आत्म शक्ति/आत्मविश्वास/आत्मबल पर केन्द्रित लघुकथाएंby Dr Purnima Rai

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आत्म शक्ति/आत्मविश्वास/आत्मबल पर केन्द्रित लघुकथाएंby Dr Purnima Rai

1* बूँदाबाँदी (लघुकथा)

जब आसमान में उमड़े काले मेघों ने संपूर्ण वसुधा का आंचल भी कालिमा युक्त कर दिया तो एक gसोनपरी की मानिंद अपनी स्वर्ण किरणें बिखेरती उस नन्हीं ने प्रण लिया कि आज तो वह इन मेघों को श्वेत जल से सरोबार करके ही दम लेगी।अभी जेह़न में आये नन्हीं
के विचारों ने आकार लेना आरंभ ही किया था कि तेज गर्जना के साथ बिजली चमकी और साथ ही बूँदाबाँदी होने लगी। जिंदगी में उतार-चढ़ाव,सुख-दुख के पल दिन-रात की मानिंद आते जाते रहते हैं।
उसे एहसास हुआ कि माँ कहती थी कि हमारे विचार,हमारे सपने, हमारी सोच सदैव पूरी होती है ।आवश्यकता है सकारात्मक सोच रखने की ।
वही नन्हीं जो धरा पर छाये काले बादलों की काली परछाईं से डरती थी,सुबकती रहती थी ,वही आज सावन मास की फुहारों का निर्भयता से आनंद ले रही थी ।
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2* एक सुबह (लघुकथा)

सूर्योदय के साथ अपनी ही मस्ती में नभ में विचरण करती चिड़ियों की चीं-चीं सुनकर छत पर सोई सौम्या ने ज्यों ही धीरे-धीरे आँखें खोली तो छत की मुंडेर पर बैठे कौए को देखकर सहम गई।इसी बीच मंदिर में बजती घंटियों की आवाज़ एवं गुरुद्वारे में हो रहे पाठ की आत्म संतुष्टि देती ध्वनि से सराबोर होकर वह गुनगुनाने लगती है —-मुझे मारने की नाकाम साजिश मत कर ए “कौए”!अपनी कर्कशता से मुझे मत डरा!
यह ठीक है कि मैं चिड़िया हूँ ,मगर मेरी चीं-चीं से ही जीवन में रवानी है ,गति है।

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3*माणो (लघुकथा)

ओ रीटा,सुन !हाँ माणो ! बोल, क्या बात है?
हम दोनों रोज थैला उठा कर बेफ्रिक सी सड़कों की खाक छानती-फिरती हैं तो कभी कूड़ा ढेर उथल-पुथल करती हैं ।कभी प्लास्टिक, कभी बोतल ,कभी काग़ज ,कभी-कभी लोहे का सामान हाथ लग जाता है।हाँ भई हाँ!!तो???
तू जानती है एक बार एक कापी मिली मुझे! उछल कर !सच ,माँ कसम !मुझे लगा ,आज तो एक जहान मिल गया । अरे माणो ,ऐसा क्या था उसमें??
माणो सपनों में खोई कहने लगी,”उस कापी पर स्कूल की वर्दी पहने ,बैग लटकाये हुये , दो बच्चों के चित्र के साथ हम दोनों की तरह कचरे से भरा थैला उठाये दो खूबसरत लड़कियों का चित्र बना हुआ था।माणो की बात सुनकर रीटा कहने लगी ,यह कौन सी बड़ी बात है । है ,ना,आगे सुन!! उन दोनों चित्रों के नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—-कोई भी कार्य छोटा यां बड़ा नहीं है, कामयाबी महज़ कोरी स्कूली शिक्षा से नहीं मिलती,बल्कि हमारे सामाजिक आचार- व्यवहार ,मेहनत,लगन और उद्यम से मिलती है।रीटा,तब से मुझे अहसास हुआ कि हमारे पास मेहनत,लगन,उद्यम सब कुछ है। मात्र स्कूल की शिक्षा नहीं है ,क्योंकि हम निर्धन है । मैनें यह जान लिया कि निर्धनता अभिशाप नहीं है । बड़ी-बड़ी डिग्रियों से नहीं ,वरन् अपने हौंसलों से ,अक्षर ज्ञान से भी जिंदगी बदली जा सकती है ।तब से रोज़ सुबह मैं तेरे संग कचरा उठाने आती हूँ और दोपहर की शिफ्ट के सरकारी स्कूल में जाकर अक्षर ज्ञान प्राप्त करती हूँ।

डॉ.पूर्णिमा राय,
शिक्षिका एवं लेखिका
ग्रीन एवनियू,घुमान रोड,तहसील बाबा बकाला,
मेहता चौंक 143114,
अमृतसर(पंजाब)

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