काश!तुम आ जाओ by अपर्णा संत सिंह

0
301

नाम -अर्पणा संत सिंह

माता का नाम- सविता सिंह
पिता का नाम – संत लाल सिंह
पति/पत्नि का नाम -डॉ.राजेश कुमार सिंह

जन्मतिथि -22/08/78
जन्म स्थान- जमशेदपुर
शिक्षा – स्नातक विज्ञान, इंजीनियरिंग इन कम्प्यूटर साइंस, स्नातकोत्तर हिन्दी में
कार्यक्षेत्र-गृहिणी
सामाजिक क्षेत्र -जीवन नामक संस्था से जुड़ी हूँ

विधा- छंद , गजल, शेर, कविता , लेख
ईमेल – arpana.arpana.singh@gmail.com
मो.न.-9470359224
प्रकाशन – कविता एवं आलेखों का समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं मे प्रकाशन

लेखन का उद्देश्य – जो मैं अपने समाज और देश के प्रति महसूस करती हूँ उन एहसासों और जज्बातों को पाठकों तक पहुंचाना चाहतीं हूँ

लेखन के प्रति विचार-लेखक को अपने समाज और देश में घट रही घटनाओं के प्रति जागरूक एवं सचेत रहना चाहिए।कुरीतियों, कुप्रथा, दमन, शोषण एवं बुराईयों पर प्रहार करें।सिर्फ अच्छी भाषा का ज्ञान काफी नहीं बल्कि सामान्य ज्ञान होना भी बहुत जरुरी है।लेखक का दायित्व है कि वह अपने लेखन के जरिए बेहतर समाज बनाने का प्रयास करे।

 

काश! तुम आ जाओ

काश! तुम आ जाते एक बार
तुम्हें समझा पाते नयनों से
हृदय की समस्त वेदना ,व्यथा असीमित स्नेह
अविनाशी प्रेम
असँख्य चिंता
अमरत्व समर्पण
तुम जो पाना चाहते थे
तेरी प्रतीक्षा में प्रतिपल दण्ड काट रही हूँ जैसे
मौन धारण कर
केवल संवाद
अन्तर्मन में
अंतर्द्धद
कहीं मैं तुम्हें भूल गई सोचकर यह तुम न लौटे!!
नहीं
कभी नहीं
इस जीवन में नहीं
सात जन्मों में नहीं
तुम मेरे हृदय में ईश्वर की तरह रहोगे
मेरे स्वामी बन कर
गगन में लालिमा बिखेरता रवि
सम्पूर्ण विश्व के कण-कण में
प्रकाश और स्फूर्ति भर देता हैं
मेरे जीवन के सूर्य तुम कब उदय होगे
इन पक्षियों के कलरव में
तुम्हारी मेरी छबि उभर आती हैं
हम ऐसे ही लगातार कितनी बातें किया करते थे बादलों के बीच मदमस्त पंतग मेरे जैसी ही है
मेरी खुशियों की डोर तेरे हाथों में है
सिंदूरी साँझ मेरी तड़प बेचैनी को और बढ़ाती है
इसी समय हम मिले थे
तुम्हारी एक-एक स्मृति
मेरी आँखों में तारों की तरह उभरने लगती है
तुम्हारी बातें
तुम्हारी मुस्कान तुम्हारी आँखें
तुम्हारे व्यक्तित्व का हर एक अंश
कुछ क्षणों के लिए तुम मेरे साथ होते हो
मैं भावविभोर हो आंनदित हो उठतीं हूँ
वहीं अगले ही क्षण वास्तविकता से परिचित हो
नयनों से नीर के सावन बरसने लगते हैं
तारों के बीच शशि अपनी
सौम्यता मोहकता शीतलता पर गर्व करे
पर इस विरहाग्नि में मरुस्थल का ताप लगे
निद्रा गई नयनों से
विचलित सी मेरी आत्मा
मैं कब तक अतृप्त सा जीवन जीऊँ
करती रहूँ तेरी प्रतीक्षा प्रतीक्षा
और
प्रतीक्षा
मोक्ष मुझे तुम दे जाओ
काश! तुम एक बार आ जाओ

अर्पणा संत सिंह

 

 

Loading...
SHARE
Previous articleगुड्डी by Dr Purnima Rai
Next articleअनकहे जज्बात–1
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here