स्मृतियों के आँगन में !!

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स्मृतियों के आँगन में
सुशील शर्मा

अब स्मृतियों के आँगन में,
आज कोई तस्वीर नहीं।

अंतस में है कोलाहल,
विस्मृति के अँधियारे भी।
उठे बवंडर मन में ऐसे,
घबड़ाये उजियारे भी ।

दूर क्षितिज पर
नेह नदी में
सपनों की जागीर नहीं।

थकी याद सिरहाने लेटी,
नैनों से काजल सरता।
टीस टहकता हृदय बेचारा,
नेह नयन अविरल झरता।

मन पागल सा
ढूंढे तुमको
मिलती क्यों तस्वीर नहीं।

वृक्ष वल्लरी चंपा महके,
ये मधुमास सुहाना है।
अरुण करुण कम्पित स्वर मेरे,
जीवन गीत सुनाना है।

विरह वेदना के अंतस पल
होली रंग अबीर नही।

सुशील शर्मा

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