रंगरेज़: रंग था गिरगिट जैसा

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रंगरेज़’

रक्तपात है चारों ओर
लूटपाट का रंग घनघोर
राजनीति में त्राहि त्राहि
नेताओं के भाषण घोर
चीथड़ों,चीखों का शोर।

ओ- रंगरेज़
तुझसे निजता का नहीं परहेज़..
इस होली पर
रंग दे मोहे
अब तो अपने ही रंग,
सकल जीवन जियूँ तेरे संग
लगे अब हर रंग फीका
रूखा,खुरदुरा,दरदरा।
तन पर चुभे अब
हर आहट ,हवा,पानी,
बहुत कर कर चुकी हूँ नादानी।
कई बार रँगा है ख़ुद को…
रंग था गिरगिट जैसा
पल-पल बदल जाता,
अब तन,मन,सघन जर्जर।
भटकती रूह मेरी प्यासी
अब है साथी उदासी,
तृप्त कर जलते तन,मन को
भर दे अपने रोशन रंग से जीवन
सब रंग मिटा दे अब श्याम..
तुझे पुकारूँ अब अष्टयाम
अपना ही रंग चढ़ा अब
छूटने से जो छूट न पाये
पगली,पापिन रहे सिर्फ़ तेरे साये।

डॉ. यासमीन ख़ान ,मेरठ

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