रामधारी सिंह दिनकर जी की पुण्य-तिथि (24 अप्रैल 1974)

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रामधारी सिंह दिनकर जी की पुण्य-तिथि (24 अप्रैल 1974)

दिनकर जी को उन के

ही शब्द सुमन अर्पित कर

अपनीअक़ीदत पेश करती

कवयित्री डॉ.यासमीन खान मेरठ

साहित्य के सूर्य को मेरा सलाम
मरता नहीं कभी कवि का कलाम।।

वह कौन रोता है वहाँ-
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहु का मोल है
प्रत्यय किसी बूढ़े, कुटिल नीतिज्ञ के व्याहार का;
जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है;
जो आप तो लड़ता नहीं,
कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता,
शोणित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की ?

और तब सम्मान से जाते गिने
नाम उनके, देश-मुख की लालिमा
है बची जिनके लुटे सिन्दूर से;
देश की इज्जत बचाने के लिए
या चढा जिनने दिये निज लाल हैं।

ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्त्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी।

विश्व-मानव के हृदय निर्द्वेष में
मूल हो सकता नहीं द्रोहाग्नि का;
चाहता लड़ना नहीं समुदाय है,
फैलतीं लपटें विषैली व्यक्तियों की साँस से।

हर युद्ध के पहले द्विधा लड़ती उबलते क्रोध से,
हर युद्ध के पहले मनुज है सोचता, क्या शस्त्र ही-
उपचार एक अमोघ है
अन्याय का, अपकर्ष का, विष का गरलमय द्रोह का!

श्वानों को मिलते दूध-वस्त्र ,भूखे बालक अकुलाते हैं;
माँ की हड्डी से चिपक ,ठिठुर जाड़ो की रात बिताते हैं।
युवती के लज्जा-वसन बेच,जब ब्याज चुकाये जाते हैं;
मालिक जब -फुलेलों पर,पानी सा द्रव्य बहाते हैं।

‘जब तक मनुज मनुज का
यह सुख-भाग नहीं सम होगा।
शमित न होगा कोलाहल,
संघर्ष नहीं कम होगा।

लोहे के पेड़ हरे होंगे
गान प्रेम का गाता चल
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर
आंसू के कण बरसाता चल।

‘ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में
मनुज नहीं लाया है;
अपना सुख उसने अपने भुज बल से पाया है।

दिनकर जी ने जनजागरण को प्रखर करने का काम किया।उनकी कविताओं में ओज, तेज है,अग्नि समान तीव्र ताप है।उसमें यौवन का हुंकार है,नव निर्माण की भावना है,कर्म का सन्देश है,आशावाद के स्वर हैं,दिनकर जी अद्वितीय हैं।

डॉ.यासमीन ख़ान।

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