मातृ दिवस मई 2017विशेषांक—2by Dr Purnima Rai

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 माँ बिन सूना जीवन आँगन

   मातृदिवस मई,2017

      विशेषांक—2

इस अंक में—-

(1)डाॅ.सुषमा गुप्ता—-माँ  (कविता)
(2)अनीला बत्रा–माँ,तुम्हें नमन(कविता) 
(3)डॉ.शील कौशिक—फिर कभी मन्दिर नहीं गई  (कविता)
(4)मीनाक्षी सुकुमारन — माँ का रिश्ता
(5)रंजना नौटियाल–माँ,तुम लौट क्यों न आती
(6) मधु छाबडा ‘महक’–माँ,कोई शब्द नहीं
(7)दीपक कुमार—माँ,एक मार्गदर्शक
(8)प्रमोद सनाढ्य–मेरी प्यारी अनपढ़ माँ
 (9)मनमोहन सिंह भाटिया–गज़ल
 (10)भूपिंद्र कौर —माँ (कविता)
 (11)दीपिका कुमारी —माँ यही हैसपना
(12)शशि देवली—माँ,ममता की चादर
 (13)राकेश पाण्डेय -माँँ,मेरा संसार
 (14—राजन—माँ!मेरा अस्तित्व
(15)जयकुमार–माँ की ममता
(16)डॉ.भावना कुँअर—अम्मा की याद
(17)संजीत सिंह—-दोहे
(18)डॉ.हरिभजन प्रियदर्शी—सृष्टिपालक माँ
(19)डॉ.यासमीन खान—-माँ..माँ..माँ
(20)डॉ.पूर्णिमा राय—-स्पर्श (लघुकथा)

 

0——संपादकीय——0

मदर डे //मातृदिवस  मई,2017 विशेषांक-1 (6/5/17) में आप अभी तक 20 रचनाकारों की 22 रचनाएं पढ़ चुके हैं ।इन रचनाओं में माँ के प्रति असीम प्रेम रचनाकार की महज कोरी कल्पना नहीं है वरन् अपने जीवन अनुभवों को सजग पाठक के समक्ष रखकर यह सिद्ध किया है कि माँ के लिये वर्ष का एक दिन ही नहीं ,वरन् हर घड़ी ,हर पल समर्पित हो जाये तो ही हमारे दुनिया में आने का लक्ष्य सार्थक होगा।साहित्य समाज का दर्पण है ,बहुत बार सुना है ,देखा है ,परखा है।यही इंगित हुआ कि रचनाकार ,बुद्धिजीवी वर्ग ने ऐसे साहित्य को समाज में प्रस्तुत किया जो वक्त की माँग अनुसार सटीक था।आज के बदलते परिवेश में समस्याओं को बड़ी तेजी से सबके सामने रखा जा रहा है,उनका समाधान करना कोई नहीं चाहता।बस बाल की खाल खींचने में कोई ज़रा सी भी देर नहीं लगाना चाहता। बदलते रिश्तों में आपसी प्रेम का बीज कौन पैदा करेगा।निश्चित है ,वही व्यक्ति ,जो उन रिश्तों को झेल रहा होगा!!ऐसा ही सब सोचते हैं।यहाँ जरुरत पड़ती है, ऐसे साहित्य की जो लोगों को दिशा दिखाये ,जो रिश्तों की टूटन को ही नहीं वरन् उनको जोड़ने का हल भी बताये।कत्लेआम,बुजुर्गों की दिन- प्रति-दिन बिगड़ती हालत का जिक्र अवश्य हो ,पर उससे अधिक आवश्यकता है ,अभिभावकों और बुजुर्गों की अहमियत ,आपसी प्रेम ,उनसे प्राप्त रिश्तों में मिला ठहराव समाज में साहित्य के माध्यम से दिखाने का!!बस यही लक्ष्य लेकर हम रचनाकारों का कारवाँ निकल पड़ा। उसी लड़ी में पेश है –मातृदिवस विशेषांक–2!! साहित्य क्षेत्र में विशेष व्यक्तित्व के धनी और सहृदय रचनाकारों का इस अंक को निकालने में विशेष योगदान देने हेतु हार्दिक आभार !! माँ के प्रति यह सृजन तो मात्र सागर के पानी में पत्थर फैंकने पर हुई क्षणिक हलचल का प्रतीक है ।वहाँ सागर के पानी में हलचल हुई,यहाँ अहसाओं और अनुभवजन्य विचार कौंधे ,छटपटाहट हुई,स्मृतियाँ उभरी और एक ध्वनि अंतर्मन से निकली माँ!!!

 डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर

 

      

(1)डाॅ.सुषमा गुप्ता 

जन्म —-21 जुलाई 1976
जन्म स्थान —  दिल्ली 
शिक्षा —एम. काॅम (दिल्ली युनिवर्सिटी ),एम.बी.ए (आई एम टी गाजियाबाद),एल एल बी,पी एच डी,(मेरठ यूनिवर्सिटी)                     
पिता –श्री रमेशचंद्र गुप्ता 
माता –श्रीमती कान्ता गुप्ता 
पति —श्री अतुल गुप्ता 
स्थाई पता— 327/सेक्टर 16A,फरीदाबाद 
                 पिन 12100,हरियाणा 
ई मेल —-  suumi@rediffmail.com
कार्य-अनुभव —कानून एवं मानव संस्थान की व्याख्याता,2007-2014 (आई एम टी गाजियाबाद )

माँ (कविता)

माँ तुम माँ सी 
क्यों नही हो ?
तुम क्यों लगती हो 
बंधन सी ?
क्यों रखती हो 
मुझे यूँ जकड़ के ?
बहुत सी नसीहतों 
बहुत से रिवाजों 
बहुत सी परम्पराओं 
के दायरों में बाँध के …
बोलो न माँ ?
तुम माँ सी 
क्यों नही हो ?——
ऐसे जाने कितने 
सवाल मेरे नन्हे से 
मन को बचपन 
और जवानी की 
दहलीज़ पर घेरे रहे …..
जाने कितने 
उबाल गुस्से के …
जाने कितनी शिकायतें
लिए मन ही मन  ….
माँ मैं तेरे लिए …
एक दिन चली आई 
इस बाहरी दुनिया में . .
तेरी दहलीज़ से परे 
तेरे दायरों की 
परिधि से बाहर …
अब पत्नी हूँ 
अब माँ हूँ 
अब बहू हूँ 
बहुत से रिश्तों
में टुकड़ा टुकड़ा बंटी हूँ ।
पर तरस रही हूँ ………
तरस रही हूँ माँ फिर से 
सिर्फ़ तेरी बेटी 
बन जाने के लिए ….
सिर्फ़ और सिर्फ़ 
तेरे परिधि में 
निश्चिंत गुनगुनाने के लिए ….
आज जब माँ हूँ 
एक बेटी की मैं ….
आज जब वो दिखती है 
जवान होती मुझे ….
सब समझ आती हैं 
तेरी विवशताएँ….
तेरे बंधनों के डर …
अब माँ तुम 
माँ सी लगती हो 
सिर्फ़ और सिर्फ़
प्यारी माँ सी लगती हो ।
माँ जाने क्यों अब
तुम बहुत याद आती हो 
माँ का अर्थ अब 
समझ पाई हूँ मैं 
माँ तुम माँ सी ही 
तो सदा लगती हो !!
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 (2) अनीला बत्रा

जन्मतिथि– 4 दिसंबर 
सम्प्रति-  हिन्दी मिस्ट्रैस,जालंधर 
शिक्षा–एम.ए.(हिन्दी)बी.एड.
निवास स्थान–जालंधर।

माँ तुम्हें नमन  (कविता)

माँ
मेरी तोतली ज़ुबान के बोल भी न 
कैसे समझ जाती थी,
माँ मेरी तो मुझे अपनी पलकों पर बिठाती थी।
अपनी नन्ही बुद्धि के अनसुलझे सवालों के
 जवाब जब न मैं पाती थी,
माँ अपने समृद्ध ज्ञान कोष से 
सब चुटकी में हल कर जाती थी।
अपनी जीवन धारा को कब क्या मोड़ दूँ 
न निश्चय कर पाती थी,
तब माँ मेरे जीवन का
 सर्वोत्तम चुनाव कर जाती थी।
नए संसार में मन के भावों को जब
 मैं  रोक न पाती थी,
माँ मुझे सबके हृदय को 
जीतना सिखलाती थी।
एक बेटी,बहन,पत्नी,बहु और माँ के कर्तव्य
 मैं बखूबी निभाती थी,
तो मेरी प्रेरणा स्तोत्र माँ
 गर्व से मुस्काती थी।
हे ईश्वर, आज फिर एक बार मैं श्रद्धा सुमन चढ़ाती हूँ, 
मेरी माँ जैसी सबकी माँ हो,गीत यही मैं गाती हूँ।
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  (3) डॉ.शील कौशिक

मेजर हाउस-17,
हुड्डा,सेक्टर-20,सिरसा-125055(हरियाणा)
मो.न.-09416847107

फिर कभी मन्दिर नहीं गई (कविता)

मां नहीं है 
पर संभाले हूं मैं 
उनका पुराना चश्मा 
जिससे झांकती 
उनकी आंखें 
रोक देती हैं मुझे 
अगली गलती 
दोहराने से पहले ।
चारपाई के नीचे 
रखी उनकी चप्पलें 
देती हैं गति 
बर्फ हो गए 
मेरे पैरों को 
कोने में खड़ी 
बैंत की मूठ पर 
रखा उनका हाथ 
सुझा देता है 
मुझे राह 
अगली ठोकर 
खाने से पहले ।
मां की चारपाई के पास तिपाई पर रखा 
वह पानी का घड़ा 
जिसमें से पीकर 
फिर कभी कोई 
प्यासा न रहा ।
सिरहाने के नीचे 
रखा सूईं- धागा 
कुटुम्ब को जोड़े 
रखने को मुझे कहता ।
और मां का वह कमरा जो बन गया है पूजास्थल मेरे लिए जिसे पाकर मैं फिर कभी मन्दिर नहीं गई।
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(4)  मीनाक्षी सुकुमारन 

जन्मतिथि : 18 सितंबर, नई दिल्ली
शिक्षा : एम ए (हिन्दी) एम ए (इंग्लिश
लेखन विधा : मुक्त
प्रकाशन :    निजी काव्य संकलन
“भाव सरिता ” व् “ अहसास ए अल्फाज़ ” प्रकाशित |
अनेक साँझा संग्रह में प्रतिभागी रचनाकार,अनेक साहित्यिक सम्मान प्राप्त किये एवं अनेक पत्र पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन जारी,साहित्य क्षेत्र में जाना पहचाना नाम !!
ई-मेल :virgo 67@ymail.com
मोबाइल   : 9810862418
संपर्क– D -214 रेल नगर प्लाट न ए – 1 सेक्टर- 50 नॉएडा (यू .पी) 201301

       माँ का रिश्ता

हमेशा से ही सुनते आए हैं
 “भगवान हर जगह नहीं हो सकता
 इसलिए वह माँ के रूप में सदैव 
हमारे पास रहता है”।
कितना सच है न
 गर्भ से जन्म देने से लालन-पालन ,
देख-भाल में वो माँ ही है 
जो सदा ही आपके पास ,
आपके साथ साये की तरह रहती है।
मेरी माँ बचपन से ही मेरी सखी,
 मेरी बहन भी रही हैं क्योंकि 
कोई बहन न होने के कारण और बहुत ही रिज़र्व थे इसलिए सखियाँ भी नहीं थी
सिर्फ माँ ही रही हैं जिनसे हर बात कही हमने।
माँ ने भी जहाँ ज़रूरी होता 
माँ की तरह डांट लगाती, बहन की तरह संभालती और सखी की तरह स्नेह देती।
इसलिए कभी किसी और की 
ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई कभी।
एक बहुत ही प्यारा सा बंधन रहा है 
हम माँ-बेटी का 
जो आज भी उतना ही प्रगाढ़ है। 
कितने साल , कितने मौसम , 
कितने ही उम्र के पड़ाव 
पर ये रिश्ता आज भी
 बचपन की गोद जैसा है।
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(5) रंजना नौटियाल

संपर्क–बी-180डी डी ए ,फ्लैटस,कालका जी,नई दिल्ली—110019,नजदीक गोविंदपुरा।
मो– 8527223888
ईमेल–nautiyalranjna.75@gmail.com

माँ ,तुम लौट  क्यूँ  नही आती!!

माँ तुम लौट क्यूँ नही आती
साँझ ढले मिलते है किवाड़ बंद
बेसब्र सी चलती ,तुम  नज़र नही  आती
माँ तुम लौट क्यूँ  नही आती!
थाली मे मिलती है सब्जी तरकारी
सिलबट्टे मे पीसी चटनी कोई नही बनाती
दाल भात के साथ नहींं मिलता दहींं अचार
किसी की आँखोंं मे मेरी फिक्र नज़र नहींं आती
माँ तुम लौट क्यूँ नहीं  आती!!
दिन बीते कई न तेल लगाया बालोंं मेंं
हल्के बालोंं की मालिश बहुत याद आती
माँ तुम लौट क्यूँ नही आती!!
कहने को तो सब हैंं इस सर्दी मेंं
तसले मे रखी कोयले की आग
मेरे तन को नहींं गरमाती
माँ तुम लौट क्यूँ नही  आती!!
घर है बच्चे हैं परिवार बड़ा है
तुझ सा जग मेंं कौन खरा है
तेरी कमी कोई पूरी नही कर पाता
माँ  ,तुम लौट  क्यूँ  नही आती!!
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(6) मधु छाबडा ‘महक’

पिता—श्री किरण देव खन्ना 
माता-श्रीमती ऋतु खन्ना 
शिक्षा–एम॰ ए०
रूचि—-लेखन–गद्य एवं पद्य
प्रतिभागी रचनाकार—-शब्दों के रंग (सांंझा काव्य –संग्रह)अनकहे जज्बात (सांंझा काव्य-संग्रह )
सत्यम प्रभात (सांंझा काव्य-संग्रह )
अंतर्मन की खोज (प्रेरक साझा कहानी संग्रह )एवं
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन
एकल काव्य संग्रह “सफ़र – मेरी रूह का” प्रकाशनाधीन
सम्पर्क—
एफ़ /बी -28, टैगोर गार्डन , नई दिल्ली 110027
ईमेल-Chhabramadhu2508@gmaul.com

माँ !!कोई शब्द नहीं

लिखने जो बैठी 
शब्द कुछ ‘माँ’ पर..
न आया समझ कुछ
रह गया बोझ सा 
हाँ पर..
समझ आया ये
कि …
माँ कोई शब्द नहीं
कि…
माँ कोई शख्स नहीं
कि …
माँ कोई स्वप्न नहीं
कि …
माँ कोई सम्बन्ध नहीं
….”माँ”….
जिसमे बसी पूरी दुनिया है
….”माँ”….
जो मेरा आधार है
….”माँ”….
जो जन्मदाता है
….”माँ”….
जो पालनहार है
सब दुःख खुद सह लेती है
सब सुख मुझे दे देती है..
आँचल में छुपाकर अपने
मेरे सपने संजो देती है..
जो मुझको पूरा करती है
जो मेरे लिए ही जीती है..
जिसके लिए बस मैं ही
उसका पूरा संसार हूँ..
कैसे उसे सीमित कर दूँ???
चंद शब्दों के बाँध में..
वो तो है असीमित क्षितिज..,,
चारों ओर बस मेरे लिए…
कि मैं उड़ सकूँ खुले आकाश में
वो तो है धैर्यशील धरा..,,
जो समेट लेती अपने में..
मेरे सारे दुःख…गम..
फिर कैसे कर दूँ उसे???
मैं चंद शब्दों में बयां..
बस इतना है पता
वो जो है
सबकुछ मेरे लिए
वो है मेरी
“माँ”
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   (7)   दीपक कुमार

हिंदी शिक्षक  (जालंधर)

जन्म तिथि –24फरवरी 

मो–9417457642

रूचि —-कविता सृजन  /लघुकथा 

 माँ! एक मार्गदर्शक

दुनिया के श्रेष्ठ शब्दों में से सबसे श्रेष्ठ शब्द है माँ।
धरा के जैसा स्वरूप धारण किए खड़ी है माँ,
सागर जैसा गहरा प्यार लिए खड़ी है माँ,
स्वर्ग के द्वार धरती पर उतार लाई है माँ,
गंगा सी पवित्रता लेकर उद्धार कर रही है माँ,
जीह्वा पर बालक के सरस्वती उतारती माँ,
सूर्य उदय से पहले आँगन में धूप खिलाती माँ,
भूमिकाएं अनेक निभा कर भी न थक पाती माँ,
बच्चों को आत्मबल का ज्ञान करवाने वाली माँ,
शिवाजी सरीखे चरित्रवान बनाने वाली माँ,
अंत समय भी संतान का कल्याण चाहे माँ,
किन किन रूपों में तुम्हे नमन करूँ मैं
मुझे हर पल राह दिखाने वाली माँ।
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(8) प्रमोद सनाढ्य”प्रमोद”

जन्म—- 21 जून1956
शिक्षा—-सिविल इंजीनियर
पता—- “सत्यम्”गोकुल नगर
          आर टी दी सी रोड
          लालबाग’ नाथद्वारा
         जिला:- राजसमंद(राज.)
मो.न—919414232515

मेरी प्यारीअनपढ़ अम्मा

“10×10” के कमरे की कीमत 
नहीं  समझती
     “मेरी प्यारी अनपढ़ माँ”
लगी रेट सीमेंट,की कीमत
          नहीं समझती
मेरी प्यारी अनपढ़”अम्मा”पर,
 बैठ  के आंगन की डेली पर,
            मांड रंगोली प्यार की,
भरने होंगे रंग कौन से
           संस्कार, सत्कार  के
इतना खूब समझ लेती वो
 मेरी प्यारी अनपढ़ “अम्मा”
रिश्तो की पहचान बनाना
      बना उसे फिर खूब निभाना
बिगड़े हों हालात अगर तो
      कैसे उनको मधुर  बनाना
ताऊ, ताई, भुआ, भाई 
       काकी,काके बाहर घर के
जेठ, जेठानी देवर,भाभी  
     कैसा छल्ला,किसकी चाबी 
किसको ज्यादा, किस को कम 
     किसे प्यार और इसको दम 
घर भर के सारे लोगों की
  अलग अलग पहचान जानती
मेरी प्यारी  अनपढ़ “अम्मा”
कभी राम की रामायण  तो
      कभी सुनाती सब को गीता
किसने किसको कब कब मारा 
 कौन किसी से  कब कब जीता
गई नहीं स्कूल कभी वो
       या अंजुमन के दरवाजे पर,
 पढ़े लिखों को  खूब पढ़ाती 
      दुनिया का इतिहास बनाती
 “मेरी प्यारी अनपढ़ माँ”
कभी ब्याह के गीत सुनाती
       कभी  रीत की रीत बताती
बेटी को  ससुराल दिखा कर
        बहुओं में वो प्रीत जगाती 
भर भर मुट्ठी  गेँहू वारती
     वार देख कर कार उतारती
कौन है अपना कौन पराया 
  किसके किस को कहाँ सताया
हंसते-हंसते पल भर में ही
  हम सब को भीसमझा देती वो
“मेरी  प्यारी अनपढ़ माँ”
अब मैं कैसे कह दूं  उसको
“मेरी प्यारी अनपढ़ अम्मा”
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(9) मनमोहन सिंह भाटिया 

माता का नाम —स्वर्गीय बसंत कौर 
पिता का नाम —-स्वर्गीय भाग सिंह 
पता —-551 क/4-1, भिलावाँ , आलमबाग , लखनऊ 226005 
मोबाइल —-7860066655

गज़ल

माँ मुझे जब भी याद आती है 
याद उसकी बहुत रुलाती है
दूध का क़र्ज़ रह गया बाकी
बात दिन रात ये सताती है
तू मिरे आस पास है अब भी
तेरी खुशबू अभी भी आती है
गम के सेहरा में आज भी रस्ता
 तेरी ममता मुझे दिखाती है
खुद तो सोती है गीले में लेकिन 
हमको सूखे में तू सुलाती है
दूध की शक्ल में जो बच्चों को 
अपना खून ए जिगर पिलाती है
ये बताओ जमाने भर में कहीं
माँ से बेहतर भी कोई थाती है
बाँट कर सारी खुशियाँ बच्चों को
 ‘दर्द’ खुद का सदा छुपाती है
***************************************

(10) भूपिंद्र कौर 

शिक्षा—-एम.ए( हिंदी) साहित्य 
रूचि—–लेखन —कहानी, कविता, पुस्तक समीक्षा,संस्मरण 
प्रकाशन– वो हुए न हमारे (कथा-संग्रह)
सम्प्रति—सेवानिवृत्त शिक्षिका
1982 में जैसलमेर में एयर फोर्स स्कूल और सेंट्रल स्कूल में अध्यापन कार्य 
2000 से 2008 तक सेंट थेरेसास स्कूल में अध्यापन कार्य 
संपर्क—
36 प्रकाश नगर, बिजली कालोनी, गोविंद पुरा ,भोपाल (मध्य प्रदेश)

 माँ (कविता )

माँ 
न जीती अर्धांग बिना 
न जीती स्वअंश बिना 
हो करबद्ध झुकाती वह 
नित शीष आगे सच्चे के। 
जुड़ी अर्धांग से स्वअंश से पूर्व 
देती महत्ता दोनों को भरपूर
 न करती भेदभाव सेवा में उनकी 
रत रहती संवारने जीवन उनका 
होती दुखी दोनों के दु:ख से 
माँगती सुख अपने मुख से 
हरती बाधाएँ कर बिनती प्रभु से 
बीनती नित शूल राहों के उनकी। 
तज जखीरा स्वार्थों का 
त्याग कर स्वाभिमान अपना 
रहती रत उनकी खुशियों से 
तत्पर सदा भरने को झोली अपनी। 
**************************************

(11)दीपिका कुमारी दीप्ति

पिता- श्री बैजनाथ यादव
माता- श्रीमति विंध्यावाशनी देवी
जन्म – 08 फरवरी
शैक्षिक योग्यता- बी.एस. सी , बी. एड, एम. ए.(हिन्दी)
संप्रति – जवाहर नवोदय विद्यालय (विज्ञान अध्यापिका)
लेखन – कविता, कहानी, निबन्ध, लेख, नाटक, एकांकी, मुक्तक आदि। अॉनलाइन एवं अन्य पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित एवम् साहित्यिक मंच से जुड़ाव।

संपर्क
ग्राम-करहरा, पोस्ट- सेहरा, थाना-सिगोड़ी,
अनुमंडल- पालीगंज,जिला – पटना (बिहार)
पिन कोड- 801110
ईमेल- dpkadeepti@gmail.com

माँ ,मेरा यही है सपना

माँ मेरा बस यही है सपना
तेरे सपनों को पूरा कर दूँ
तेरे ममतामय आँचल में
दुनिया की सारी खुशियाँ भर दूँ

खाना लेके दौड़ती थी पीछे
आज मैं तुझे खिलाऊँगी,
थपकियाँ दे मुझे सुलाया
तू सो आज मैं लोरी गाऊँगी।

ऊंगली पकड़ चलना सिखाया
मेरे लिए आँखों में रैन गुजारा
जीवन नैया डगमगाने लगी तो
मैं बनूँगी माँ तेरा तिनका सहारा

भगवान मेरी विनती आज सुन ले
मेरी माँ को तू चाँद की उमर दे
जीवन का हर सुख मिले उसे
चाहे बदले में मेरी खुशी कम कर दे

जीवन से ज्यादा चाहा मुझे
भगवान से भी तू है पहले
स्वर्ग का सुख छोड़ के माँ
रहना चाहूँ तेरे आँचल तले

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(12) शशि देवली
पिता- श्री जनार्दन प्रसाद डिमरी
माता-श्रीमती शकुन्तला डिमरी
जन्मतिथि- 25/02/1977
जन्मस्थान- तिरुवनन्तपुरम (केरल)
शिक्षा – बी एस सी,एम ए, बी एड, एम एड,शिक्षा विशारद
प्रकाशित पुस्तक – मुड़ के देखना कभी (एकल काव्य संग्रह )
सम्पर्क – निकट गोपीनाथ मन्दिर
मन्दिर मार्ग
गोपेश्वर चमोली उत्तराखंड
मोबाइल नम्बर- 9997716536

माँ !ममता की चादर

मैं गुम थी जाने किस दुनिया में
तू मुझको दुनिया में लायी माँ
मेरे नाजुक तन पर तूने
ममता की चादर फहरायी माँ ।

मैंने जब-जब चलना सीखा
काँटो ने जब राह भटकाई
तूने तब-तब हाथ थामकर
मेरी राह आसान बनाई।

तूने जीवन मेरा साकार किया
खुशियों का संसार दिया
आँसू मिले जब-जब भी मुझको
तूने आँचल में छुपा लिया।

माँ तेरी करुणा का सार नहीं
तू जग का विस्तार है माँ
ईश की मूरत में तेरा रूप
बस सच्चा एक तेरा प्यार है माँ ।

ईश्वर से बस विनती यही
दुनिया में जब-जब आऊँ मैं
तेरी ही कोख मिले हर जन्,म माँ
तुझसे ही जीवन नया पाऊँ मैं ।

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(13)राकेश पाण्डेय “विधु”
(Assistant Teacher)
M.Sc., M.A., B.Ed.
जन्म -1 जुलाई 1988
जिला -बरेली
Mobile-8126159400

माँ ,मेरा संसार

जन्म लेते ही,
जब मैं था रोने लगा।
तब लिपटकर,
तुझसे माँ!
एहसास ये होने लगा।
बनकर शिशु तो आ गया हूँ,
पर मेरा संसार तुम हो!
और इस संसार में,
मुझको माँ वरदान तुम हो!
तुम प्रेम का हो समंदर,
स्नेह की बौछार हो
सबको पता है मेरी माँ!
मेरा पहला प्यार तुम हो।

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(14)राजन

जन्मतिथि—-23 जनवरी
शैक्षिक योग्यता —एम.ए (हिंदी,अंग्रेजी, इतिहास,बी.एड)
संप्रति—शिक्षक,पंजाब स्कूल शिक्षा विभाग
रूचि —-काव्य सृजन,सांस्कृतिक कार्यक्रम में भागीदारी

संपर्क–1746-ए गली न. 7-ए
जुझार सिंह ऐवन्यू, अजनाला रोड
अमृतसर (143001),पंजाब
मो——–9501003567

मां :मेरा अस्तित्व

क्या है मां
क्या है उसकी ममता
अब तक न कोई समझा
न कोई जाना
बस इतना कहूँगा
सृष्टि की उत्तम सृजन है मां
न न न
सृष्टि का वजूद है मां।
क्यों हम बहन बीवी को
मां के समानान्तर देखते हैं
ऐसा करके हम अपने ही वजूद
के संग धोखा करते हैं।
मां का कोई सानी नहीं है
मां जैसा कोई दानी नहीं है।
मां सम कोई समझदार नहीं है
मां सम कोई पालनहार नहीं है।
मां ममता की मूरत है
मां मुझमें तेरी सूरत है।
मां पल-पल कष्ट सहती है
पर फिर भी हंसती रहती है।
जब जब बच्चों पर विपदा आयीं
तब-तब माँ की सांसें कराही।
अपनों की विपदा हरने को
काली ,दुर्गा ,यशोदा कहलायी।
कष्ट सारे अपने अंदर समेट लेती
पर हमेशा हर्ष दिखलाती मां।
इतना कुछ करने पर भी
तिरस्कृत क्यों होती मां?
जग के तूफानों को रोक लेती फिर
क्यों तिनके मानिंद तोड़ी जाती मां

समय रहते अपने
अस्तित्व को पहचानों *राजन*
मां को हरेक दुःख विपदा
कष्ट से बचा लो *राजन*!

***********************


(15) जयकुमार

जन्म स्थान : जयपुर, राजस्थान
जन्म तारीख :21/09/1986
शैक्षणिक योग्यता : एम.कॉम (राजस्थान) एम. बी. ए (पुणे)
स्थाई पता : 1/292 मालवीय नगर, जयपुर ई – मेल : mba_jai@yahoo.in

माँ की ममता

अपने दूध से देती जीवन,
कोक में रखके उसे बनाती है,

जन्म देकर बच्चे को,
औरत माँ बन जाती है।

कभी दिन में दर्द सहती,
कभी रातें बेचैन है करती,

फ़िर पूरी उम्र माँ,
माँ का हर फर्ज़ निभाती है।

आज माँ की ममता शायद,
एक दिन की मोहताज़ है,
कभी अखबार, कभी समाचार,
माँ दिवस की याद दिलाती है।

********************************************

(16)  डॉ० भावना  कुँअर

जन्म –12 फ़रवरी , मुज़फ्फ़रनगर
निवास स्थान — ऑस्ट्रेलिया (सिडनी)
शिक्षा    —हिन्दी व संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि, बी० एड०, पी-एच०डी० (हिन्दी)  तीन विषयों में डिप्लोमा।
शोध-विषय  – साठोत्तरी हिन्दी गज़लों में विद्रोह के स्वर व उसके विविध आयाम
प्रकाशित पुस्तकें  : तारों की चूनर, धूपके खरगोश ( हाइकु संग्रह),जाग उठी चुभन( सेदोका-संग्रह), परिन्दे कब लौटे(चोका-संग्रह) साठोत्तरी हिन्दी गज़ल में विद्रोह के स्वर (पी-एच०डी०का शोध प्रबन्ध),अक्षर सरिता,शब्द सरिता,स्वर सरिता(प्राथमिक कक्षाओं के लिए हिन्दी भाषा-शिक्षण की शृंखला),भाषा मंजूषा में कक्षा 7 के पाठ्यक्रम में एक यात्रा–संस्मरण।

संपादन   —चन्दनमन (हाइकु-संग्रह), भाव कलश (ताँका संग्रह), गीत सरिता (बालगीतों का संग्रह तीन  भाग),यादो के पाखी  (हाइकुसंग्रह),अलसाई चाँदनी (सेदोका संग्रह), उजास साथ रखना (चोका-संग्रह), डॉ०सुधा गुप्ता के हाइकु में प्रकृति (अनुशीलनग्रन्थ),हाइकु काव्यःशिल्प एवं अनुभूति (एक बहु आयामी अध्ययन)।

  सदस्य – संपादक  समिति सिडनी से प्रकाशित “हिन्दी गौरव” मासिक पत्रिका
संपादक कैनेडा से प्रकाशित-“हिन्दी-चेतना” त्रैमासिक पत्रिका
संप्रति  -स्वतन्त्र लेखन और सिडनी में सेवारत।
अभिरुचि   – साहित्य लेखन, अध्ययन,चित्रकला एवं देश-विदेश की यात्रा करना।
संपर्क  –bhawnak2002@yahoo.co.in/ bhawnak2002@gmail.com

अम्मा की याद

 आज मुझे फिर अम्मा याद आई है
छूकर हवा जब मुझको है लौटी
याद आई है मुझे अम्मा की रोटी।
नहीं भूल पायी हूँ आज भी
उस रोटी की सौंधी-सौधीं खुशबू को
मिल बैठकर खाने के
उस प्यारे से अपनेपन को
साँझ ढलते ही
नीम के पेड़ की छाँव में
अपनी अम्मा के
सुहाने से उस गाँव में
चौकड़ी लगाकर सबका  बैठना
फिर दादा संग किस्से कहानियाँ सुनना,सुनाना।
नहीं भूली मैं खेत-खलिहानों को
उन कच्चे- पक्के आमों को ।
जब अम्मा याद आती है 
तब तब आँखें भर-भर जाती हैं।
खोजती हूँ उनको
खेतों में खलिहानों में
उस नीम की छाँव में
उन कहानियों में,उन गानों में
पर अम्मा नहीं दिखती
बस दिखती परछाई है।
न जाने ऊपर वाले ने
ये कैसी रीत चलाई है
हर बार ही किसी अपने से
देता हमें जुदाई है
और इस दिल के घरौंदें में
बस यादें ही बसाई हैं।
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(17)संजीत सिंह

पिता – श्री अमर सिंह
माता – श्रीमती प्रेमलता
जन्मतिथि – 10/12/1994

शिक्षा – एम० एस-सी०, बी०एड०

मो- 8924892888

ईमेल- ssanjeet414@gmail.com

पता — हरपालपुर हरदोई (उ० प्र०)

दोहे

माता है सबसे बड़ी , महिमा अपरम्पार ।
जन्मे माँ के गर्भ से , राम कृष्ण अवतार ।।

पूजा माँ की सब करें , देव, मनुज अरु भूप।
माँ का अनुपम प्रेम है , ज्यों सर्दी की धूप ।।

माँ ममता की खान है, महिमावान अनन्त ।
रूठे माँ पतझड़ समझ, माँ खुश मान बसन्त ।।

नैन भरे हैं नीर से , आँचल में आशीष ।
माँ सम दूजा है नहीं, नित्य नवाऊँ शीश ।।

शूल भरा जग दिख रहा, कहाँ धरूँ अब पाँव ।
ना कोई अपना दिखे , माँ के सिवा न ठाँव ।।

संजीत सिंह
हरदोई

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(18) डा़ः हरिभजन प्रियदर्शी
प्रवक्ता -हिन्दी
वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय कन्या मलोट (श्री मुक्तसर साहिब )

सृष्टि पालक “माँ “

सृष्टि की पालक होती है माँ ।
जग की उद्धारक होती है माँ ।
माँ की हम पर अपार हैं कर्ज।
हमें निभाना है अपना फर्ज।।
कभी न मन उसका दूखने पाए।
सारी खुशियाँ माँ के चरणों में पाएं ।।
अमृत पिलाया तुमको जिसने,
जहर उनके लिए उगलना नहीं।
पुत्र कुपुत्र होते देखा,माता कुमाता नही।।
जब मुसीबत में हो ,तो याद आती है माँ ।
कलेजा हाथ में हो ,तब भी आशीर्वाद देती है माँ ।।
पत्थर दिल बन कभी , माँ का दिल कुचलना नहीं ।
कितने ही पत्थर पूजे उसने ,तुम्हारे रहमत के खातिर ।।
सभी तीर्थ स्थल हैं माँ के चरणों में ।
स्वर्ग भी है समाया माँ के चरणों में ।।
माँ तेरी अनुकम्पा की , होती रहे बरसात ।।
माँ बिना बच्चे की, न होती कोई औकात ।
आज जो विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ दूरदर्शी ।
माँ की आँखो का तारा हैं सभी ” प्रियदर्शी ” ।।

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(19)डॉ.यासमीन खान

माँ माँ …

माँ माँ माँ माँ माँ माँ ज़ेहन, दिल अधर पर
माँ तो व्याप्त सृष्टि में धरा से लेकर अम्बर
सोचने लगी कुछ मैं भी लिखूँ निज माँ पर
शब्द सकल ही सिकुड़ने लगे हैं लजाकर
बोले माँ की महिमा कैसे कह दें हम गाकर याद आता है माँ का वो पल पल का त्याग
कैसे कह सकें शब्द माँ का निश्छल अनुराग
इम्तिहानी तैयारी में जगती रहती वो पास
सदा दिलासा देती , होगा अच्छा रखो आसमेरे मुरझाये चेहरे को भांप लेने की वो कला
सब काज छोड़ पढ़नी मन के भीतर की ख़ला
निज दुःख छुपाने को मेरा सकपका सा जाना
माँ का मेरे मनोभाव पढ़कर नैनो से मुस्कानामाँ का दुःख में होकर भी हमें बात बेबात हंसाना
कुछ रोगों की रिपोर्ट गलत बन जाती बहलाना
अच्छे,सच्चे,नेक रास्ते पे चलने का पाठ पढ़ाना
यासमीं कठिन है माँ की भावनायें व्यक्त कर पाना
डॉ.यासमीन ख़ान
(19) डॉ०पूर्णिमा राय
जन्म-तिथि–28दिसम्बर
योग्यता —   एम .ए , बी.एड, पीएच.डी (हिंदी)
वर्तमान पता–  ग्रीन एवनियू,घुमान रोड , तहसील बाबा बकाला , मेहता चौंक१४३११४,
अमृतसर(पंजाब)

     स्पर्श (लघुकथा)

नहीं भूल सकती मैं ,वह स्पर्श। तुम्हारा मेरे गालों को  हाथ से सहलाना।अपनी मीठी छुअन से मेरे रोम-रोम को पुलकित कर देना।हर पल वही स्पर्श मुझे एक नई
स्फूर्ति देता है,नव चेतना से सराबोर कर जाता है।कितना मासूम सा तुम्हारा स्पर्श एक अपनत्व के सागर की मानिंद निश्चल है।सुबह के पाँच बजते ही अलार्म की ट्रिन-ट्रिन पर हाथ रखकर सोहा फिर बिस्तर पर ही लेटी रही।ये जानते हुए भी कि गुड़िया को स्कूल भेजना है। न चाहकर भी वह बिस्तर से चिपकी रही और कब वक्त आगे निकलने लगा,उसे पता न चला।
अर्ध सुप्तावस्था में माँ सोहा को देखकर  गुड़िया ने घड़ी पर नज़र टिकाई।उसके शांत मन में एक पल को भी न आया कि आज स्कूल जाने से छुट्टी मिल जायेगी।वह धैर्य से उठी,माँ के चेहरे पर प्यार से हाथ फेरते हुए चुंबन करते धीरे से बोली ,मम्मी ,उठो ना! प्रेम की इस अनुभूति में तुम जाने अनजाने कितना सुकून दे जाती हो,गुड़िया!!शायद तुम्हें भी नहीं पता!!सोहा ठंडी उसाँस भरती है—–!!! 
बच्चे चाहें दूर रहें यां पास ,माँ  बच्चों का प्रथम , नर्म  एवं कोमल अहसास  ,स्पर्श  कभी भूल नहीं पाती।यही स्पर्श आजीवन माँ के जीने का आधार है!!
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संपादित एवं संकलित

डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर (7087775713)

drpurnima01.dpr@gmail.com

वेबसाईट–www.achintsahitya.com

नोट—इस विशेषांक पर आप अपनी समीक्षा लिखकर दिये गये नंबर एवं ईमेल पर कंटैक्ट करके 

अपनी फोटो एवं परिचय सहित भेजियेगा..इस वेबसाइट के समीक्षा कॉलम में प्रकाशित  की जायेगी.

 
 
 
    
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