चोका:एक महत्वपूर्ण जापानी काव्य विधा

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चोका : एक महत्वपूर्ण जापानी विधा

क्रिकेट में जिस प्रकार एक खिलाड़ी जब चोका (यानि चार रण प्राप्त करने, जब गेंद boundary line को पार कर जाती है )मारता है तो दर्शकों द्वारा बजाई गई तालियों की गूँज से सारा वातावरण खिल उठता है उसी प्रकार चोका पढ़कर साहित्य संबंधी नवीन ऊर्जा का अहसास पाठक को होता है ।
यह एक जापानी काव्य विधा है।इसे लम्बी कविता भी कहा जा सकता है।जिस प्रकार महाकाव्य लिखे जाते हैं,उसी प्रकार चोका भी लिखे जाते हैं ।दूसरे शब्दों में चोका अर्थात् लम्बी कविता
पहली से तेरहवीं शताब्दी में जापानी काव्य-विधा में महाकाव्य की कथाकथन शैली को कहा जाता है।यह वर्ण पर आधारित सृजन का पक्षपाती.है अर्थात् चोका में वर्ण ही गिने जाते हैं मात्रायें नहीं।वर्णिक छंदों में आधे वर्ण नहीं गिने जाते हैं
हिन्दी काव्य-जगत में इस जापानी काव्य-विधा के
अनुशासन से परिचित करवाते हुए सुप्रसिद्ध साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी के अनुसार—
मूलत: चोका गाए जाते रहे हैं । चोका का वाचन उच्च स्वर में किया जाता रहा है ।यह प्राय: वर्णनात्मक रहा है । इसको एक ही कवि रचता है। इसका नियम इस प्रकार है –

5+7+5+7+5+7+5+7+5+7+5+7+5+7+5+7+5+7+5+7 और अन्त में +[एक ताँका जोड़ दीजिए।] या यों समझ लीजिए कि समापन करते समय इस क्रम के अन्त में 7 वर्ण की एक और पंक्ति जोड़ दीजिए । इस अन्त में जोड़े जाने वाले ताँका से पहले कविता की लम्बाई की सीमा नहीं है । इस कविता में मन के पूरे भाव आ सकते हैं ।

चोका में कुल पंक्तियों का योग सदा विषम संख्या [ ODD] यानी 25-27-29-31……इत्यादि ही होता है । डॉ0 डॉ सुधा गुप्ता जी ने स्वतन्त्र रूप से ‘ओक भर किरणें ‘ चोका रचनाओं के द्वारा इस शैली के रचनाकर्म की ओर अनेक कवियों को प्रोत्साहित किया है ।

आज इस काव्य विधा पर बहुत से रचनाकार अपना लेखन कर रहें हैं ।त्रिवेणी ब्लॉग( trivenni blogspot.in) पर आप विभिन्न विषयों पर रचनाकारों के चोका पढ़कर अपना साहित्य ज्ञानवर्धन करने के साथ-साथ आनंदानुभूति प्राप्त कर सकते हैं।

यहाँ ध्यातव्य है कि चोका में भावाभिव्यंजना ,वर्णात्मकता,एवं विषय-विस्तार
के साथ-साथ पाठकीय जिज्ञासा को निरंतर जागृत करने एवं कौतूहलजन्य आनंद की चरमसीमा की प्राप्ति करवाने की विशेषता भी है ।

संकलित डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।

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