अर्जी ( कमलेश भारतीय)

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अर्जी
– कमलेश भारतीय
दूरदराज के गांव में बैठी भरपाई ने अखबार बेचने वाले छोकरे को जिस दिन अखबार देने को कहा था, तब वह पूछे बिना नहीं रह पाया था कि ताई आखर तो पढऩा नहीं जानती, फिर अखबार किसलिए? भरपाई ने आंखें भर कर कहा था-बेटा, मैं पढऩा नहीं जानती पर किसी से एक अखबार सुन तो सकती हूं। मैं मुख्यमंत्री से मिलना चाहती हूं और इसीलिए अखबार बांध रही हूं कि कब वे हमारे इलाके में आएं, यह जान सकूं।
-क्या करोगी ताई, मुख्यमंत्री से मिलकर? छोकरे ने तुरंत पूछा।
-बेटा, तन्ने पता नहीं कि मेरी छोरी को उसके ससुराल वालों ने मार डाला है और मैं उसी के बारे में अपने देस के बड़े नेता को बताना चाहती हूं।
-हां ताई मैंने तो इन गांवों में अभी अखबार डालने का काम शुरू किया है। क्या हुआ था आपकी बेटी को?
-बेटा, क्या बताऊं क्या नहीं हुआ था पर उसके मरने के बाद सुनवाई कोई नहीं हो रही, यह बात मेरे जी को ज्यादा सता रही है।
छोकरे के पास न ज्यादा समय था और न समझ। वह अखबार देकर चलता बना था। दूसरे-तीसरे रोज वह अखबार देते इतना जरूर पूछ लेता कि क्यों ताई, कब आ रहे हैं नेता जी?
ताई कहती छोकरे जिस दिन भी आएंगे, मैं उनसे मिलने जरूरी जाऊंगी। मैंने सुना है कि वे लोगों से मिलने गांव-गांव आते हैं और तू क्या नहीं जानता की भीलनी से मिलने राम भी तो जंगल में पहुंच गए थे। राजा विक्रमादित्य भी तो भेस बदलकर जनता का दु:ख दर्द पूछने आया करते थे। म्हारे मुख्यमंत्री भी आवेंगे, जरूरी आवेंगे।
और एक दिन ताई ने अखबार वाले छोकरे से अखबार हटा देने का हुक्म सुना दिया। छोकरे ने हैरानी से पूछा-क्यों ताई, अब अखबार क्यों हटा रही हो?
ताई की आंखें चमक रही थीं और उसने कहा कि मैंने सुन लिया है कि वे कब आ रहे हैं? अब अखबार की क्या जरूरत? वे अपने पास के गांव में ही आएंगे और मैं जरूर जाऊंगी। इन दहेज लोभियों को जेल के पीछे पहुंचा कर रहूंगी और इससे दूसरे लोगों को कान हो जाएंगे कि छोरियों की तरह बहुओं को रखना चाहिए।
छोकरे ने इतना ही कहा कि ठीक है ताई, तेरा काम बन गया, मेरे पैसे चुकता कर दो और मैं चलूं। ताई अंदर गई और पैसे चुकता कर औरों को बताने चल दी। ताई को यह उम्मीद भी थी कि कुछ लोग उसके साथ चलेंगे तो मुख्यमंत्री को बात सुनने में सच्ची लगेगी। वैसे भी नेता लोगों की भीड़ देखकर ज्यादा खुश रहते हैं। वह भी लोगों को इकट्ठा कर ले जाएगी और स्कूल के मास्टर से अर्जी भी दिखवा लेगी क्योंकि अर्जी दिए बिना मुख्यमंत्री को याद कैसे रहेगा कि उसने क्या कहा था और कि वह क्या चाहती है?
वह स्कूल गई थी और मास्टर से मिन्नत कर अर्जी भी लिखवा ली थी। स्कूल में जाने को उसकी छोरी कितना तरसा करती थी उसने बेटी को पढ़ाया-लिखाया नहीं था। उसे न पढ़ाने का दुख भी ताई को बहुत हुआ। रास्ते में जो भी लडक़ी दिखी वह उसे खूब सारा पढऩे का आशीर्वाद देती, आंसू बहाती घर लौट आई और उस दिन के इंतजार में खो गई, जिस दिन मुख्यमंत्री आने वाले थे।
दिन भी कभी रुकते हैं? वक्त तो चलता ही रहता है और ताई भरपाई ने आस-पड़ोस की औरतों को इकट्ठा किया। औरतें घूंघट निकाले चल दीं, यह कहते हुए कि किसी की बेटी के साथ भी ऐसे न हो। बेटियों को समाज सांझा मानता आया है और आज भी यही सिलसिला चल रहा है।
पास के गांव के स्कूल में आ रहे थे मुख्यमंत्री। गांव की सडक़ की मरम्मत कर दी गई थी। लोगों का कहना था कि सडक़ के भाग जाग गए थे। चप्पे-चप्पे पर पुलिस का पहरा था। सडक़ की दोनों और सफेद चूना डाला गया था और जगह-जगह बैनर लगाए गए थे। ताई भरपाई ने कहा कि ऐसा स्वागत तो वह अपनी छोरी की बारात का भी नहीं कर पाई। साथ जा रही लुगाइयोंं का कहना था कि फिर राजा भोज और गंगू तेली की कहावत न खत्म हो जाए। बात बिल्कुल खरी-खरी कही थी।
पंडाल सजा हुआ था। लोग जिंदाबाद के नारे लगाते पंडाल में आते जा रहे थे। मंच पर पुलिस का बड़ा अफसर पैनी निगाहों से आने-जाने वालों को घूर रहा था। इन लुगाइयों को देखते ही उसने सादी वर्दी वाले अपने एक जवान को इशारे से बुलाया। जा पता लगा कर आ कि यह क्या करने आई हैं और कहां से आई हैं। जवान ने वापिस आकर जो कारण बताया तो अफसर को मानो सांप सूंघ गया हो।
अरे ये लुगाइयां तो मेरी खाट खड़ी करने आ रही हैं, बस, उसने तुरंत जवानों को बुला कर आदेश सुना दिया कि लुगाइयों को किसी भी सूरत में मंच तक पहुंचने नहीं देना, नहीं तो नौकरी गई, समझे। उसे याद हो आया, भरपाई का विलाप। रोना-धोना। क्या पता था कि गांव की अनपढ़ औरत इतना साहस करेगी?
उधर भरपाई हाथ में अर्जी थामे मन की मन सोच रही थी कि मुख्यमंत्री से क्या कहेगी? अपनी प्यारी छोरी का चेहरा याद आ रहा था। कैसे वह उसे डोली में बिठाते समय रोई थी कैसे उसे कुछ समय के बाद ही बेटी ने ससुराल के लोगों की करतूतों की पोल खोल कर बतानी शुरू दी थी। कैसे वह छोरी को समझाती थी कि बेटी तेरी विधवा मां ने जिस तिस की बातें सुन कर पाला पोसा है और अब इतनी हिम्मत नहीं है कि और दहेज दे सकूं। बेटी आखिरी बार मिन्नत कर गई की मां मुझे रख ले, मैं उन कसाइयों के यहां नहीं जाऊंगी, पर वह क्या जानती थी कि वे सचमुच उसे मार डालेंगे? ऐसा करेंगे तो किसी का कोई डर नहीं मानेंगे? अब पता चलेगा जब मुख्यमंत्री को अर्जी थमा देगी। वह शायद इसी तरह सोचती रह जाती कि जिंदाबाद के जोरदार नारों और धूल उड़ाती गाडिय़ों के शोर से जाग गई। लुगाइयों ने भी कंधा पकड़ कर जगाया कि बड़े नेता आ गए हैं।
भरपाई ने आंखें खोलीं। मंच पर पूरी भगदड़ मची हुई थी। छोटे-छोटे नेता सभी के सभी मंच पर बैठने की जगह पाने की होड़ में लगे थे। पुलिस के जवान मुस्तैदी से डट गए थे। कोई चिडिय़ा तक मुख्यमंत्री के पास फटक नहीं सकती थी, फिर भरपाई के बारे में तो खास तौर पर आला अफसर ने आदेश दे रखे थे। वह बेचारी हाथों में अर्जी थामे जैसे ही मंच की ओर बढऩे की कोशिश करती उसे भरोसा दिया जाता कि बस आपकी बात करवा दी जाएगी, अभी बैठो। इस बीच क्या-क्या हुआ वह नहीं जानती, उसे तो इतना ही पता था कि आज वह मंच तक पहुंचेगी जरूरी। उसे लग रहा था कि उसकी बेटी उसे धक्का दे रही है कि मां जा तो सही। देखते-दखते भरपाई घूंघट की ओट में हाथ में अर्जी थामे चल दी। आला अफसर ने आंखों से ही इशारा दिया। महिला पुलिस ने घेरा डाल दिया। वह हाथ छुड़ा कर भागी पर अफसोस मंच तक जाने से पहले मुख्यमंत्री का भाषण खत्म हो चुका था और आला अफसर उनकी गाड़ी का दरवाजा खोल कर खड़ा था। उसने खिडक़ी तक पहुंचते ही भरपाई के हाथ को रोक लिया और खट्ट से दरवाजा बंद कर सलूट ठोंक दिया। ड्राइवर को पहले ही समझाया जा चुका था कि यह बुढिय़ा सीन क्रिएट करेगी, इशरा मिलते ही गाड़ी भगा लेना। उसने वही किया।
भरपाई वहीं ठगी सी अर्जी हाथ में लिए खड़ी रही। उसने खूब विलाप करते हुएु कहा कि छोरी, बता ईब मैं कहां जाऊं? यह अर्जी किसे दूं और कैसे पहुंचाऊं? पंडाल से जा रहे लोगों के कान जैसे बहरे हो गए थे या शायद वे सुनकर भी अनसुना कर रहे थे।


संपर्क : 1034बी,
अर्बन एस्टेट-2, हिसार 125005
मो. 9416047075

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1 COMMENT

  1. हृदय को स्पर्श करती बेहतरीन कहानी समाज की व्यवस्था पर प्रहार करती है।नमन आदरणीय

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