वो आती by प्रमोद सनाढ्य”प्रमोद”

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         वो आती

(प्रमोद सनाढ्य “प्रमोद”)

वो आती
….कभी पूरी तो कभी…
आधी अधूरी……
…..ठहर कर पल दो पल
फिर गुम हो जाती है…..
शून्य में……और
…..तलाश कर उसको
सूने पन के जेहन मे…
….मै भुुला देता हूँ सोच कर कि….
वो शायद फिर नही….
… आएगी वो…
…….पर,,वो फिरआती है,
एक अलग ढंग….
नयाअंदाज लेकर….
और…..
…….पसारने लगती अपनी कल्पनाओं के पंख,
किन्ही ऊंची उड़ान भरते
परिंदों की तरह……
……. उतरने लगती वो….
मन केआँगन मेंं…एक सोच बन…
… ..छेड़ कर मेरे अंतस की
संवेदनाओं को…. वो मचा देती है…. अजीब सी….
…….उथल-पुथल….
मेरे संवेदित मन तंत्र में……

…..धीरे-धीरे बढ़ने लगती जब
उसकी पूर्ण परिपक्वता
की प्रसव पीड़ा….
…..तो छटपटाती है वो
बाहर निकल कर
सुनाने को……
……मन की संवेदनाओं के
उन जजबातों को
जो अन्तःकरण में उपजे थे…
…..बाह्यकरण के हालातों से..
….उफ़न पड़ता है विचारों
का एक अनूठा सैलाब
शब्दों की तरंगो के साथ…..
..कुछ कहने को मन की बात…
…..और…..
…. बन जाती है…..

 “एक कविता”

प्रमोद सनाढ्य प्रमोद,नाथद्वारा

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