अनकहे जज्बात–1

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रवानी (संस्मरण)

मैं बहनों में सबसे छोटी और मम्मी-पापा की लाडली थी।मेरी बात मानकर मम्मी-पापा ने मुझे बड़ी बहनों के साथ अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल से हटवा कर हिन्दी माध्यम स्कूल में भर्ती करवा दिया।तब मैं प्रथम श्रेणी में थी।परीक्षा के दिन थे। परीक्षा का अर्थ क्या होता है ,मैं नहीं जानती थी। स्कूल में प्रथम कक्षा की परीक्षा का नतीज़ा सुनकर मैं बहनों के पीछे-पीछे मज़े से पैदल चलते-चलते अपनी धुन में गुनगुना रही थी,बार बार रटंत लगा रही थी कहीं घर पहुँचते-पहुँचते कहीं भूल न जाऊँ।मम्मी -पापा हम सब की प्रतीक्षा कर रहे थे।बड़ी बहनों ने बारी-बारी झट से कहा–पापा मैं,पास हो गई हूँ।इसी बीच मैंने उछलते ताली बजाकर कहा–मैं फेल हो गई।सभी हँसने लगे।बुद्धु कहीं की,फेल होने पर खुश हो रही है।पापा ने सबको चुप कराया।मुझे पास बिठाकर बोले–,फेल का मतलब है –खिलौना टूट गया।कुछ खो जाना।कान खोल कर सुन लो तुम सभी !आगे से जहाँ किसी की ब्रेक लग गई ,उसकी पढ़ाई बन्द!इतने पैसे नहीं हैं कि एक कक्षा दो बार करवाई जाये। बस यही बात ,मम्मी-पापा की दी गई शिक्षा मेरे दिलोदिमाग पर इस तरह अपना प्रभाव छोड़ गई कि बस तब से लेकर आज तक रवानी बनी हुई है ।

डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर

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