गात वल्लरी A beautiful Poem by Dr Yasmeen khan

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गात वल्लरी

हिल- डुल हर्षित हो रही गात वल्लरी

पाने को तन तरुवर का ही अवलम्ब

ध्यान में प्रियतम के हो चुकी निमग्न

प्रेम अथाह अम्बर को पाने की लगन

भावलोक में विचरा करे पी के संगसंग

अनदेखे पिया ने रंग दी अपने ही रंग

जाने कठिन बहुत ही डगर पनघट की

हठ ना छोड़े उलझे विचार गुलझट सी

जिद्दीपनमें उल्टी धार पे तैरने को बेताब

ना सहज आँखों को इन ख़्वाबों की ताब

भावनाओं की हिलोर में हो कर शराबोर

ना सुनना चाहे समाजी बन्धनों का शोर

विचार तरुवर पर आसक्त और समर्पित

अपने सात्विक विचारों से है प्रतिबिम्बित

एक अतीन्द्रिय मनोहारी सा है रूप दर्पण

मन ही मन सब ही भाव करे वो तो अर्पण

महक रही बन- बन कर है गुच्छा फुलवारी

जो जाने वो अरिष्ट न समझे तो है अनाड़ी

शब्द भाव धारा न्याग्रा सम कल कल जारी

यासमीन बातें कुछ वक्रोक्ति युक्त हैं हमारी।

Dr. Yasmeen khan,Meerut

 

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अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

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