भावों का विस्तार(कुण्डलियाँ) by Dr Purnima Rai

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कुण्डलियाँ विषम मात्रिक छंद है। 

इसमें छः चरण होते हैं अौर प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। प्रथम दो चरण दोहा छंद से तथा शेष चार चरणों में रोला छंद होता है ।इसीलिये इसे मिश्र
छंद भी कहते हैं। पहले दोहे का अंतिम चरण ही रोला का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलियाँ का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलियाँ का समापन भी होता है।

उदाहरण
1)
चोरी-चोरी हो गया ,हमको तुमसे प्यार।
हर पल अब होने लगा,भावों का विस्तार।।
भावों का विस्तार,नयन यह राह निहारे।
गर्मी-सर्दी धूप,तन-मन को ही सँवारे।।
कहे ‘पूर्णिमा’ आज,शिव संग सजती गौरी
प्राणनाथ में साँस,दिल की हो गई चोरी।।
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2)
हालत देख किसान की,नेत्र बहाते नीर।
खाने के लाले पड़े ,नहीं बदन पर चीर।।
नहीं बदन पर चीर, हुई चमड़ी है काली।
सहता है वह दुःख ,देखकर मटके खाली।।
बरसेंगे जब मेघ,मिलेगी तब ही राहत।
मनभावन बरसात,सुधारेगी ये हालत।।

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3)
गमले में पौधा लगा,पौधे पर था नीड़।
कागा तोड़े घोंसला,नीर बहाये भीड़।।
नीर बहाये भीड़, सभी अण्डे थे फूटे
पंछी करे पुकार,सभी रिश्ते थे छूटे
गिरी ‘पूर्णिमा’ गाज़,हुये पंछी सब कमले
जन्म-मरण प्रभु हाथ,दुबारा खिलेंगे गमले।।

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4)
रोती आँख किसान की,देख फसल का हाल
क्या काटे क्या बेच दे,कैसे गुजरे साल
कैसे गुजरे साल,दिलों का हाल छिपाते
भूखे बच्चे साथ,पिता को धैर्य बँधाते
कहे पूर्णिमा” राज़ ,उगें श्रम दम से मोती
सही मिलेगा दाम,आँख फिर क्यों है रोती।।

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5)
उपवन में है शोर रे , सुन पायल झंकार।
महके महके सब लगें, अब सारे फनकार।।
अब सारे फनकार, गुलों से कैसे खिलते ।
 ढोल मृदंग के सँग ,पाँव उनके अब बजते।।
जियरा नाचे मोर, झूमते उनके तन मन ।
सुध-बुध बैठे भूल, देख कर सुंदर उपवन।।

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6)

रक्षा बन्धन आ गया, बहना का ले प्यार।
दिवस ‘पूर्णिमा’ कर सजे,रक्षाबंधन तार।।
रक्षाबंधन तार, राखियाँ प्यारी चमके ।
शाश्वत केवल प्यार, बहन के मुख पे दमके।
राखी का उपहार ,मुझे यह दे दो भिक्षा ।
महके आँगन प्यार, बहन की हरदम रक्षा।।

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7)
मनमोहक राखी चमक,फैली चारों ओर।
बहन-प्रेम के सामने,किसका चलता जोर।।
किसका चलता जोर,बदल गई मन भावना।
ये रेशम की डोर,फैलाये सद् भावना।।
देखें गर इतिहास ,मिला कर्मवती को हक।
जागे मन विश्वास ,धर्म भाई मनमोहक।।

डॉ.पूर्णिमा राय
शिक्षिका एवं लेखिका
अमृतसर(पंजाब)
Managing Editor
Business Sandesh ,(Delhi)

संपर्क–drpurnima01.dpr@gmail.com
मो–7087775713

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2 COMMENTS

  1. सुखदेव क्यामपुरियन, स्नातक हिन्दी शिक्षक

    महोदया,
    रचनाएँ अच्छी है आपकी।
    किन्तु छोटा सा सुझाव है मेरा कि
    ‘कुण्डली संख्या: 5’ में 3,4 पंक्ति में ‘खिलते’ व ‘उनके’ शब्दों में तुकान्त भिन्नता है।।।। शब्द प्रतिस्थापित करने से कुण्डली और प्रभावशाली बन सकती है ।

    आभार ।

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