संस्मरण :एक अवलोकन

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संस्मरण शब्द संस्कृत के स्मृ धातु से सम् उपसर्ग और अन् प्रत्यय लगाकर बना है इसका अर्थ है स्मरण करना,याद करना।

हिन्दी साहित्य कोश के अनुसार,” संस्मरण लेखक जो स्वयं देखता है ,जिसका वह स्वयं अनुभव करता है,उसी का वर्णन करता है।उसके वर्णन में उसकी अनुभूतियाँ ,संवेदनाएं रहती हैं।स्मृति ही संस्मरण का रूप है।”
किसी व्यक्ति,घटना,दृश्य, वस्तु को आत्मीयता के साथ याद करते हुये उसका विवेचन संस्मरण की संज्ञा प्राप्त करता है।

दूसरे शब्दों में अनुभव और स्मृति के आधार पर जो आत्मीयतापूर्ण साहित्य रचा जाता है ,उसी का नाम संस्मरण है।
इसमें लेखक अपने निजी अनुभव को सांझा करता है
।यह अनुभव किसी घटना और व्यक्ति से संबंधित होते हैं।

(क)संस्मरण के गुण
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1* भावाभिव्यक्ति
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भावाभिव्यक्तिसंस्मरण का सबसे अनिवार्य तत्त्व है।
इस सृष्टि के किसी भी अंश के साथ संबंधित अपनी अनुभूति संस्मरण है।संस्मरण में रोचकता का गुण होता है क्योंकि यह वैयक्तिक अनुभव जन्य होता है।

2* वर्णनात्मकता
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वर्णनात्मकता का गुण संस्मरण में आवश्यक है ।इसमें स्थितियों और व्यक्तियों को एक एक चरण आगे पीछे जोड़कर अंकित किया जाता है।इसमें एक से अधिक शब्द चित्रों की गुंजाइश रहती है।इसमें अतीत की घटनाएं ही केन्द्र में होती है।यहाँ लेखक की दृष्टि आंतरिक विशेषताओं को अभिव्यक्त करने की रहती है।जब व्यक्ति,वस्तु,घटना,के साथ जुड़ी यादों.पर से समय का आवरण हट जाता है तब अतीत की घटनाएं चलचित्र की भाँति साकार लगने लगती हैं और पाठक का तारतम्य उस घटना,व्यक्ति ,वस्तु से होने लगता है ,उस वक्त कलमबद्ध हुई रचना संस्मरण कहलाती है।यहाँ भावुकता का पुट मुखर हो जाता है।

3*कल्पना

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कल्पना का संस्मरण विधा में कोई स्थान नहीं होता है।इसमें वही घटनाएं वर्णित होती हैं जो जीवन में घट चुकी होती है।यहाँ लेखक को अपने खट्टे मीठे अनुभवों ,रुचि-अरुचि ,अपने संबंधों,प्रतिक्रियाओं ,एवं लेखक के मन पर पड़े विभिन्न प्रभावों का वर्णन करने की स्वतंत्रता रहती है।

4* वैयक्तिकता
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वैयक्तिकता के बिना संस्मरण लिखे नहीं जा
सकते।यहाँ लेखक अपने जीवन की किसी ऐसी घटना का वर्णन करता है जिसे वह कभी भुला नहीं पाया।
महादेवी वर्मा ने “अतीत के चलचित्र” में कहा है…।”इन स्मृति चित्रों में मेरा जीवन आ गया है।यह स्वाभाविक भी था… मेरे जीवन की परिधि के भीतर खड़े होकर चरित्र जैसा परिचय दे जाते हैं वह बाहर रूपांतरित हो जायेगा।”

5*विशेष घटनाओं का विवेचन
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संस्मरण में सम्पूर्ण जीवन का चित्रण न करकू कुछ घटनाओं का विवेचन होता है।यहाँ लेखक अपने जीवन की किसी घटना-विशेष यां संपर्क में आये हुये व्यक्ति विशेष के चरित्र के महत्वपूर्ण पक्ष की झांकी पेश कर जीवन के खण्ड रूप यां किसी एक पक्ष का ही चित्रण करता है।यह खण्ड विशेष अपने आप में महान होता है अर्थात् जिस पर संस्मरण लिखा जा रहा है ,उसकी विशेषताओं का उद्घाटन करता है।
6* सत्य पर आधारित कथात्मक साहित्य विधा
संस्मरण की कथा में शंका और अविश्वास की गुंजाइश बहुत कम होती है।इसमें जीवन के उन अंशों,पक्षों,प्रसंगों की झांकी पेश की जाती है जिनको जानने की इच्छा पाठक को होती है।

7* चित्र उपस्थित करने का सामर्थ्य
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हिन्दी साहित्य में संस्मरणों के इसी गुण के कारण (चित्रोपमता) संस्मरण को रेखाचित्र कहा जाता रहा है। चित्रोपमता अर्थात् आलंबन का विवेचन इस ढंग से किया जाये कि उसका स्वरूप पाठक के सामने स्पष्ट रुप से उभरकर उसी प्रकार से आये जैसे कैमरे से चित्र।संस्मरण लेखक चुन चुन कर शब्दों द्वारा चित्र प्रस्तुत करता है।संवेदनशील और भावुक लेखक संपर्क में आने वाले व्यक्ति एवं घटनाओं के महत्वपूर्ण रूप को स्मृतिपटल पर अंकित करता रहता है,जब वह लिखने बैठता है तो चित्र सहज बनते जाते हैं

(ख) संस्मरण के प्रकार
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संस्मरण दो तरह से लिखे जाते हैं
1* एक में लेखक दूसरों के विषय में अपने विचार प्रकट करता है।इसको अंग्रेजी में रेमिनिसेंस कहते हैं।

2*दूसरे में वह स्वयं अपने विषय में लिखता है।इसे अंग्रेजी में मेमायर्स (याद) कहते हैं।

(ग) संस्मरण साहित्य का वर्गीकरण——
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भाषा शैली एवं अभिव्यक्ति के कारण संस्मरण में
कई स्वरूप और शैलियाँ मिल जाती है जो निम्नलिखित हैं..

1 आत्मकथात्मक
2यात्राविवरणात्मक
3जीवनी गठित
4पत्रात्मक
5डायरी अंकित
6श्रद्धांजलि मूलक
7मूल्यांकनपरक
8चुटकुले

डॉ.पूर्णिमा राय

शिक्षिका एवं लेखिका
अमृतसर(,पंजाब)

 

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