आरज़ू by Dr Yasmeen Khan

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आरज़ू by Dr.Yasmeen Khan

कुछ नाच दिखाता है जीवन के धरातल पर।

फिर मौत का बन जाता इन्सान निवाला है।।

क्यों लोग दीवाने हैं सूरत के ही दुनिया में।
सीरत में जो अच्छा हो वो शख़्स ही आला है।

ए – दिले नादाँ आरज़ू क्या है,जुस्तजू क्या है……..

गाने के बोल कानों में पड़े और सुंदर गीत को ज़ेहन गुनगुुुनाने लगा। आरज़ू जुस्तजू कभी ख़त्म
नहीं होती। लब-ए दम तक भी हज़ार ख्वाहिशें मचलती रहती हैं। दुनिया में हर चीज़ अरमां, आरज़ू,ख्वाहिशों पर ही तो टिके होते हैं ।हर  किसी की आरज़ू ,जुस्तजू,ख्वाहिशात अलग-अलग वक़्त अलग-अलग हो सकती हैं ,मगर ख़त्म नहीं होतीं।आरज़ू,तमन्ना ही नये नये अविष्कार करातीं हैं। पल में जीवन बदलने का हुनर रखती हैं। जिनकी आरज़ू नियंत्रित हो जाती हैं वही मस्त,सन्त,सूफ़ी कहलाते हैं। सारी ज़िन्दगी हर आदमी इन्हें पूरी करने की क़वायद में जद्दो- जहद करता रहता है। आरज़ू,तमन्नायें इन्सां को कठपुतली की तरह नचाती रहती हैं और वो नाचता है । जीवन की मृग मरीचिका में भटकता ही रहता है और तब तक भटकता रहता है जब तक जिस्म में एक भी साँस बाक़ी रहती है।

आरज़ू,जुस्तजू, ख्वाहिशें ही उसको ज़िंदा रहने का हौसला देती हैं;वर्ना जाने कितनी बार ऐसे हालात बनते हैं कि आदमी ज़िन्दादिली से कट जाता है और अवसाद का शिकार हो जाता है। हर चीज़ केवल बुरी ही नहीं होती उसमें अच्छाई भी होती है अगर अति न हो। अति हर एक चीज़ की ही बुरी है। आदमी के जीवन की डोर टूटने के साथ ही आरज़ुओं,ख्वाहिशों ,तमन्नाओं की डोर टूटती है।

  • सन्त कबीर जी ने भी कहा है—

अति की भली न धूप,अति की भली न चुप।

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