मजदूर: एक पूर्ण व्यक्तित्व by अनीला बत्रा,

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मजदूर: एक पूर्ण व्यक्तित्व

अनीला बत्रा,शिक्षिका,जालंधर

मज़दूर!!
यह शब्द सुनते ही कई चेहरे उभरते हैं।
मेरे घर के पास वाले चोंक पर खड़ा
वह 70 की अवस्था का अधपके बालों वाला वृद्ध रिक्शा वाला..
मंदिर के समीप जलेबियाँ तलता परिवार से दूर
मेरी नन्ही बेटी से बतियाता,
उसमे अपनी बच्ची का अक्स खोजता वह मासूम जलेबी वाला..
रोज़ शाम हमारे मुहल्ले में गोलगप्पे बेचने आता साम्बा
जो 11 महीने बाद जम्मू जाता है
और फिर साल भर की यादें हमसे सांझी करता..
गली के मोड़ पर गर्मियों की शाम
आइस क्रीम की रेहड़ी लगता हरि
सात घंटों से खड़े खड़े रात तक
उभरा दर्द भरा चेहरा उसका..
बीमार होने के बावजूद
अपनी बच्ची के उज्ज्वल भविष्य के सपने आँखों में संजोए
घरों में पोछा लगाती मेरी काम वाली..
किस किसका दर्द बयां करूं?
किस किसके घर की कहानी कहूँ?
बस अनुरोध है इतना,
इन सभी का दर्द बांट न सको तो न सही
पर इंसानियत को ज़िंदा रखना
और ईश्वर से इन सबके लिए दुआ ज़रूर करना।

अनीला बत्रा,जालंधर

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