हाथी के दाँतby देवराज डडवाल

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देवराज डडवाल
जन्म तिथि – 8 जनबरी 1969
शिक्षा – स्नातकोत्तर ( इतिहास व अर्थशास्त्र एवं पत्रकारिता व जनसंचार मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा )

सम्प्रति—लैक्चरार(अर्थशास्त्र)

राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला, सुखार तहसील नूरपुर जिला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश 
सचल दूरभाष न0 – 07807271358 व 09418474052

लघुकथा—-हाथी के दाँत
नमिता की हालत नाज़ुक होती जा रही थी । उसे ऑपरेशन थियेटर की तरफ ले जाने की तैयारी हो रही थी ।” सिस्टर , जल्दी करो । इन्हें जल्दी टेबल न0 दो पर ले चलो ” – स्ट्रेचर पर लेटाते हुए डॉ खन्ना ने कहा । अस्पताल के दो कर्मी स्ट्रेचर को ऑपरेशन कक्ष की तरफ जल्दी से धकेलते हुए ले गए । दो नर्स और डॉ भी पीछे ही भाग लिए ।” हां , ब्लड का ऑरेन्ज हो गया क्या ?” – डॉ खन्ना अब नमिता के पति नरेश से मुखातिव हुआ ।
” सर , अस्पताल मे लगे पोस्टरों मे जिन रक्तदानियों के न0 थे उनसे सम्पर्क किया था । उन्होंने आश्वासन तो दिया था लेकिन ….” नरेश गेट की तरफ ताकने लगा ।
” आप समझते क्यों नही , पेशेंट के लिए ब्लड वहुत जरूरी है । ब्लड ऑरेन्ज न होने से कुछ भी हो सकता है ” – डॉ खन्ना ने कहा व ओ टी की तरफ भाग गया ।
नरेश उन डोनर को फोन पर फोन किए जा रहा था लेकिन कोई उठा ही नही रहा था ।
नरेश कभी गेट की तरफ तो कभी ओ टी की तरफ देख रहा था । ब्लड ऑरेन्ज न होने के कारण उसके मस्तिष्क मे कई तरह के विचार दौड़ रहे थे ।
वह मन ही मन बड़बड़ा रहा था , ” नही दे सकते थे ब्लड तो डींगे क्यों हाँक रहे थे । क्यों लगाए यहाँ ये इतने पोस्टर ? बड़े आये रक्तदानी ? ” – अब वह फिर ओ टी की तरफ देखने लगा । थोड़ी ही देर मे डॉ खन्ना वाहर निकले । नरेश एकदम डॉ की तरफ लपका ।
” आप भाग्यशाली है मिस्टर नरेश । ऑपरेशन ठीक हो गया है ।”
” आपका बहुत-बहुत धन्यवाद डॉ साहिब । आप सच मेंं फ़रिश्ता है हमारे लिए ” – नरेश दोंनो हाथ जोड़ते हुए डॉ के कदमोंं की तरफ झुकने लगा ।
” फ़रिश्ता मैंं नही , यह है । ” साथ चल रहे सफाई कर्मचारी मुकेश के कन्धे पर हाथ रखते डॉ साहिब ने कहा ।
नरेश की आँखे डबडबा गई जबकि मुकेश के चेहरे पर खुशी झलक रही थी ।

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1 COMMENT

  1. हाथी के दाँत लघुकथा लैक्चरार देवराज जी की लिखी हुई उच्चकोटि की एक ऐसी कथा है जो प्रेरक तो है ही ,साथ ही समाज के लोगों में इंसानियत की बची हुई लौ का सटीक उदघाटन करती है।सामयिक परिस्थितियों के आलोक में आये दिन हो रही दुर्घटनाओं के परिपेक्ष्य में जीवन कितना दर्द भरा है,इसे भी मार्मिक रूप से भावनात्मक रूप में प्रकट किया गया है!!
    डॉ.पूर्णिमा राय

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