ज़रा अखबार पढ़ लेना by Dr Purnima Rai

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“अखबार की कहानी उसी की ज़ुबानी” Dr Purnima Rai,Asr

हर सुबह चौंक में एक बड़ी गाड़ी आती है ,जहाँ बहुत से लोग प्रतीक्षा करते हैं…मेरी नहीं !!गंतव्य स्थान पर ले जाने वाली बस,मोटरगाड़ी की!!क्यों ,क्या हुआ?आपको !!यह सुनकर !!कोई था एक जो बेसब्री से मेरा इंतजार करता था —पढ़ने के लिये नहीं ,जनाब!मुझे बंडल में बाँधकर बेचने के लिये!!उनींदी आँखों में रंग बिरंगे सपने लिये वह हॉकर (अखबार बाँटने वाला)साढे चार बजे मुझे प्राप्त करके गठरी बाँधकर जिस जोश और उत्साह से साइकिल पर जैसे-जैसे पैडल मारता है,वैसे ही मेरे मन का अहम् जाग जाता ।और साइकिल के कैरियर पर लदा हुआ मैं इतना खुश होता कि आज तो मैं दूसरे अखबार को पछाड़ कर सबसे ऊपरी सिंहासन पर सुसज्जित हूँ।पर आह !कितना दर्द !उस रस्सी का सहन किया जो बड़ी मजबूती से मुझे जकड़े हुई थी ! अभी यह सोच ही रहा था कि हॉकर ने झटके से रस्सी खोली और मुझे छोड़कर अन्य अखबार को सबसे पहले बुजुर्ग मीर साहिब जो एक जमाने में अफसर थे,उनके दरवाजे से धड़म से पार करते हुये आँगन में पटक दिया।
भई,हम ठहरे ,आज के अखबार जो अभी अपनी अहमियत सिद्ध करने में लगे हुये हैं!वह अखबार जो प्रसिद्ध हैं ,वह कहाँ फटकने देते हमें अपने आस-पास! पर हम कौन से कम हैं।टैक्नोलॉजी के साथ वह पुराना अखबार कहाँ तक अपना वजूद बनाये रखेगा। एक ही बेहतरीन खबर जब मुझमें छपती है तो लोगों का हजूम वात्सैप ,इंटरनैट, फेसबुक इत्यादि पर आजकल इतना सलंग्न रहता है कि हमारी खबर की प्रसिद्धि करके बड़े -बड़े अखबार को मात दे देती है।
मैं वही परोसता हूँ ,जिससे लोगों का हाजमा खराब न हो,चाय का स्वाद बिगड़े नहीं।—–ओह !यह आप क्या समझ बैठे??—-/जानता हूँ,आप यही सोच रहे होंगे कि मैं बस—- गन्दा अश्लील सस्ता साहित्य यां कोई खून खराबा,—-यां अधनंगी तस्वीरें यां कत्लेआम ,सच को झूठ और झूठ को सच सिद्ध करने वाली खबरें ही ले कर आता हूँ..और अपने मालिकों की जेबें गर्म करता हूँ । न जी,—मैं तो आज भी वही अखबार हूँ,जो बच्चों का मनोरंजन करता है,जो नारियों को घरेलू कार्यों में सहयोगी जानकारी उपलब्ध करवाता हूँ,युवकों को सही दिशा दिखाने हेतु प्रयत्नशील है, रोजगार संबंधी नित नई जानकारी ले कर आता हूँ।और तो और साहित्यिक एवं शिक्षाप्रद लेख ,कवितायें ,कहानियाँ ,जनरल नॉलेज क्या नहीं देता!! महापुरुषों की जीवन गाथाएं,जीवनियाँ,धार्मिक आयोजन,सब तो छपता है ।जिस तरह जीवन के कितने रंग हैं, मैंनें वह सब रंग अपने में समाये हुयें हैं।एक समय था ,जब सरदार भगत सिंह ” बलवंत “
नाम से “प्रताप” अखबार में उपसंपादक(संपादक का सहायक)के तौर पर कार्य करते थे ।यह अखबार कानपुर से निकलता था । असैंबली में बम फैंकने की घटना को भी अखबार ने ही चीख-चीख कर हिन्दुस्तान की जनता में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति आक्रोश और आज़ादी प्राप्त करने की लालसा पुनः जीवित की थी ,आज मैं भी राष्ट्रहित में वीरों के किये बलिदान ,शहादत एवं सैनिकों की भलाई हेतु किये जा रहे कार्यों को उजागर करता हूँ।समय बदला, समय के साथ सोच बदली!मैंने वही दिखाया ,जो आप लोगों ने किया,जो आपने चाहा ,आपने जो माँगा।अर्थात् अगर समय के साथ न चलता तो आज मेरा अस्तित्व समाप्त हो जाता।आप लोग खुद बदल गये ,पर मुझे कहते ,मैं वही रहूँ,पुराने प्रारूप में!! अगर आप लोग आज खुद इंसानियत को अपनाते,राष्ट्रभक्ति दिखाते,देश प्रेम की ध्वनि बुलंद करते तो मेरी क्या औकात जो आप लोगों के विरुद्ध जाता।आपने मुझे खरीद तो लिया ,अलमारी की शोभा बनाया,शाम को रद्दी समझा और बेच दिया।कभी मचोड़कर फैंका,मेरे बाहरी शरीर को!!यह न देखा,मेरी आत्मा जो मुझ पर उकरे लफ्जों में थी,उस तक आपने अपनी पहुँच न की ।एक बात अंत में कहना चाहूँगा कि चाहे आनलाइन खबरें पढ़ते हैं,दस्तावेज सहेज कर रख लेते हैं,कागज की बचत होती है ,मशीन इंसान ने बनाई है,उससे भूल हो सकती है ,वह बिगड़ भी सकती है ,सब नष्ट भी हो सकता है ,पर जो मुझमें जो खबर एक बार छप जाता है ,उसे वक्त बीतने पर भी लोगों को लंबे अरसे बाद खोजते पाया जाता है,कहीं पुराने रद्दी वाले के पास यां मीर साहिब जैसे बुजुर्गों के पास!!

“ज़रा अखबार पढ़ लेना

कभी घर-बार पढ़ लेना”

 

 

डॉ.पूर्णिमा राय,
अमृतसर(पंजाब)

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