।
मेरे बहुत से मित्र, जान पहचान वाले और घर वाले भी मुझे अक्सर पूछते हैं कि *राजन* तुम हमेशा हंसते रहते हो, कभी गुस्सा नहीं करते। यही कारण है कि मैं गुस्से को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता। उस त्रासदी से यही सीख मिली कि झट से गुस्से में आकर कोई ऐसा कदम न उठा लिया जाए कि बाद में पछतावे के लिए भी समय न मिले। योगिता के पापा ने उसे गुस्से में आकर थप्पड़ न मारा होता और योगिता ने गुस्से में वो कदम न उठाया होता तो शायद वो आज हमारे बीच होती।
अतः विपरीत परिस्थितियों में कभी हौंसला न हारिये, धैर्य बनाए रखिए तथा गुस्से से हमेशा दूर रहिए, यही मेरी आप सबसे गुजारिश है

*🌱राजन⚽*

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