देह का सुख by DevRaj Dadwal

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देह का सुख (लघुकथा)by देवराज डडवाल,”संजू”

दोंनों बेटों की नौकरी लगने के बाद करतारे ने उनकी शादी करने मे भी देर न की और स्वयं जिम्मेवारियों से मुक्त हो गया । वह अपने को सबसे खुशनसीब समझता कि भगवान ने दो बेटे दिए और दोंनों को ही आज के दौर मे सरकारी नौकरी भी मिल गई । असमय पत्नी का इस दुनिया को छोड़कर चले जाना उसे कई बार उद्धेलित करता लेकिन वह पोतों – पोतियों मे इतना व्यस्त रहता कि समय कब बीत गया पता ही नही चला ।
अचानक पक्षाघात ने उसे विस्तर पर लाकर पटक दिया । वह बरामदे मे अधलेटा शहतूत के ठूंठ पर पक्षियों के कलरव को निहार रहा था । पक्षी एक डाल से दूसरी डाल पर फुदक रहे थे । वह उन पक्षियों मे अपने नाती – पोतों का अक्स देख रहा था और मन्द – मन्द मुस्करा रहा था । उसकी नजर एक ऐसे पक्षी पर अटक गई जो उछल कूद न करके चुपचाप एक टहनी पर बैठा हुआ था । कुछ ही देर बाद वह उड़ा और दूसरी डाल पर डगमडाता हुआ बैठा तो उसने देखा कि उसकी एक टांग व एक पंख ठीक से काम नही कर रहे थे लेकिन फिर भी वह अन्य पक्षियों के वीच प्रसन्नचित दिख रहा था ।
अचानक हवा का एक बबंडर उठा और सभी परिंदे सुरक्षित स्थान को उड़ गए । उस अपाहिज पक्षी के पर हवा मे परवाज़ न भर सके व धड़ाम से नीचे गिर गया ।करतारे की आँखों से गंगा-यमुना की अविरल धारा बहने लगी।

देवराज डडवाल,” संजू”

गाँव सरनुह ,डाकघर सुखार, तहसील नूरपुर ,
जिला कांगड़ा हि प्र – 176051
मो—-09418474052
——-07807271358

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1 COMMENT

  1. देवराज की लघुकथा दर्द एक जैसा एक मर्मस्पर्शी कथा है । घायल पक्षी व अपाहिज करतारे की शारीरिक विवशताएँ समान हैं । माषा व कथा में संप्रेषनीयता है । अच्छी कथा ।

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