दोषी कौन (लघुकथा)by Dr.Purnima Rai

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  दोषी कौन (लघुकथा)


संध्या के झीने आलोक में अपनी कामधेनू के संग भुवन उम्मीदों की उड़ान भरता हुआ गाँव की पगडंडी  के बीचों-बीच झूमता-गाता एवं हर्ष से पग बढ़ाये जा रहा था।उठती गोधूलि से हवाओं में बिखरी माटी की सुगंध नस-नस को आह्लादित कर रही थी।अचानक तेज़ी से भागकर आता मनुआ भुवन की गाय से टकराते  हुये बाल-बाल बचा तब भुवन ने जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज़ें सुनी तो वह हक्का-बक्का रह गया।उसकी सारी खुशी पल भर में सिमट कर विषाद से भर गई।कितनी बार उसने पुत्र मनुआ को कहा था कि महाजन की बातों में मत आया करे।देख लिया नतीजा!!अब 14 साल के मनुआ को क्या पता था कि  महाजन ने उसे जो थैला कल्लो को देने को दिया था, उसमें कल्लो की लुटी अस्मत का ब्याज है ।बस कल्लो के पिता तो मनुआ को ही दोषी समझ रहा था और उसे पुलिस को सौंप रहा था ।निर्दोष निर्धन कहाँ गुहार करे ,अपराध का थैला जो उसके हाथ में था।न्याय सबूत माँगता है !!काश कल्लो ,समझ पाती उस रात का दोषी कौन था।

.डॉ.पूर्णिमा राय

drpurnima01.dpr@gmail.com

 

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1 COMMENT

  1. दोषी कौन एक अच्छी मार्मिक लघुकथा बनी है । थोड़ी कसी जा सकती है अभी ।तो निखार आ जाएगा । बधाई ।

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