तस्वीर कुछ कहती हैं—अंक—-1

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तस्वीर का दर्द  

जब भी कभी ऐसा दृश्य रचनाकार देखते हैं तो उनकी कलम बोल उठती है ..महज लिखने के उद्देश्य से नहीं ,वरन् निर्धन की स्थिति में सुधार करवाने के लक्ष्य से !!सहृदय रचनाकार की निर्जीव कलम समाज के सजीव लोगों को चेतस् करती है..डॉ.पूर्णिमा राय

दीपक कुमार
शिक्षक,जालन्धर

 

*मैं हैरान हूँ!*

पानी पीते देखकर छवि अपनी
मुझे नहीं लगता कि मैं इंसान हूँ
मैं अपने आप पर बहुत हैरान हूँ।
प्यास बुझाने आया नद पर
पानी आईना बन हस रहा मुझ पर
प्रश्न करता है मुझ से चिढ कर
क्या मैं भी भारत माँ की संतान हूँ?
मैं अपने पर हैरान हूँ,
लगता नहीं कि मैं इंसान हूँ।
तन पर कपड़ा नहीं,सूर्य बदन काला बना रहा।
पेट की भूख को, मैं पानी से मजबूरी में मना रहा।
लगता नहीं कि मैं इंसान हूँ,
मैं अपने पर हैरान हूँ।
पास पड़े पत्थर और मुझ में कोई भेद नहीं,
दुनिया को मेरे जीवन से भी कोई खेद नहीं।
लगता नहींकि मैं इंसान हूँ,
मैं अपने पर हैरान हूँ।
माँ बाप को खो चुका, जिंदगी की भीड में।
घर बना रखा है मैंने, आसमान के नीड में।
लगता नहीं कि मैं इंसान हूँ
मैं अपने पर हैरान हूँ।
मनुष्य की तरक्की मुझे चिढा रही,
मेरी गरीबी अमीरों का न रास आ रही।
मेरी झोंपड़ पर मैं उनका आलीशान
मकान हूँ।
लगता नहीं कि मैं इंसान हूँ,
मैं अपने पर हैरान हूँ।
हाय! कब मेरा भाग्य उदय होगा
उनका उगता रोज सूर्य,
मेरा तारा कब चमक लेगा ,
तब मुझे भी लगेगा कि मैं भी इंसान हूँ,
फिर मैं भी समझूंगा कि मैं क्यों हैरान हूँ,
तब मुझे भी लगेगा कि मैं भी भारत माँ की संतान हूँ।

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डॉ.पूर्णिमा राय,
अमृतसर(पंजाब)

दोहे —

पानी की किल्लत हुई, बेच रहे जल चोर।
निर्धन हालत देखकर ,मुरझाया मन मोर।।

फटेहाल नंगे बदन,बुझी न निर्धन प्यास।
मटमैला पानी हुआ,रोती गंग उदास।।

झुककर पानी पी रहा,निर्धन इन्साँ बाल।
लाल को पशु बना दिया ,क्रूर हुआ कलिकाल।।

हाय नियति का खेल यह,करे अचंभित आज।
क्रूर काल को मार कर ,करें दीन हित काज।।

दोहे लिखती “पूर्णिमा” ,कर लो सभी विचार।
दर्द छलकता चित्र में,निर्धन को दें प्यार।।

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अश्विनी कुमार ,
शिक्षक,अमृतसर

गली- गली नगर-नगर
घूम-घूम के थक जाता हूँ
झुलसा देने वाली गर्मी में
थोड़ा पानी पी लेता हूँ

हूँ भारत का भविष्य
पर मेरा वर्तमान क्या है
स्कूल के पास से गुज़र जाता हूँ आह!
पर पेट के लिये
काम करना भी जरुरी है

हाय खिलौने सबके पास
मेरे पास यह पाँव हैं
घूम घूम कर मन
बहला लेता हूँ

हाय इन्तजार मुझे भी
उस चाणक्य का
शायद ,मैं भी चन्द्र
बन सकूँ कभी!!

 

 

 

 

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