माँ तुम्हें नमन(मातृदिवस विशेषांक–3)

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मातृदिवस विशेषांक–3

इस अंक में——-

1) गिरीश पंकज——गीतिका,दोहे

2) विभा रश्मि———माहिया छंद

3) डॉ.ज्योत्सना शर्मा—-माहिया (माँ)

4) डॉ.यासमीन खान—-गीतिका

5) सुनीता कम्बोज———गीत

6) देवराज डडवाल–माँ,तुम चली गई

7) संतोष चौधरी——-माँ (कविता)

8) अलका सेतिया——-मातृत्व

9) रजनी रामदेव———मेरी माँ

10)प्रवीण चौधरी——गीतिका

11) संगीता पाठक—-माँ की याद

12) डॉ.शैलेष गुप्त वीर——क्षणिका

13)डॉ.भोजकुमार मुखी–सृष्टि विस्तार

14) डॉ.भावना कुँअर—-मेरी प्यारी माँ

15) अंजना वाजपेई-माँ,बहुत याद आती

16)मोनिका शारदा–माँ की सीख

17) डॉ.पूर्णिमा राय—–चोका, सेदोका

0—–संपादकीय—–0

माँ तुम्हें नमन!!
मातृदिवस विशेषांक-1(5/5/17) 20 रचनाकारों की 22 बेहतरीन रचनाएं, विशेषांक–2 (6/5/17)में 20 श्रेष्ठ रचनाकारों की 20 रचनाएं एवं अब 17 उत्तम रचनाकारों की छन्दबद्ध एवं छन्दमुक्त माँ,मैया,जननी,माता,को समर्पित अतीव प्रेरित करती रचनाएं आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुये विशेष आनंद की अनुभूति हो रही है।इस विशेषांक की खासियत है कि इसमें अनुभवी और साहित्यिक स्तर पर प्रतिष्ठित डाक्टरेट (Ph.D)जहाँ एक ओर हमारे साथ अपनी रचनाओं के आशीष सहित जुड़े हैं तो दूसरी ओर वह गृहिणी महिलायें जो अभी लेखन क्षेत्र में नये रुप में उभर रही हैं,अपने विचार सरल एवं सहज भाषा में रखकर सबको अचंभित करती हैं,आपको उनका सृजन भी पढ़ने को मिलेगा।लेखन क्षेत्र हो यां जीवन क्षेत्र,अनुभव हो यां ज्ञान,नव रचनाकार हों यां स्थापित साहित्यकार,महिला हो याँ पुरुष सभी का अपना अपना महत्त्व है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है क्योंकि रचनाकार अपनी रचनाओं के साहित्यिक स्तर एवं गुणवत्ता के आधार पर ही पाठक वर्ग के हृदय पर अमिट छाप छोड़ता है न कि रचनाओं की मात्रात्मक गणना के आधार पर !! राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय ,नवीन एवं प्राचीन ,कामकाजी एवं घरेलू,महिला एवं पुरुष,सभी साहित्यकारों ने ,अपनी अमूल्य रचनाओं से इस अंक की शोभा बड़ाई है।मातृदिवस–1,2,3 तीनों ही विशेषांक एक से बढ़कर एक ममतामयी भावनाओं का अक्षुण्ण भंडार कहूँ तो अतिश्योक्ति न होगी। हृदयतल की गहराइयों से सभी कवियों,लेखकों,पाठकों ,समीक्षकों,एवं बुद्धिजीवी वर्ग का आभार !!…डॉ.पूर्णिमा राय

 

 

1) गिरीश पंकज

जन्म – 1 नवंबर, 1957
शिक्षा – एम.ए (हिंदी), पत्रकारिता
लेखन क्षेत्र–
विगत चालीस वर्षो से साहित्य और पत्रकारिता में सक्रिय , अनेक अखबारों में उप सम्पादक एवं सम्पादक भूमिका पर निभाई। गत दो दशकों से भारतीय एवं विश्व साहित्य के अनुवाद की पत्रिका ‘सद्भावना दर्पण’ का प्रकाशन-सम्पादन ,
प्रकाशित साहित्य—सात उपन्यास और पंद्रह व्यंग्य संग्रह सहित 55 पुस्तकें प्रकाशित।
सम्मान—
उपन्यास माफिया के लिए लुधियाना में ”लीलरांनी स्मृति सम्मान” । उपन्यास ”मिठलबरा की आत्मकथा’ के लिए करवट सम्मान (भोपाल) के अलावा व्यंग्य लेखन के लिए ही अट्टहास सम्मान, श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य सम्मान(लखनऊ), लीलावती सृजन फाउंडेशन सम्मान (रांची), जगन्नाथराय शर्मा स्मृति सम्मान।
हिंदी सेवी सम्मान (त्रिनिदाद, वेस्ट इंडीज)आदि 10 से अधिक देशों का साहित्यिक प्रवास।
सम्पर्क – सेक्टर -3, एचआईजी-2/2 , दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010

(1) गीतिका

इसे अम्मी कहो, मम्मी कहो माता तो माता है
ये है देवी कि जिसके सामने सिर झुक ही जाता है
बड़ी ‘मॉडर्न’ हो जाए मगर माँ कब बदल पाई
अगर रोता है बच्चा छातियों में दूध आता है
वो रहती है हमारे साथ हरदम इक दुआ बन कर
लगे जब चोट कोई लब पे माँ का नाम आता है
बड़ी तकदीर वाले हैं वो जिसके साथ माँ रहती
असल में माँ का बरकत से बड़ा दिलचस्प नाता है
कभी गैया, कभी गंगा, कभी धरती हमारी माँ
मगर सबसे बड़ी है वो जो अपनी जन्मदाता है
जो माँ का दूध पीकर के भी माँ की गलियाँ देता
न जाने किस जनम में किस तरह वो मुक्ति पाता है
अगर माँ को पुकारोगे बलाएँ टल ही जाएंगीं
ये है नुस्खा पुराना क्यों न तू भी आजमाता है
बड़ी तकदीर खोटी है कि जिसकी माँ नहीं पंकज
बेचारा ठोकरें ही ठोकरें हर बार खाता है

(2) मातृ दिवस ( दोहे )

चाहे कह लो तुम ‘मदर’, या ‘माता’ सब एक।
हो चाहे जिस देश की, माँ है मतलब नेक।।
एक दिवस काफी नहीं, हर दिन माँ का होय.
जिसको माँ का सुख नहीं, वह जीवन भर रोय।।
उसका है आँचल बड़ा, जिसमे विश्व समाय।
दुःख भागे जब माँ कभी, हमको गले लगाय।।
धरती से भी है बड़ा, माँ का हृदय विशाल।
अपने हिस्से की खुशी, देती बिना मलाल।।
भूल कभी जाना नहीं, माता का बलिदान।
छाँव प्राप्त करने जहां, खुद आते भगवान।।
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(3)
हमें विश्वास के सपनो से फौरन जोड़ देती है
ये माँ है जो हमारे दुःख के पर्वत तोड़ देती हैं।।
अगर बच्चा खिलौनों के लिए रोने लगे तो माँ
नहीं कुछ सोचती है और गुल्लक फोड़ देती है।।
पिला कर दूध अपना माँ हमें करती बड़ा कितना
मैं भूखा ना रहूं वो अपना हिस्सा छोड़ देती है ।।
अगर माता नहीं होती हमारा हाल क्या होता
यही तो ज़िंदगी को खूबसूरत मोड़ देती है।।
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2) विभा रश्मि

जन्म तिथि- 31. 8 .1952
जन्म स्थान- बदायूँ, उत्तर प्रदेश
शिक्षा- एम.ए. बी. एड.
प्रकाशित पुस्तकें -1 अकाल ग्रस्त रिश्ते /मिश्रित कहानी व लघुकथाएँ 1976
2 कुहू तू बोल / हाइकु संग्रह – 2016
लघुकथा संग्रह की तैयारी – ’मन का छाजन’
सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन
सम्प्राप्ति- विश्वविद्यालयी लेखन प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत, (कलकत्ता)
सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका 1986 sponcered by BHARAT PETROLIUM
ज्ञानोदय साहित्य संस्था, कर्नाटक (ज्ञानोदय साहित्य सेवा सम्मान -2016)
सर्मथा पत्रिका से श्रेष्ठ लघुकथा पुरस्कृत 2016
मोबाइल- 09414296536
ईमेल—vibharashmi31@gmail.com

माहिया छंद

1)
माँ तुझ से ये दूरी
सह न सकूँगी मैं
कैसी ये मजबूरी ।

2)
तोरी बाँहें पलना
झूला झूले हैै
माँ की प्यारी ललना ।

3)
मन नैनों से देखे
पीड़ा दिल में रख
खुश आलोड़न देके ।

4)
झीलों सा माँ का दिल
मचल उठा देने
बचपन की हर झिलमिल ।

5)
अँगुली थामे सीखे
पाठ लड़कपन के
कुछ मीठे कुछ तीखे ।

6)
छाया ठंडी देकर
बेला की खुश्बू
फैली ममता लेकर ।

7)
रौनक छा जाएगी
किलकेगी जब वो
ममता पा जाएगी ।

8)
रूखी -सूखी खाई
मैया तो तम में
बाती बन के आई ।

9)
बिटवा रोटी खा ले
तेरी सूरत से
मैया जग को पाले ।

10)
आँधी – तूफ़ानों को
झेलेगी माता
अरिबल के बाणों को ।

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3) डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

जन्म स्थान : बिजनौर (उ0प्र0)
जन्मतिथि: १५ नवम्बर
शिक्षा : संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि, पी-एच 0 डी0
प्रकाशन : ‘ओस नहाई भोर’ एकल -काव्यकोश,दोहा-संग्रह महकी कस्तूरी,डॉ सुधा गुप्ता के हाइकु में प्रकृति( अनुशीलनग्रन्थ), हाइकु-काव्यशिल्प एवं अनुभूति ,’आधी आबादी का आकाश’(हाइकु संग्रह) ‘कविता अनवरत -3’ तथा ‘समकालीन दोहा कोश’ ,’गुलशने ग़ज़ल’ , ‘हाइकु व्योम’, ‘अनुभूति के इन्द्रधनुष’ , ‘पीर भरा दरिया’ तथा ‘कुण्डलिया संचयन’ में अन्य रचनाकारों के साथ रचनाएँ प्रकाशित | विविध विधाओं में विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाश |
ब्लॉग : jyotirmaykalash.blogspot.in
सम्प्रति : कुछ वर्ष शिक्षण , अब स्वतन्त्र लेखन
सम्पर्क :एच-604 ,प्रमुख हिल्स ,छरवाडा रोड , वापी , जिला- वलसाड , गुजरात (भारत )
Jyotsna.asharma@yahoo.co.in
Sharmajyotsna766@gmail.com
Mo. 9824321053

माँ (माहिया छंद)

करतीआराम नहीं
माँ तुझसा प्यारा
दूजा हैनाम नहीं । १
ख़ुशियों का नीर बहे
जन्म दिया जिस पल
माँ कितनी पीर सहे ।२
दीपक बन जाती है
जीवन के पथ पर
चलना सिखलाती है ।३
आँचल की झोली में
अक्षर ज्ञान मिला
माँ तेरी बोली में । ४
सुख से कब सोती है
बच्चों के दुख पर
सौ आँसू रोती है । ५
चंदा था रोटी में
माँ कितने क़िस्से
गूँथे हैं चोटी में । ६
जी भरकर प्यार दिया
सुख-आराम सभी
बच्चों पर वार दिया । ७
जाने कैसे जाने ?
दूर बसी मैया
हर पीड़ा पहचाने ।८
कुछ जग के ,कुछ अपने
नन्हीं आँखों को
माँ ने सौंपे सपने ।९
रेशम की डोरी है
माँ सबसे मीठी
तेरी इक लोरी है । १०
दुनिया ने ठुकराया
सारी पीर हरे
तेरी शीतल छाया । ११
भर देता ज़ख़्म हरा
माँ तेरा आँचल
हल्दी की गंध भरा । १२
खाती है झिड़की भी
सारे रिश्तों की
होती माँ खिड़की भी । १३
व्यसनों से मोड़ रही
टूटे रिश्तों का
माँ ही इक जोड़ रही । १४
ना पहना ,ना खाया
सबकी मुश्किल में
तेरा धन सुख लाया । १५
क्या ख़ूब पहेली है
बेटे ,बिटिया की
माँ आज सहेली है । १६
कितना बतियाती माँ
बातों की गुल्लक
कुछ राज़ छुपाती माँ । १७
इक दिन ऐसा आया
संतानों ने ही
उस माँ को तरसाया । १८
ममता का मोल नहीं
माँ-बाबा ख़ातिर
दो मीठे बोल नहीं । १९
कैसे जाएँ भूले
यादों में झूलूँ
मैं बाहों के झूले ।२०
लौटे घर शाम हुए
माँ के चरणों में
फिर चारों धाम हुए। २१

 

4) डॉ.यासमीन खान

गीतिका

सोचती हूँ क्या लिखूँ दूँ तारीफ़ मैं,उस माँ की
जिसके क़दमों में आ पड़ी जन्नत ही ख़ुदा की
उसकी दुआ के सदके से हर बला ही टल जाती
माँ होती है बेगरज़ मोहब्बत का एक दरिया सी
माँ की दूरी सोचते ही दिल पर छा जाये उदासी
उसे हर फ़र्ज़ निभाता देख,मेरी आँख भर आती
जब उसके दर्द भरे दिल को बातों से मैं सहलाती
मुझे ढ़ेरों दुआओं से अपनी वो सदा ही दुलराती
नेक रास्ते पे चलने का पाठ सदा ही मुझे पढ़ाती
उसकी दुआ के फल में तरक़्क़ी मुझे मिल जाती
मेरी कामयाबी पर खूब ही वो मुस्काती इठलाती
कहती और ज़्यादा मिले बच्ची तुझे कामयाबी
संसार के रंगो से मुझे वाकिफ़ हरदम वो कराती
मेरे हिस्से के दर्द , आँसू वो ख़ुद ही तो पी जाती
ज़िन्दगी की धूप में तपा तपा के कुन्दन वो बनाती
अच्छाई पे डटने का पाठ यासमीं सदा वो पढ़ाती
पाकीज़गी सदा उसके मन की मुझे बड़ी सुहाती।
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5) सुनीता काम्बोज

जन्म –10 अगस्त
जिला–करनाल (हरियाणा) भारत
विधा– ग़ज़ल , छंद ,गीत,हाइकु ,बाल गीत ,भजन एवं हरियाणवी भाषा में ग़ज़ल व गीत ।
शिक्षा –हिन्दी और इतिहास में परास्नातक ।
प्रकाशन—अनभूति काव्य संग्रह
ब्लॉग — मन के मोती
राष्ट्रीय ,एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन
प्रस्तुति :डी -डी दूरदर्शन पंजाबी एवं अन्य हिंदी कवि दरबार में कविता पाठ ।
ईमेल -Sunitakamboj31@gmail.com
गीत
1222 1222 1222 1222
दुआओं में असर तेरी है ममता का समन्दर माँ
गगन को छू सकूँ उड़कर दिए तुमने मुझे पर माँ
मेरा बेरंग ये जीवन सजाया संस्कारों से
मुझे लड़ना सिखाया है नदी की तेज धारों से
तुम्हारे त्याग के आगे सदा झुकता मेरा सर माँ
दुआओं——
मुझे चलना सिखाया था बड़ी फिसलन थी राहों में
सभी गम भूल जाती हूँ तू भर लेती जो बाहों में
मैं जब भी थी कभी दुख में तो रोई नैंन भर-भर माँ
दुआओं में——-
मेरी माँ साथ है हर पल यही अहसास होता है
ये रिश्ता इस जमाने में बड़ा ही खास होता है
“सुनीता “ने किया महसूस खुशबू से भरा घर माँ
दुआओं में——

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6) देवराज डडवाल “सन्जू”

लैक्चरार-अर्थशास्त्र
गाँव सरनुह ,डाकघर सुखार, तहसील नूरपुर ,
जिला कांगड़ा हि प्र – 176051
मो—-09418474052, 07807271358

माँ , तुम चली गई

कितने ही कष्ट
कितनी ही पीड़ाएँ
ह्रदय मे छुपाये
तुम दिन रात खपती रही
हमारे लिए
अपने लिए
उम्मीदों की पोटली
सम्भालती सहेजती रही लेकिन
माँ , तुम चली गई
बचपन के वे दिन
अपने ही साथ ले गई
वह लोरी , वह डाँट
वह पुचकारना
उंगली पकड़कर चलना सिखाना
आज भी जब
कहीं ठोकर लगती है अचानक निगाह ढूंढती है तुम्हारी उंगली परन्तु
माँ , तुम चली गई ।
कितनी संजीदा थी माँ
हमारी शिक्षा को लेकर
स्वयं अभावों में जीती रही लेकिन
हमें कॉपी पेंसिल तख्ती की कमी न हुई ।
सब कुछ आज मिला पर
माँ , तुम चली गई ।
तुम अस्पताल क्या गई
असंख्य बीमारियों समा गई थी तुममे
तुम जिंदगी तलाशती रही
खूब जद्दोजहद हुई थी
चिकित्सक व तुम्हारी देह में
लेकिन चिकित्सक हार गए
माँ , तुम चली गई ।।
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7) सन्तोष चौधरी

शिक्षा– एम. ए. हिन्दी साहित्य ,बी.एड.
प्रकाशन –पत्र-पत्रिकाओं में कुछ रचनायें प्रकाशित
जोधपुर (राजस्थान)

     माँ

एक शब्द में सिमटी हैं
सारे जहाँ की खुशियाँ
तेरा महज ख्याल करनें
से ही मिल जाता हैं
प्यार, आशीष, सम्बल
नहीं समेट सकती हूँ
कुछ शब्दों में
मैं तुझे,
“जन्मदायिनी “
तुझसे मेरा नाता
इस धरती पर आने के
साथ ही जुड़ गया
मेरी हर खुशी और गम में
थामा हैं तूने हाथ मेरा,
और भाग्य से मिली
“मां”
तूने हर हाल में
दिया हैं साथ मेरा
रहें सदैव
तुम्हारे आशीर्वाद
वाले हाथ हम पर
ईश्वर से हैं,
सदा ही हैं
ये विनती मेरी….

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8) अलका सेतिया,

राजपुरा (पंजाब)
शिक्षा—-स्नातकोत्तर (अंग्रेजी )
कम्प्यूटर (डिप्लोमा)
सम्प्रति– राष्ट्रीयकृत बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक
रूचि—संगीत सुनना, फिल्में देखना और घूमना- फिरना ,अच्छी किताबें पढ़ना,लेखन करना

मातृत्व

मातृत्व के सुख से सराबोर
कितने ही सपने सजाये
प्रतीक्षा है मुझे तेरे आने की
मेरा अस्तित्व तुझसे होगा
मेरी दुनिया है तुझमें समाई
देना चाहती हूँ खुशी जहाँ की !
बनावटी दुनिया के मुखौटे हैं
जो पीछा नहीं छोड़ते मेरा
अकेले ही मुझे संभालना है
तेरा हर फ़र्ज़ निभाना है
तुझे इस दुनिया में लाने का
फ़ैसला किसी को मंज़ूर नहीं !
अंकुर बन आया कोख में
आज नन्हा पौधा है तू
अपने एहसासों से सीचूँगी
तेरे जीवन की हर क्यारी को
महकेगा घर आँगन मेरा
तेरी मुस्कान की खुश्बू से !
तू मेरा अंश है कैसे तुझे छोड़ दूँ
तुझे इस दुनिया में लाकर
संपूर्ण होना चाहती हूँ
माँ बनने का सुख जो दिया तूने
तेरे इर्द-गिर्द घूमती है अब
मेरी दुनिया के केंद्र बिंदु हो तुम !
अकेली हूँ तो क्या हुआ
तुम अब मेरी ज़िम्मेदारी हो
कोई साथ हो न हो
चुन लेंगें काँटों को
बना लेंगें मंज़िल राहों को !

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9) रजनी रामदेव

पति–एस. एन. रामदेव
निवास स्थान–न्यू दिल्ली
शिक्षा–स्नातक
साहित्यिक सफ़र—फेसबुक के कुछ साहित्यिक ग्रुप्स में सम्मान तथा कुछ समाचार-पत्रों में रचनाएँ प्रकाशित

मेरी माँ

बहुत याद आती हो माँ
मेरी मधुरम् यादों में….. किये सभी वो काम हैं तूने
जो न थे तेरे वादों मे….
मेरे हँसने पर तूँ हँस दी मेरे रोने पर रोई माँ….
माँग लिया जो चन्द मामा थाली भर पानी लाई माँ…
इक छोटा सा काम भी मेरा
तुम पर था आधारित माँ…
मेरी कोई भी मनमानी
तुम कर देतीं पारित माँ….
मेरे बचपन में थी तूँ
मेरी पहली शिक्षिका भी…..
जब यौवन सोपान चढ़ी तो
बन बैठी संरक्षिका भी…..
विदा किया था इक दिन मुझको
सबने किया पराई माँ….
एक तेरे ही अपनेपन में
कोई भी बू न आई माँ….
ये नीचे की पंक्तियाँ सिर्फ मेरी माँ को समर्पित— ************************************
न जाने किस देश गई हो
अब होकर यूँ पराई माँ!!
आँख उठा तारों में ढूँढूँ
तुम तो नज़र न आई माँ!!

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10) प्रवीण त्रिपाठी

जन्म – उन्नाव, उत्तर प्रदेश
जन्मतिथि -11 अगस्त 1962
शिक्षा। – MBA(Fin)
सम्प्रति – उदयपुर, राजस्थान
रूचि – पर्यटन
लेखन – नवोदित
काव्यकार प्रकाशन
संपर्क pst_5075@yahoo.com
मो—9001791890

माँ (एक श्रद्धांजलि)

गहन छाँव में अपने आंचल की बड़े जतन से पाला था
नित नूतन अमूल्य शिक्षा दे सुगढ़ित सांचे में ढाला था।
बिना भरे उदर हम सबके खुद निगला नहीं निवाला था
बनी ढाल खुद ही विपदाओं से न पड़ने दिया पाला था।
तिनके-तिनके जोड़ नीड़ इक सुंदर निर्मित कर डाला था
दे अहसास सुरक्षा का तुमने डर मन का मिटा डाला था
घर-परिवार फले-फूले तुमने यह निश्चित कर डाला था
उन्नति पथ पर संतान चले सबको आशीष दे डाला था।
लड़खड़ाए जब पग जीवन में तुमने ही तो सम्हाला था
पाई सफ़लता जब संतति ने दीपों से किया उजाला था।
गहन हृदयतल समा गयीं मेरा मन जो भोला भाला था
दूर रहूं या रहूं पास तुमने हरदम मन में डेरा डाला था।
अंत समय तक रहीं साथ मन आंगन महका डाला था
पर छोड़ अचानक चली गयीं कोई गुनाह कर डाला था
एक रिक्तता जीवन में जिससे पड़ा नहीं कभी पाला था
अक्षुण्ण रखूंगा वो छवि जिसको नयनो में बसा डाला था
एक निश्चय ,चिन्ता करना ना होना उदास खुद को लूंगा फिर सम्हाल
बढ़ता जाऊंगा सिखलाए पथ पर मैं तोडूंगा सब मायाजाल
तेरी धरोहरें कर अक्षुण्ण परिपाटियां रखूंगा मैं अपने भाल
संजोए हुए सपने जीवन के तेरे फलीभूत करेगा यह तेरा लाल.

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11) संगीता पाठक

जन्म -बडौत
शिक्षा –एम.ए (हिन्दी)
निवास-“परमधाम” विष्णुधाम न्यू माधवनगर सहारनपुर।
रूचि–पढ़ना -लिखना ,गार्डनिंग,निटिंग,कुकिंग। लेखन विधा—-कविता,तांका ,गज़ल ,हाइकु ,गीत गज़ल, संस्मरण

माँ की याद

बिन बोले मेरी भाषा को पढ़ जाना
बिना कहे ही दर्द मेरा भी सह जाना।
दूर हो कितने भी हम चाहे पास रहे
अहसास मेरा मेरे बचपन ने यह जाना।
माँ की लोरी माँ का आँचल याद आना
होठों से कोई पुराना गीत सा गा जाना।
कयूँ आज कहानी फिर वही दोहरा जाना
बेटी का दर्द मिटाने की एक तड़पती चाहना।
उम्र का सबसे सुदंर गहना उसने पहनाया
जब माँ ने बच्चो का बचपन सहलाया।
क्या राजा क्या रंक सभी को यह भाया।
हर चौखट पर ममता वन्दनवार सजाया।
दादी नानी बुआ मौसी से हैं रूप अनेक
हर छवि ने मेरा अबोध बचपन सहलाया
कैसे छोडूँ वो जीवन के जटिल विषय
सिखाकर जीना जिसने जिनसे अवगत कराया।
बच्चों के जीवन का हर पहलू है माँ
दुख दुपहरी तपते जीवन की छाँव है माँ
तन मन जिसके अंश से हरदम सजते,
समक्ष ईश्वर रूप में दर्जा पाती है वो माँ।
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12) डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’

माता/पिता:
श्रीमती रामा गुप्ता/श्री राम रतन गुप्त
शिक्षा:
परास्नातक (प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विज्ञान), पी-एच. डी. (पुरातत्व विज्ञान), यूजीसी-नेट (पुरातत्व विज्ञान), एम.जे.एम.सी.(पत्रकारिता एवं जनसंचार),
बी.एड., डिप्लोमा इन रसियन लैंग्वेज़, डिप्लोमा इन उर्दू लैंग्वेज़, ओरियन्टेशन कोर्स इन म्यूजियोलॉजी एण्ड कन्ज़र्वेशन।
संपादन :
‘उन पलों में’ (रागात्मक कविता संकलन)
‘आर-पार’ (छंदमुक्त सामजिक कविताओं का संकलन)
‘कई फूल, कई रंग’(देश भर के बासठ रचनाकारों का संकलन)
‘डॉ. मिथिलेश दीक्षित का क्षणिका-साहित्य’ (क्षणिका-साहित्य का प्रथम समीक्षा ग्रन्थ)
‘बिंदु में सिंधु’ (क्षणिका-संकलन)
अन्वेषी-2007,अन्वेषी-2008, अन्वेषी-2009-10, अन्वेषी-2011-12 तथा अन्वेषी-2014 (संस्था ‘अन्वेषी’ के वार्षिकांक)
प्रकाशन:
देश-विदेश के हिन्दी और उर्दू के विविध पत्र-पत्रिकाओं-वेबपत्रिकाओं, संकलनों तथा शोध-संकलनों में।
कार्यक्षेत्र-
सृजन, संपादन, समीक्षा तथा साक्षात्कार लेखन के साथ-साथ साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता, इतिहास तथा पुरातत्व विषयक विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठियों, संगोष्ठियों, शोध-संगोष्ठियों, सम्मेलनों तथा कार्यशालाओं में सहभागिता और प्रस्तुतीकरण।
विशेष:
1-विभिन्न पत्रिकाओं यथा गुफ़्तगू, तख़्तोताज, पुरवाई आदि के लिए लम्बे समय तक उपसंपादन, सहसंपादन व कार्यकारी संपादन।
2-दस से अधिक पुस्तकों के लिये भूमिका लेखन।
3-पचास से अधिक पुस्तकों के लिये समीक्षा-समालोचना प्रकाशित।
4-अब तक पन्द्रह से अधिक साक्षात्कार, जिनमें सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास ‘नीरज’, पद्मश्री बेकल उत्साही, मशहूर शायर मुनव्वर राना, उर्दू समालोचक शम्सुर्ररहमान फारुकी, नवगीतकार माहेश्वर तिवारी, सुप्रसिद्ध हाइकुकार डॉ. मिथिलेश दीक्षित तथा फिल्म राइटर संजय मासूम आदि के साक्षात्कार प्रमुख हैं।
सम्मान:
1- बेकल उत्साही सम्मान-2017
(गुफ़्तगू संस्था, इलाहाबाद द्वारा)
2- कला रत्न एवार्ड-2011
(‘काव्यांजलि’ संस्था, कानपुर द्वारा)
3- रामकृष्ण कला-साहित्य सम्मान-2010
(इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा)
4- श्री मोहनलाल गुप्त स्मृति जनसेवा सम्मान-2014
भाषा ज्ञान:
हिन्दी, अग्रेंज़ी ,संस्कृत, रूसी, गुजराती, उर्दू तथा भोजपुरी।
सन्दर्भ:
अध्यक्ष- अन्वेषी (साहित्य एवं संस्कृति की प्रगतिशील संस्था, फतेहपुर)
सलाहकार- गुफ़्तगू (हिन्दुस्तानी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका, इलाहाबाद)
सलाहकार संपादक- मौसम एवं शब्दगंगा (हिंदी वार्षिकी, पलामू, झारखण्ड)
सम्पर्क:
24/18, राधा नगर, फतेहपुर (उ.प्र.)-212601
वार्तासूत्र : +91 9839942005
ई-मेल : doctor_shailesh@rediffmail.com
—————————-
डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ की पाँच क्षणिकाएँ
(माँ पर केन्द्रित)
———————————-
1-
वह
पत्थर से
पानी निकाल लेता है,
माँ का आशीर्वाद
हौंसला देता है!
2-
सपने बुने
आँखों में चमक कौंधी,
जैसे
माँ के हाथों बनी
रोटी सौंधी!
3-
बेटों की मुस्कान के लिए
माँ टुकड़ों में बँट गयी,
ज़िन्दगी कट गयी!
4-
छुटकी
फिर से
‘छुटकी’ हो गयी,
मायके आयी
माँ की गोद में
सो गयी!
5-
मैं बर्दाश्त नहीं कर सका
अपने आप को,
जब आहत हुई
मेरे गुस्से से
मेरी माँ!

************************

 

13) डॉ.भोज कुमार मुखी

जन्म :- 04 सितम्बर 1949
शिक्षा :- एम ए पी,. एच डी.,.,. दिल्ली विश्वविद्यालय , दिल्ली
सम्प्रति :- स्वतंत्र लेखन ….साहित्य समीक्षा , काव्य, लघु कथा , उपन्यास लेखन
सम्पर्क :- 584 , डी डी ए, फ्लैट्स , मेट्रोव्यू अपार्टमेन्ट , सेक्टर 13 -B , द्वारका
नई दिल्ली ..110078
मोब : 7011099253
ईमेल: mukhidr@yahoo.co.in
********************************

माँ
****
सृष्टि निर्माता
ईश्वर कहाँ है ?
……………….
सुबह,दोपहर,शाम
चारों प्रहर ,
चौबीसों घंटों
खोजा.
भटका सभी तरफ …..
……………….
घरों में
घर से बाहर
मंदिरों में
धार्मिक स्थानों में …. ………………..
पहाड़ों पर
नदियों में, झरनों में जंगलों में,………..
…………………….
मानव में
पशु में,
पक्षियों में….
…………………….
थका हारा
लौटा घर
थकावट दूर हो गयी
मिला सकून व ऊर्जा
किसी के कोमल स्पर्श से … ……………………
देखा
माँ खड़ी है
उसके हाथों से
निकल रही थीं
शक्ति की किरणें …… …………………………
जिस भगवान को
देखा नहीं कभी
अब जरूरत नहीं….
………………..
उसे
देखने की
कहीं खोजने की
” माँ “
ही ईश्वर है

************************

14) डॉ०भावना कुँअर

जन्म                  : 12 फ़रवरी , मुज़फ्फ़रनगर

निवास स्थान      : ऑस्ट्रेलिया (सिडनी)

शिक्षा                : हिन्दी व संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि, बी० एड०, पी-एच०डी० (हिन्दी)                     तीन विषयों में डिप्लोमा।

शोध-विषय        :  ‘ साठोत्तरी हिन्दी गज़लों में विद्रोह के स्वर व उसके विविध आयाम’।

प्रकाशित पुस्तकें  : तारों की चूनर, धूपके खरगोश ( हाइकु- संग्रह),जाग उठी चुभन( सेदोका-संग्रह), परिन्दे कब लौटे(चोका-संग्रह) साठोत्तरी हिन्दी गज़ल में विद्रोह के स्वर (पी-एच०डी०का शोध प्रबन्ध),अक्षर सरिता,शब्द सरिता,स्वर सरिता(प्राथमिक कक्षाओं के लिए हिन्दी भाषा-शिक्षण की शृंखला),भाषा मंजूषा में कक्षा 7 के पाठ्यक्रम में एक यात्रा–संस्मरण।

संपादन    : चन्दनमन (हाइकु-संग्रह), भाव कलश (ताँका संग्रह), गीत सरिता (बालगीतों का संग्रह- तीन   भाग),यादो के पाखी (हाइकुसंग्रह),अलसाई चाँदनी (सेदोका संग्रह), उजास साथ रखना (चोका-   संग्रह), डॉ०सुधा गुप्ता के हाइकु में प्रकृति (अनुशीलनग्रन्थ),हाइकु काव्यःशिल्प एवं अनुभूति (एक   बहु आयामी अध्ययन)।

अन्य संग्रहों में प्रकाशन:  कुछ ऐसा हो, सच बोलते शब्द, सदी के प्रथम दशक का हिन्दी हाइकु काव्य ,आधीआबादी  का आकाश, हाइकुव्योम -संग्रहों में हाइकु,कविता अनवरत-3( कविताएँ),दोहाकोश(490  दोहाकारों का 488 पृष्ठ का कोश)

अन्य प्रकाशन     : उदन्ती,वीणा,वस्त्र-परिधान,अविराम,अभिनव इमरोज,सादर इण्डिया,लोक गंगा, हरिगन्धा,               आरोह- अवरोह,हिन्दी चेतना,संकल्प,सरस्वती सुमन, हाइफन,हिन्दी                                                            गौरव,(सिडनी) अप्रतिम,हाइकु लोक तारिका,नेवाःहाइकु (नेपाली)विज्ञापन की दुनिया,हिन्दी              टाइम्स (कनाडा) हाइकु दर्पण,पाठक मंच बुलेटिन,  तथा अनुभूति,अभिव्यक्ति, लघुकथा डॉट                                     कॉम,गर्भनाल,स्वर्गविभा,साहित्य कुंज,लेखनी डॉट नेट,हिन्दी नेस्ट,कविताकोश,आखर                          कलश,समय,रचनाकार, सृजन गाथा, कर्मभूमि,हिन्दी-पुष्प (साउथ एशिया टाइम्स) द सन्डे                                     इन्डियन,दिल्ली इंटरनेशनल फिल्मफेस्टेवल,(नेटपत्रिकाएँ) आदि में नियमित प्रकाशन।

सम्मान              : “हाइकु रत्न सम्मान” महेन्द्रू पटना (2011)

पुरस्कार                        : विश्व हिन्दी संस्थान कीअंतर्राष्ट्रीय हिन्दी कविता प्रतियोगिता में तृतीय स्थान प्राप्त

  स्वनिर्मित  जालघर (वेबसाइट) –http://dilkedarmiyan.blogspot.com/ पर अपनी नवीन-रचनाओं का नियमित प्रकाशन।

पने स्वनिर्मित  जालघर (वेबसाइट) –http://drbhawna.blogspot.com

पर कला का प्रकाशन             

सदस्य  —संपादक  समिति सिडनी से प्रकाशित “हिन्दी गौरव” मासिक पत्रिका

संपादक कैनेडा से प्रकाशित-“हिन्दी-चेतना” त्रैमासिक पत्रिका

संप्रति                : स्वतन्त्र लेखन और सिडनी में सेवारत।

अभिरुचि           : साहित्य लेखन, अध्ययन,चित्रकला एवं देश-विदेश की यात्रा करना।

संपर्क                 : bhawnak2002@yahoo.co.in/ bhawnak2002@gmail.com

प्यारी माँ

 माँ मुझे भी प्यारी है, माँ तुम्हें भी प्यारी है
माँ इस दुनिया में, सबसे ही न्यारी है।

बचपन में ऊँगली पकडकर,चलना सिखाया था हमको
आज उन हाथों को, थामने की बारी हमारी है।

माँ मुझे भी प्यारी है, माँ तुम्हें भी प्यारी है
माँ इस दुनिया में, सबसे ही न्यारी है।

जो अनेक प्रयत्नों के बाद, खिला पाती थी रोटी के टुकडे
अब थके हुए उन हाथों को, ताकत देने की बारी हमारी है।

माँ मुझे भी प्यारी है, माँ तुम्हें भी प्यारी है
माँ इस दुनिया में, सबसे ही न्यारी है।

कदम से कदम मिलाकर, चलना सिखाया था जिसने
उन लड़खड़ाते कदमों को, सहारा देने की बारी हमारी है।

 माँ मुझे भी प्यारी है, माँ तुम्हें भी प्यारी है
माँ इस दुनिया में, सबसे ही न्यारी है।

रातभर जागकर भी, हमें मीठी नींद सुलाया था जिसने
उन खुली आँखों की, थकन मिटाने की बारी हमारी है।

माँ मुझे भी प्यारी है, माँ तुम्हें भी प्यारी है
माँ इस दुनिया में, सबसे ही न्यारी है।

*******************************************

15) अँजना बाजपेई

जगदलपुर (बस्तर )
छत्तीसगढ़..

मेरी कुछ रचनायें पहले दैनिक भास्कर समाचार पत्र , प्रयुक्ति दैनिक एंव नव प्रदेश में प्रकाशित हो चुकी है
ईमेल–
Anju123456654321@gmail.com

….माँ...

माँ तुम बहुत याद आ रही
लाख चाहा मै तुम जैसी बनूँ
पर नहीं बन पा रही
माँ तुम्हारी बहुत याद आ रही
माँ तुम कैसे जीती थी
मैंंने कभी जाना ही नहींं
कभी तुम्हेंं अाराम करते
कभी नींद में खोये ,देखा ही नहींं
सारा घर मीठी नींद में सो जाये
तुम सारे काम खत्म कर आती
हमें नींद से जगाकर ,दूध का गिलास थमाकर हमारे नखरों को सहकर लाड़ प्यार से पिलाती फिर गौशाला जाती ,उन्हेंं दाना पानी मिला है कि नहींं सबका ख्याल करती
माँ तुम्हारी खटर पटर सुनती
माँ तुम कब जगती कब सोती याद नहीं कर पा रही …..
सारा आकाश कागज बना लूँ
सारे समुद्र की स्याही बना लूँ पर तुम पर जितना भी मै लिख लूँ
सब कुछ नही लिख पा रही
माँ तुम्हारी बहुत याद आ रही
तुम कब बीमार होती जानती ही नहीं जिस दिन बिस्तर से नहींं उठती
तब तुम बहुत दिनोंं से बीमार थी
सबको खबर होती तब भी सबकी चिन्ता में मरती रहती
सबकी पसंद का नाश्ता पसंद की सब्जी
तो आज बनी नहीं
सबने खाया होगा कि नहींं
आँखो में आँसू लिये फिक्र करती रहती
दवा बाद मेंं लेती ,मेरे जरा से सिरदर्द पर
मेरे सिरहाने बैठ जाती
बार बार सारे काम भूलकर मेरे पास आ जाती माँ अब भी बीमार होती है तुम्हारी बेबी, तुम्हारी गुड़िया, पर वह तो रोने बैठ जाती मै भी माँ हूँ पर सहनशक्ति में खुद को बहुत कमजोर पाती माँ मै तुम जैसी कभी नही बन पाती माँ तुम्हारे जैसे हमेशा मुस्कान से सबकी तकलीफें नहीं भुला पाती माँ तुम बहुत याद आती तुम्हारी बहुत याद आती आँखो में नमी चेहरे पर मुस्कान ले आती माँ तुम बहुत याद आती माँ तुम बहुत याद आ रही…

 

******************************************

16) मोनिका शारदा

जन्म- ३० नवम्बर,१९६९
जन्मस्थान-अमृतसर
शिक्षा-एम०ए०(हिन्दी),बी.एड
पिता-श्री महेश्वर प्रसाद
माता-श्री मती बिन्दा देवी
स्थायी पता-बी ४२७,
न्यु अमृतसर,
अमृतसर।
कार्य अनुभव- वर्ष १९९५ से लेकर अब तक कार्यरत ////हिन्दी अध्यापिका

मेरी माँ

दुनिया के लिए भले ही,
साधारण महिला रही होंगी
परंतु मेरे लिए मेरी
पहली ‘गुरू’ थी और
सदा रहेगी मेरी ‘माँ’।

ममतामई​ प्यार,
पारिवारिक संस्कार,
धार्मिक आचार,
जीवन कौशल आधार।
सभी गुणों का भंडार थी,
मेरी ‘माँ’
मेरी पहली ‘गुरू’….
बेटी-बेटे में समदृष्टि और
उनका मधुर व्यवहार,
पूरे कुल की
आन-बान और शान।
समुद्र सम गहराई समेटे,
उनका हृदय उद्गार।
सब गुणों का भंडार थी,
मेरी ‘माँ’
मेरी पहली ‘गुरू’…..
हमें व्यक्तित्व निर्माण का,
पाठ पढ़ाती
साधना, स्वाध्याय,संयम
और सेवा का
सबक सिखाती।
पशु-पक्षियों, पौधों को
करती मां सम प्यार,
सिलाई-कढ़ाई,बुनाई संग
अद्भुत थी वो शिल्पकार।
सब गुणों का भंडार थी,
मेरी ‘माँ’,
मेरी पहली ‘गुरू’……
सादा जीवन उच्च विचार,
मेहनती,कर्मठ और
शिष्टाचार।
बाल सेवा केंद्र और
गांधी विद्या मंदिर की
पिता जी की सहयोगी,
कुशल प्रबंधकार।
सभी गुणों का भंडार थी
मेरी माँ मेरी पहली ‘गुरू’…
आज भी हर कदम
साया बन संग रहती है,
आत्मा की आवाज बन,
ईमानदारी और धर्म की
राह पर चलने को
कहती हैं।
सकल धरा, नदियों, पौधों,
नन्ही कन्याओं में
उन्हीं का है विस्तार,
हमसब उनकी ही प्रतिछवि, वहीं हमारी
हिम्मत और कार्य व्यवहार
का आधार।
दिव्य ज्योति बन मिटा
देती है,
वे हम सबका अन्धकार।
सभी गुणों का भंडार थी
मेरी ‘माँ’
मेरी पहली ‘गुरू’….
मेरी कलम माँ के लिए,
कहाँ तक लिख पाएगी?
अत्यंत गुणों की स्वामिनी
होती है माँ
ये कब तलक कह पाएगी
सच है ईश्वर का वरदान
होती है ‘माँ’
सत्कार करो इनका,
ले आशीर्वाद
अपने सपने करो साकार।
दैवीय गुणों का भंडार
होती है सबकी’माँ’,
सबकी पहली ‘गुरू’होती है और सदा रहेगी
हम सबकी ‘माँ’!!

********************************************

 17) डॉ०पूर्णिमा राय

पिता—श्री मुख्तार लाल
माता—श्रीमती नीलम
पति का नाम–श्री नरेंद्र राय
जन्म-तिथि–28दिसम्बर
वृति — हिंदी शिक्षिका ,पंजाब स्कूल शिक्षा विभाग
योग्यता — एम .ए , बी.एड, पीएच.डी (हिंदी)
वर्तमान पता– ग्रीन एवनियू,घुमान रोड , तहसील बाबा बकाला , मेहता चौंक१४३११४,अमृतसर।
व्यक्तित्व——मैं मूलत:शिक्षिका हूँ।रुचि अनुसार लेखिका एवं संपादिका कार्य करती हूँ।मेरी अध्ययन-अध्यापन में रूचि है ।काव्य सृजन द्वारा यथार्थ सामाजिक अभिव्यक्ति पर बल देती हूँ।राजनीति से मैं दूर रहना पसंद करती हूँ। शैक्षणिक एवं साहित्यिक सामाजिक संगोष्ठियों में विदग्ध महिला के रुप में जानी जाती हूँ।पद्य में छंदबद्ध –दोहे,मुक्तक,गज़ल,हाइकु,तांका,कवित्त एवं छंद मुक्त सृजन एवं गद्य लेख में लघुकथा लेखन एवं समीक्षक कार्य कर रही हूँ।अनुवाद कार्य में दक्षता है –पंजाबी से हिन्दी और हिन्दी से पंजाबी भाषा अनुवाद कार्य करके मुझे अतीव आनंद आता है।।मेरी स्पर्धा किसी से नहीं ,स्वत:अपने आप से है ।बेहतर से बेहतरीन बनने की दिशा में कार्यरत हूँ।हिन्दी साहित्य सेवा की दिशा में अग्रसर हूँ। मैं मानव धर्म की पक्षधर हूँ।
भाषा ज्ञान–हिन्दी ,पंजाबी,अंग्रेजी।
पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन —
हरिगंधा,कानूनी शिकंजा,कश्फ, हस्ताक्षर, हिंदी हाइकु,सहज साहित्य ,सौरभ दर्शन, बिजनेस संदेश ,समाज कल्याण,Suberbitinside, पब्लिक दिलासा,त्रिवेणी,ट्रू टाइम्स,पब्लिक इमोशन बिजनौर,दैनिक हमारा मैट्रो,नेवा हाइकु,
प्रकाशित कृतियाँ—-
1*सुरेन्द्र वर्मा का साहित्य:परंपरा तथा समकालीनता (प्रथम संस्करण2014),(एकल)
2*ओस की बूँदे” काव्य-संग्रह (एकल)(2016)
3* प्रतिभागी रचनाकार—-सांझा संग्रह
कविता के रंग भाग-2 (2015),
भारत की प्रतिभाशाली नारी कवयित्रियां (2016),
विहग प्रीति के(2016), सत्यम प्रभात(2016)
साहित्य सागर(2016),महेन्द्र भटनागर की कविता:
संवेदना और सर्जना (2016) ,अध्यापक प्रशिक्षण हिंदी मॉडयूल( 2012,2013,2014)दोहा कलश,गीतिका है मनोरम सभी के लिये(2017)
4*संपादित ई-बुक —श्रमिक का अनकहा दर्द
प्रकाशनाधीन—
स्पर्श (गज़ल संग्रह),मुस्कुराते दर्द(संपादित काव्य संग्रह)
प्राप्त सम्मान——
जिला अध्यापक सम्मान 2014
आदर्श शिक्षक सम्मान 2013,2015
लेखिका सम्मान 2015
राज्य शैक्षणिक साहित्यिक प्रशंसा पत्र 2010
अंतरराष्ट्रीय आदर्श शिक्षक सम्मान 2015
नारी गौरव सम्मान2016
मुक्तक लोक सारस्वत सम्मान2016
युग सुरभि सम्मान(2016)
साहित्यकार सम्मान(2016)
संपर्क– ग्रीन एवनियू,घुमान रोड , तहसील बाबा बकाला , मेहता चौंक१४३११४,अमृतसर(पंजाब)
मो–7087775713,
ईमेल—-drpurnima01.dpr@gmail.com
फेसबुक —https://www.facebook.com/purnima .rai.96592
https://www.youtu.be/Drpurnima Rai
www.achintsahitya.com
https://plus.google.com/Drpurnima Rai

चोका—

मात यशोदा
चलते हुये देखती
माखन चोर
गोप ग्वालों का सखा
नंद गोपाल
करे अठखेलियाँ
कभी गिरता
संभाल लेती है माँ
सीने में दिल
प्रेमासिक्त ममता
वक्त की मार
कृष्ण हो गया शुक्ल
माँ का हृदय
हुआ अब छलनी
कराहों से भी
परत-दर-परत
छलके प्रेम
पुत्र वियोग में भी
धैर्य की चक्की
निरंतर चलाती
टूटती साँसें
सरसर पत्तों की
सूखती डाली
ठूँठ है तरुवर
खोखले रिश्ते
पिरो रही माला में
बिना गाँठ के
निर्मल जल जैसी
सहनशक्ति
और वत्सलता से
जीत जाती संसार!

***********************************

सेदोका( Dr Purnima Rai)

जिन्दगी धूप
माँ सुख-दुख छाँव
साँझ में परछाई
हुई धुँधली
अधेड़ावस्था में माँ
ढूँढे अपने साये !!

2)
विगत स्मृति
खिंची माथे लकीर
तड़प रही है माँ
आई सी यू में
पथराये हैं नैन
खोज रही है पुत्र!!

3) बेचैन बेटा
भूला नहीं है माँ को
रोता मृत जमीर
पुत्रवधू ने
छीन लिया उनसे
जब कोख का लाल!!

वेबसाईट पर आने का आप सभी सुधी पाठकों का हार्दिक आभार…..

जय मातृ शक्ति!!

 

 

 

 

 

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अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

13 COMMENTS

  1. मेरी रचना को स्थान देने हेतु हृदयतल से बहुत बहुत आभार आदरणीया

    • हार्दिक आभार आदरणीय रामेश्वर काम्बोज जी!!आपकी प्रतिक्रिया लेखन का सशक्त आधार है.

  2. प्रिय पूर्णिमा राॅय जी ने मातृ दिवस विशेषांक के अंतर्गत कवि कवयित्रियों की उम्दा रचनाएँ पढ़वाईं । सभी रचनाकारों व पूर्णिमा जी को माँ की ममताको सारर्थता से विश्लेषित करने के लिये हार्दिक बधाई ।

  3. बहुत शानदार संयोजन। बधाई। हर रचना दिल को छूने वाली। सबको बधाई।

  4. आपका यह प्रयास मुझे बेहद अच्छा लगा बधाई
    कवि अशोक गोयल
    09259053955
    09457759878
    आगे आप का कोन सा विशेषांक होगाऔर कब होगा बताने का कष्ट करें ताकि मुझे भी अपनी रचना प्रकाशित कराने का अवसर प्राप्त हो सके।

    • नमस्कार आ.अशोक जी,
      आप पर्यावरण संबंधी अपनी रचना गद्य यां पद्य में 25
      मई तक संक्षेप परिचय एवं फोटो सहित 7087775713 my contact वात्सैप पर भिजवा दें….हार्दिक आभार

  5. पूर्णिमा दी हमारी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार…!!

  6. सादर आभार पूर्णिमा जी ….सभी रचनाकरों को हार्दिक बधाई..सभी रचनाएँ सराहनीय ।

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