मिश्र छंद( छप्पय छंद)by Dr.Purnima Rai

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छप्पय छंदby Dr.Purnima Rai

यह छंद कुण्डलियाँ की तरह ही दो छन्दों के मेल से बनता है।इसे मिश्र छंद भी कहते हैं।रोला छंद और उल्लाला छंद के मेल से बना छंद छप्पय कहलाता है।इस छंद में कुल 6 चरण होते हैं ।पहले चार चरण रोला छंद और शेष दो चरण उल्लाला छंद के होते हैं।

रोला छंद—
रोला छंद 24 मात्रा का सममात्रिक छंद है जिस हरेक चरण में 11 और 13 मात्रा का विधान रहता है ।जिस चरण में 11 मात्रा होती है यानि प्रथम और तीसरा चरण में यति से पहले लघु होना चाहिये ।
जिस चरण में 13 मात्रा यानि दूसरा और चौथा चरण वहाँ यति पर यानि अंत में दो गुरु होना अनिवार्य है।यहाँ तुकांत साम्य अनिवार्य होता है।

उल्लाला छंद— यह 28 मात्रा का छंद है जिसमें 15 और 13 मात्रा का विधान है।पहले और तीसरे चरण में 15 मात्रा और दूसरे तथा चौथे चरण में 13 मात्रा का विधान है।दूसरे और चौथे चरण में तुक साम्य अनिवार्य है।लय हेतु इन चरणों में  लघु गुरु मात्रा रखी जाये तो बेहतरीन छंद बनता है।

छप्पय छंद (डॉ.पूर्णिमा राय)

यहाँ छप्पय( मिश्र छंद) जो रोला छंद+उल्लाला छंद के योग से बना है ,का उदाहरण दिया जा रहा है—

(1)

साजन तेरा साथ,मुझे हरपल अब भाता।
हाथों में हो हाथ,सजन क्यों देर लगाता।। –(रोला छंद)

सर्दी गर्मी धूप,चाँद सी शीतल छाया।
विकट घड़ी में खूब,सुहाता प्यारा साया।।—(रोला छंद)

सुन्दर फूल खिलें जब बाग ,मंडराता तभी भ्रमर
पतझड़ में जब सूखी डाल,साथ नहीं देता शज़र।।
(उल्लाला छंद)

(2)

बचपन के दिन चार, बहुत अब हमें रुलाते।
भाई-बहन माता, और पिता याद आते ।।(रोला छंद)

डाँट-डपट तकरार,चुभन मीठी सी देते।
मोर-पंख औ’ फूल,किताबों में रख लेते।।(रोला छंद)

तोता मैना कोयल कूक,सुने न अब तो बाग में।
रिश्तेनाते झुलसे सभी ,धन-दौलत की आग में।।
–(उल्लाला छंद)

 डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर(पंजाब)

drpurnima01.dpr@gmail.com

 

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