भावुक हृदय by Dr Purnima Rai

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टूटता तारा
ढुलका आँसू
बिखरे पत्ते
गर्म हवायें
ठहरा पानी
संकुचित सोच
बुझा हुआ दीपक
खोया विश्वास
झूले की हिलोर सी
झूठी आस
माला के मोतियों को
गाँठ में से निकालने को
प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रतीक्षारत
पदार्थवादी समाज में
सिक्कों की खनक में
प्यार स्नेह को ढूँढता
भावुक हृदय!!
अकेले मदमाते दीप की तरह
बंद कुएँ के गहनतम गर्त में
छटपटाहट,तड़प ,बेचैनी
घुटन की दलदल में
कभी बना राख का ढेर
और कभी धूल जमी हुई
बन गया समाधि !!

डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर
17/5/17

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