दोस्त ,रिश्ते और वक्त by Dr Purnima Rai

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उम्र बीत जाती रिश्ते निभाने मेंं

दोस्त छूट जाते धन कमाने में

      (डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर)

गज़ल की उपर्युक्त पंक्तियाँ//मतला आज के संदर्भ में पूर्णतया चरितार्थ होता है।भौतिकतावादी युग की आड़ में लोगों को अक्सर यही कहते सुना जाता है ,क्या करें?समय ही नहीं मिलता!व्यस्तता अत्यधिक रहती है ।क्या लोगों का यह दृष्टिकोण सही है ?यां वास्तविकता में ही उनका कहना उचित है।दूसरी ओर कहा जाता है कि आज दुनिया ने इतनी तरक्की कर ली कि बस चाँद को भी छू लिया।हरेक कार्य एक क्षण में संपन्न हो जाता है ।श्रम और वक्त दोनों की बचत होती है।आधुनीकरण के कारण सबसे हम नेट के द्वारा मेल मिलाप कर सकते हैं। फिर आखिर क्यों? यह बात सदैव खलती है कि अमुक व्यक्ति को,रिश्तेदार को ,सगे संबंधी को मैं बरसों पहले मिला था ।कहीं ऐसा तो नहीं ,हमने भेड़चाल की तरह देखादेखी यही स्वीकार कर लिया कि दूसरों की बात उचित है ,दूसरों की थाली का लड्डू अधिक स्वादिष्ट है ।अर्थात् हमने यह स्वीकारा कि शायद सचमुच समयाभाव हो गया है ।वक्त तो अब भी वही है ।पहले तो सब काम हाथ से करने पड़ते थे और अब मशीनों से तो फिर वक्त का अभाव कहाँ ??? सही मायनों में देखा जाये तो आज वक्त की कमी नहीं है। जिसकी आड़ में सदैव मानव अपनों से मिलने को कतराता रहा है ।और किसी के पूछने पर कि आप कभी फोन कर लिया करें ,वक्त की कमी रहती,व्यस्तता रहती,कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। आज मानव के जीने का ढंग और मनन चिंतन का नज़रिया बदल गया है।उसके भीतर के अहम् ने ,उसकी दिन-प्रतिदिन बढ़ती लोलुपता और स्वार्थ,एवं मनुज का स्व केन्द्रित दृष्टिकोण उसे बाह्य संसार से दूर कर रहा है।वह उसी सीमा तक किसी से जुड़ता है जहाँ तक उसे आत्मिक तुष्टि यां स्वार्थ पूर्ति होती दिखती है ।जैसे हाथों की सब उंगलियां बराबर नहींं होती वैसे ही यह बात हरेक मानव पर 100 प्रतिशत तो नहीं पर 90 %.तक लागू होती है।आज भी रिश्तों को संभालने वाले,निभाने वाले,स्वहित से परे सोच वाले लोग आपको मिल जायेंगे,पर कहते हैं न ,बच्चा वही कार्य बार-बार करना चाहता है जिसमें उसे रोक-टोक की जाती है ।यही स्थिति मानव की है ,हम लोग भी सकारात्मक रवैया रखने वाले लोगों की बात न करके नकारात्मकता को बढ़ावा देने लगते हैं ।आप कहीं भी चले जायें,विद्यालय,बैंक,ऑफिस,अस्पताल इत्यादि सदैव लोग अच्छा कार्य करने वालों की प्रशंसा कभी खुलकर नहीं करते,वरन् निंदा के वक्त सब एकजुट हो जाते हैं।इनमें उनका कोई कसूर नहीं ,यह तो उनका मानवीय हक है दूसरों पर आक्षेप लगाना,दूसरों की खुशी में विघ्न डालना।इतना ही नहीं,एक समय था जब अखबार पढ़ने का शौक लोगों में अत्यधिक था ।आज जब कभी समाचार पढ़ो तो बस अपराधों की नित बढ़ती संख्या में होती बढ़ोतरी पर अफसोस करने के सिवा व्यक्ति कुछ नहीं कर पाता।शायद नकारात्मकता को ऊँचा करके लोग ऊपर उठना चाहते हैं।क्या ऐसा करके उनको मानसिक संतुष्टि मिलती है ,यह तो मुझे असंभव ही लगता है।आपने मुझे फोन न किया ,आप हमें मिलने न आये,आप व्यस्त होंगे,आप आफिस गये होंगें,सोचा क्या अवकाश के दिन आपको तंग करना,फिर कभी मिलने चले जायेंगे इत्यादि स्वयं की सोच रखकर मानव ने रिश्तों को टूटन के कगार पर पहुँचा दिया है ।रही बात आर्थिकता की,धन की ,तो ठीक है ,आज पुरुष स्त्री दोनों कामकाजी हैं ,जब वह अपने सब कार्य अपनी सुविधानुसार पूर्ण करते हैं तो माता- पिता,रिश्तेनाते,दोस्तों ,परिवार को वक्त क्यों नहीं दे सकते ।मैंनें तो अपनी बात रख दी,अब आप सब सोचें कि क्या कारण है कि आज दोस्त पल में बनते हैं और दूसरे पल छूट जाते हैं। वह भी समय था जब दोस्ती की कसमें दी जाती थी।”दोस्ती” फिल्म आज के समय में भी क्यों दर्शकों को पसंद आती है?कृष्ण सुदामा की मित्रता –एक राजा एक रंक —क्यों सुनाई जाती हैं??श्रीराम धीर शांत स्वभाव और लक्ष्मण उग्र स्वभाव के मालिक —फिर भी दोनों में गहरी मित्रता रही।सुसाहित्यकार रामचन्द्र शुक्ल जी निबंध “मित्रता में ” कितने विस्तार से दोस्तों के गुणों का बखान करते हुये मित्र को माँ सम धीर ,ममतामयी,वात्सल्य से भरा स्वीकारते हैं और विश्वासपात्र मित्र को जीवन की औषधि कहते हैं । आज तो इंटरनेट की दुनिया सतरंगी सपनों के पंख लगा देती है जिससे हर मानव पल में दोस्त बनाता है एकाध मैसेज किया तो अगले पल तू कौन मैं कौन???? “यह दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे,छोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे “—-फिल्मी गाने के बोल ,महज बोल ही नहीं है ,हकीकत में भी ऐसे मित्र हैं ।पर वही बात 100%नहीं लगभाग10%ही होंगें।आज विवाह हुआ दूसरी ओर फोन पर ही तलाक मिल जाता,यां तलाक के काग़ज मेहंदी सजे हाथों में थमा दिये जाते। आवश्यकता है आपसी समझ ,एक दूसरे की भावनाओं को मान सम्मान देने,अहम् को परे फैंकने और प्रेम स्नेह की लगाम को कस कर थामने की !!!!फिर चाहे दोस्ती का रिश्ता हो यां समाज का कोई भी रिश्ता!!

डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।
drpurnima01.dpr@gmai.com

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