अंतर्राष्ट्रीय  महिला दिवस पर विशेष :नारी के रूप अनेक

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अंतर्राष्ट्रीय  महिला दिवस पर विशेष: नारी के रूप अनेक  

 

1)”नारी”by Dr.Sushma Chawla

घर की रौनक है नारी,
मकान को घर बनाती है नारी,
पुरुष की प्रेरणादायनी है नारी,
पुरुष की सहयोगिनी है नारी,
पुरुष की अर्धांगिनी है नारी,
पुरुष के संसार को सजाती संवारती है नारी,
अपनी वेदना को भूलकर
संतान को जन्म देकर “मां” कहलाती है नारी,
त्याग , दया , ममता , सहनशीलता की मूरत है नारी।
अपनी परवाह किये बिना बच्चों को तराशती है नारी,
दो घरों (मां – बाप और ससुराल ) की रौनक है नारी,
परिवार को सक्षम और समर्थ बनाने वाली है नारी ,
मां , बेटी , पत्नी , पुत्र वधू , सास बनकर अपने गम भुला कर, सब पर अपना प्यार लुटाती है नारी,
सुबह से शाम तक परिवार का ध्यान रखती है नारी,
अपनी एक पहचान है नारी,
फिर
क्यों पड़ती है सबके लिए भारी ?
क्यों ?
साल मे एक दिन “महिला – दिवस” मनाकर,
सबके उपहास का पात्र बनती है नारी ?
क्यों सबकी मोहताज है नारी ?
आओ
उसके अस्तित्व को पहचाने ।
हर घर की शान है नारी,
सबका सम्मान है नारी,
कोई खिलौना नही,
देवी है नारी,
माननीया है नारी,
सौन्दर्य की मूरत है नारी,
सब मिलकर रक्षा करो इसकी
जिससे
ना बन पाये शोषण की अधिकारी,
कभी ना कहलाये अबला और बेचारी,
अबला और बेचारी,
पूजनीया है नारी l

-डा. सुषमा चावला
एम.ए. ,पी.एच.डी , [ हिन्दी ]
सेवा निवृत्त , प्रो. हिन्दी स्नातकोत्तर विभाग,
डी.ए.वी कालेज अमृतसर |

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2)नारी है सुलझा वक्त सुनोby Rajkumar Raj

मेरे धर्मग्रन्थ कहते हैं
कि… तू शक्ति है
सत्य ही तो कहते हैं
तू शक्ति है
तभी तो इतना सहन कर सकती है..
तिल तिल कर जीती है
इच्छाओं का दहन करती है…
घर को मन्दिर बनाती है
कायदे से झाड़ू-पोछा करती है..
बर्तनों में जल भरती है..
कपड़े धोती है,सुखाती है..
सूर्य उदय संग जगती है
और चन्द्र के संग बतियाती है
सच ही तो है जननी
तू चैन कहाँ पाती है…
कभी चपाती सेकते हुए
हाथ तेरा सिकता है…
कभी तरकारी काटते हुए
उंगली तेरी कट जाती है…
हल्की सी..सी करती है
और पीड़ा को पी जाती है..
लेकिन आह ! ये व्यथा है तेरी
फिर भी दोषी कहलाती है
गर जिरह खुद की करनी चाहे
थप्पड़ और गाली खाती है…
डबडबाई सी आंखों से तू
दिनचर्या में लग जाती है…
जितना है तुमने सहन किया
उतना दिल किसी ने ना पाया
कभी घड़े में जिंदा दफनाई
कभी जलती चिता पे लिटाया..
इतने पे भी जब दिल ना भरा
बाजारों में भी नचवाया..
कभी कैद किया बुरखों में तुझे…
कभी गांव में नग्न है चलवाया
क्यों अग्नि परीक्षा लाज़मी थी?
परपंच सभी क्यों रचवाया…
हे नारी..तू दूध की गंगा है
हर जीवन..तेरे पथ से आया..
तेरी मिट्टी में समर्पण है
इसलिए.. सर्वस्व लुटाती है
काया की मिट्टी अर्पण कर
तू हवनकुंड बन जाती है…
सुंदर भावों की तू सरिता
हर भाव में कल कल गाती है..
तू सचमुच में शमां जैसी
जल कर..महफ़िल जो सजाती है…
यह दुनिया गर इक महफ़िल है..
तो नारी इसका नूर सुनो…
मुस्कान,बातें और खनक हंसी
महफ़िल को करे..भरपूर सुनो
इस खनक को खनखन बजने दो…
श्रृंगार है..इसको सजने दो
अम्बर सा इसे मुस्काने दो
मत रोको..पढ़ने जाने दो
जिस कौम की नारी पढ़ती है
वो कौम तरक्कियां करती है..
हर सफल पुरुष संग नारी है
नारी है सुलझा वक्त सुनो..
मक्के से उठी अज़ान है यह
औऱ अल्लाह का दस्तखत है सुनो….
राज✍
शिक्षक,सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल,बल कलां, अमृतसर
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3) नारी की पुकार( दो कविताएँ by Dr.Shashi Joshi

रिवाज़ो और रस्मों के ,
पुराने इन ठिकानों में !
करो मत कैद हमको,
सोच के छोटे मकानों में !

सफ़र करने दो हमको ,
ऊंचे- ऊंचे आसमानों में
लगाओ मत कोई बन्धन ,
हमारी इन उड़ानों में !

जुनू है,जोश , जज़्बा है लगन,
साहस”शशी”हम में ,
है ऊंचा आसमां हम में,
है महकी सी ज़मीं हम में!

कि हम महकेंगी खुद,
महकाएंगी सारे ज़माने को ,
करो मत कैद हमको ,
छोटे – छोटे फूलदानों में!

सफ़र करने दो हमको ,
ऊंचे- ऊंचे आसमानों में!

2)

रोको भले तुम लाख ,
ये रोके न रुकेगी!
नारी है वो ख़ुशबू,
जो न मुट्ठी में रहेगी।

समझो न महज़ जिस्म,
ये है रूह की भाषा !
नारी ने ये संसार
नए ढंग से तराशा ।

विध्वंस नहीं ,जानती ।
ये प्रेम की मूरत ।
इसमें ही छिपी है ,
नए संसार की सूरत ।

तुम लाख रोक लो इसे!
तुम लाख टोक लो।
अपना वज़ूद तो “शशी”
ये सिद्ध करेगी !!

नारी है वो ख़ुशबू,
जो न मुट्ठी में रहेगी ।

डॉ.शशि जोशी”शशी”
जी.जी.एच.एस.एस. बांगीधार
सल्ट अल्मोड़ा

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4) नारी दिवस पर कविताएंby Sushil Sharma

*मेरी भूमिका*
सुशील शर्मा

सृष्टि के प्रथम सोपान से
आज के अविरल विकास महान तक।
मेरी भूमिका का संदर्भ
अहो!प्रश्न चिन्ह कितना दुखद।

सनातन संस्कृति का आरंभ
सृष्टि के प्रथम बीज का रोपण
मेरी गर्भनाल से प्रारम्भ।
आदि मानव की संगनी से लेकर
व्यस्ततम प्रगति सोपानों तक
मेरी भूमिका का संदर्भ
अहो!प्रश्न चिन्ह कितना दुखद।

ऋग्वेद से लेकर बाज़ारीकरण तक
कितनी अकेली मेरी अंतस यात्रा
हर समय सिर्फ त्याग और बलिदान।
न जी सकी कभी अपना काल
सदा बनती रही पूर्ण विराम।
विकास के अविरल पथ पर
मेरी भूमिका का संदर्भ
अहो!प्रश्न चिन्ह कितना दुखद।

मैं दुर्गा गार्गी मैत्रयी से लेकर
वर्तमान की अत्याधुनिक वेषधारी
कितनी असहनीय अमानवीय यात्रओं को सहती।
मेरे तन ने अनेक रूप बदले
मन लेकिन वही सात्विक शुद्ध
मानवीय मूल्यों को समेटे
नित नए संकल्पों में विकल्प ढूंढती
मेरी भूमिका का संदर्भ
अहो!प्रश्न चिन्ह कितना दुखद।

क्षितिज के पार महाकाश दृश्य
शब्दों सी स्वयं प्रकाशित स्वयं सिद्ध
काल की सीमाओं से परे मेरा व्यक्तित्व।
देश नही विश्व निर्माण में मेरा अस्तित्व।
मेरी भूमिका का संदर्भ
अहो!प्रश्न चिन्ह कितना दुखद।

हर युग हर काल में मेरा रुदन
विरोधाभास और विडम्बनाएं गहन
अंतस में होता हमेशा मेरे नव सृजन
हर देश हर काल का विकास पथ
है मेरे इतर शून्यतम।
मेरी भूमिका का संदर्भ
अहो!प्रश्न चिन्ह कितना दुखद।

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*मैं वो नहीं*
सुशील शर्मा

सपने भी सहमे हैं मेरे
कल्पनाओं में क्रांति है।
सन्नाटे के सृजन में
सब मैंने बुना
तुमने सिर्फ गाँठ बाँधी
और सब कुछ तुम्हारा था।
शब्दों की अंतरध्वनियों
में गूँजते मेरे सवाल
तुमने कभी नही सुने।
साँचे-ढले समाज की
अकम्पित निर्ममता
हब्बा से आज तक
छलती रही मुझे
और तुम बने रहे भगवान
हांकते रहे मुझे
उनींदी भोर से सिसकती रात तक
उड़ेलते रहे
अपने अस्तित्व का जहर
प्यार का नाम देकर।
हाँ तुमने गहा था मुझे
लेकिन मुझे छोड़ कर
साथ ले गए सिर्फ मेरी देह
उस देह से तुमने उपजा लिए
अनगिन रिश्ते
जिह्वा ललन लालसाएं
मैं तो अभी भी बैठी हूँ
वहीँ अकेली ,अधूरी
अंतहीन ,अनकही।

3)  दोहे

नारी का सम्मान ही, है समाज की आन।
नारी की अवहेलना, नारी का अपमान।

मां-बेटी-पत्नी-बहन, नारी रूप हजार।
नारी से रिश्ते सजे, नारी से परिवार।

नारी बीज उगात है, नारी धरती रूप।
नारी जग सृजित करे, धर-धर रूप अनूप।

नारी जीवन से भरी, नारी वृक्ष समान।
जीवन का पालन करे, नारी है भगवान।

नारी में जो निहित है, नारी शुद्ध विवेक।
नारी मन निर्मल करे, हर लेती अविवेक।

पिया संग अनुगामिनी, ले हाथों में हाथ।
सात जनम की कसम ले ,सदा निभाती साथ।

हर युग में नारी बनी, बलिदानों की आन।
खुद को अर्पित कर दिया, कर सबका उत्थान।

नारी परिवर्तन करे, करती पशुता दूर।
जीवन को सुरभित करे, प्रेम करे भरपूर।

प्रेम लुटा तन-मन दिया, करती है बलिदान।
ममता की वर्षा करे, नारी घर का मान।

मीरा, सची, सुलोचना, राधा, सीता नाम।
दुर्गा, काली, द्रौपदी, अनसुइया सुख धाम।

मर्यादा गहना बने, सजती नारी देह।
पूर्ण समर्पित कर सदा,सुखी बनाती गेह।

पिया संग है कामनी,सास ससुर की आन।
दोनों कुल तारे सदा,नारी रत्न महान।

सुशील शर्मा

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 5) मुझे गर्व है मैं एक नारी हूँby Sangeeta Pathak

मैं परिंदों की उडा़नें भाँपती हूँ।
होश के हर आइने से झाँकती हूँ।

चाहतों का फाड़कर अंबर उसी पे
थेगली भावों की अपने टाँकती हूँ।

कुछ दरिंदे जिस नज़र से देखते है
फोड़कर आँखें ग़री सी बाँटती हूँ।

दामिनी हूँ मैं कड़क बरसात की
बस जलाकर के जमीं में गाँढ़ती हूँ।

दूत हूँ यमदूत मैं तो गण शिवा की
कालिका से क्रोध लेकर लाँघती हूँ।

मानती हूँ जानती हूँ नर नहीं हूँ
पर नरों के अवगुणों को ढाँकती हूँ।

माँ बहन बेटी किसी भी रूप में मैं
चोट, मन,हालात दुख भी बाँटती हूँ

संगीता पाठक

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‘6) औरत की आज़ादी फायदे के लिये।’by Dr.Yasmeen

औरत की आज़ादी के चाहे कितने भी नारें लगें मगर औरत आज भी आज़ाद नहीं है।
आज़ाद है नौकरी करने के लियें, कमा कर लाने के लियें, घर की ज़िम्मेदारियाँ उठाने के लियें। समाज ने उसे आज़ादी दे रखी है। ये सब करने और निरन्तर करते ही रहने की।
बात जब आती है व्यक्तिगत आज़ादी की तो वह अपनी मर्ज़ी से एक फ़िल्म देखने तक नहीं जा सकती,किसी के साथ खाना तक नहीं खा सकती,चन्द लम्हें भी अपनी पसन्द से किसी के साथ गुज़ारना उसके लियें अपराध बन जाता है। काम से चाहे दिन और रात की ड्यूटी करके भी कमाकर लाये तब अपराध नहीं वो। कई बार समाज और लोगों के आधुनिक ऐसे विचारों से चिढ सी होने लगती है।
आज भी औरत को लोग अपने स्वार्थ के हिसाब से आज़ादी देते हैं यानि जिस चीज़ में उनको फ़ायदा होता वहां उनका स्वाभिमान तक छींके पर टँग जाता है । जहां उन्हें फ़ायदा नहीं होता वहीं औरत पर लगाम कसते नज़र आते हैं मानो औरत चाबी का खिलौना है जिसे वर्तमान समाज के सूत्रधार अपनी सुविधा और पसन्द से चलाते हैं।
ऊपर से आज़ाद नज़र आने वाली नारी भी आज़ाद नहीं यही बड़ी हक़ीक़त है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। ऐसे में औरत खुद को असहज महसूस करती है और खुद तक से फ़रारी चाहती है।
डॉ.यासमीन ख़ान

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7) नारी अब अबला नहीं by Dr.Purnima Rai
नारी अब अबला नहीं,रखती नर सा तेज।
हिम्मत से आगे बढ़े,छोड़ फूल सी सेज।।
हर मुश्किल आसान हो,नारी का हो संग।
प्रेम लुटाकर भर रही ,जीवन में नव रंग।।
विपदाओं के पार भी,है देखो संसार।
खुशियाँ आंगन में खिलें,नारी को दे प्यार।।
देवी ,चण्डी से बनी,नारी की पहचान।
नारी का अरमान है,बढ़े देश की शान।।
नारी का अपमान जो,करते हैं हर रोज।
अपनी हस्ती के लिए,घर की करते खोज।।
चाह करें जो पुत्र की,नारी को दें मान।
कन्या-पूजन से बने ,जग में पुरुष महान।।
अभिलाषा पूरी करें,बेटी को दें ज्ञान,
भारत माँ के मुख सजे,फिर सुन्दर मुस्कान।। 

Edited & Presented by Dr.Purnima Rai

drpurnima01.dpr@gmail.com

 

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