विश्व पृथ्वी दिवस (विशेषांक) अप्रैल 2017

2
838

पृथ्वी दिवस –अप्रैल 2017 विशेषांक

धरती माँ :  रचनाकारों की नज़र में

 
वसुधा की गोद में मानव ने अपनी पहली साँस ली तो उसे जिस अपनत्व का अहसास पहली बार हुआ, वह है माँ!  माँ का कर्ज कोई भी नही उतार सका ।रचनाकार अपने सृजन में सदा माँ को किसी न किसी रुप में अनुभव करते रहें हैं।भूमि की गहराइयों में जो सहनशीलता ,ममत्व और सेवा-भाव  समाहित है ,उसे सहृदय रचनाकार कवि और सहृदय पाठक ही महसूस कर सकता है इसी लक्ष्य के तहत यहाँ धरती जिसे भूमि ,पृथ्वी,भू,वसुधा,वसुंधरा आदि विभिन्न नामों से पुकारा गया है .,से संबंधित विभिन्न काव्य रचनाओं को संकलित किया गया है …..
 

1*  धरती माँ के प्रति फर्ज

(दीपिका कुमारी दीप्ति,करहरा पालिगंज)

कोई विधवा बना रहा है छीनकर इसका श्रृंगार,
कोई बाँझ बना रहा है देकर दु:ख अपार,
हम वादा करते हैं लायेंगे धरती पर स्वर्ग उतार,
गंदगी फैलाकर नरक का खुद खोलते हैं द्वार,
बुद्धिमान होकर भी अनोखी दुनिया मिटा रहे हैं…

अपनी माँ से बिछड़कर शायद जीना है मुमकिन,
क्या पल भर भी हम जी सकते हैं धरती माँ के बिन,
फिर भी सहनशील माँ दर्द सहती है रात-दिन,
मानव होकर भी नहीं चुकाते धरती माँ का ऋण,
फिर भी मानव होने का हम नाज दिखा रहे हैं…

हम स्वार्थी बनकर बस ढूंढ़ते हैं अपनी खुशियाँ,
वृक्षों पर चला देते हैं बिना सोचें कुल्हाड़ियाँ,
कोई नहीं सुनता है इस धरती माँ की सिसकियाँ,
इसके ही अन्न-जल से चलती सबकी जिंदगियाँ,
ये जल मग्न हो जायेगी इतनी ताप बढ़ा रहे हैं…

हमारी नादानी से जब इसकी रुक जायेगी धड़कन,
फिर क्या करेंगे रहकर ये सूरज-चाँद-तारे-गगन,
प्रदुषण खत्म करने का हम आओ मिलकर दें वचन,
अपनी धरती पर चारो ओर चलो उगायें नंदन वन,
आनेवाली पीढ़ी के लिए हम क्या बचा रहे हैं।
क्या हम धरती माँ के प्रति फर्ज निभा रहे हैं ।।

 ***************************************

2*       ये धरा (गीत )
(तर्ज- जिंदगी की ना टूटे लङी….)

ये धरा है सुभग सुंदरी,
जैसे जन्नत से उतरी परी…..
हैं नजारे यहाँ पर जो देखो,
जैसे कुदरत की जादूगरी

1-ये हिमालय है जिसका मुकुट,
जिसकी बिन्दिया है कश्मीर सी।
नई दिल्ली की नथनी पहिन,
लग  रही   है  कोई    हीर   सी।।
ओढे हरियाली की चूनरी……  जैसे जन्नत..

2-कर मे कलकत्ता के कंगना,
बाजूबंद   दोनो  बंगाल के।
ज्यो नवेली सजाये नयन,
सुरमा गुजरात का डाल के।।
पहने मद्रास की मूंदरी…… जैसे जन्नत….

3-हार महाराष्ट्र का मेल उर,
बना केरल कमर करधनी।
नख मे कन्याकुमारी कला,
पावन  पंजाब  की  पैजनी।।
शैलेन्द्र कण कण मे ममता भरी…….
जैसे जन्नत से उतरी परी……….

शैलेन्द्र खरे”सोम”
नौगाँव, जिला~छतरपुर(म.प्र.)

********************************************

3*आतंकी साए में

(रवि कुमार ” रवि “,   लखीसराय ,बिहार)

मेरी नजर जहाँ तक जाती है ,एक बिंदु पर थम जाती है ।
दो जीव धरा पर आये होंगें , मानव सृजन  रचाए होंगे।।

संतानों में अपने कब ,उसने भेद किया होगा।
जिगर के अपने लहू पिला , सृजन सन्देश दिया होगा।

पर,बह रही जो हवा धुन्ध की,नियतउसकी ठीक नहीं
आदमखोर बना है मानव ,हालात बर्बर हैं ठीक नहीं।

मेरी नजरें देख रही है , हालात ऐसे ठने हुए हैं ।
आतंकी साए में , रक्तबीज पले हुए हैं।।

चकाचौंध से चकमक आँखें , लगी चुन्धियाने सी है।
अतृप्त कामना ,गहराते तम में ,लगी अन्धियाने सी है।।

सुने कौन फ़रियाद किसी का ,कान वाले जब बहरे हों।
दाग धुले दामन के कैसे , दाग जब इतने गहरे हों।।

दूर गगन में बैठ विधाता , खुद पर खीज रहा होगा ।
कैसा जग बनाया मैनें ,खुद से पूछ रहा होगा।।

सोच रहा होगा वो , मैनें तो बस इंसान बनाया ।
आदमी से डरा आदमी , है आतंक इतना गहराया।।

बारूदों के गंध से जब , भूमंडल भर जाएगा ।
जो बचेंगें बाँकी मानव , कच्चा उन्हें खा जाएगा।।

मरघट इस वीराने में ,दीये का लौ जब ना मिलेगा।
सिसकती हुई आहों का ,स्वर भी जब ना गूंजेगा।।

कंकालों ,नरमुंडों से जब ,पटी होगी दुनिया सारी।
नख से नख टकरायेंगे जब,भयावह,त्रासदी ,महामारी।

शांत धरा के नीरवता में ,सागर जल हुँकारेंगें ।
नभचर ,जलचर आपस में , महामोद मचायेंगें।।

पहाड़ों और पठारों के मध्य ,वार्ता कुछ ऐसा होगा।
ना मैं बड़ा , ना तू छोटा ,वरना हालत कुछ ऐसा होगा।

कंकालों , मुण्डों के बीच , कवि एक काम तू करना।
सारी शक्ति लगाकर अपनी , पुरजोर अट्टहास करना।

सूख जाए गर स्याही तेरी ,रक्त में अपने कलम डुबोना
छंद कोई फिर रचना , छंद कोई फिर रचना ।।

***************************************

   4 * तड़प धरती की

(ममता बनर्जी गिरिडाह,झारखंड।)

विकास की धारदार ,कुल्हाड़ी की चोट से,
कट रही है हरियाली!
तड़प रही है धरती,
प्रदूषण के आगोश में ।

सूरज की पराबैंगनी किरणें,
लपक रही हैं, धरती की ओर…
धरती तप रही है ।

उधर
धरती के बाशिंदे
आकलन करने में जुटे हैं
अपनी उपलब्धियों का ।

खींचकर धरती के नसों से पानी
बना रहे हैं बांध
कि खिलेगा एकदिन
स्वप्न-कमल कोई
विकसित सभ्य
और
आरामदायक समाज सा ।

कंक्रीट के जंगल में
टांग रहे है
बड़े-बड़े बैनर-
” पेड़ लगाओ, धरती बचाओ ” ।

कैसे बचेगी धरती ?
वो तो तप रही है ।
पानी के बिना नसें सूख रही है उसकी ।

ए मानव,  देखो
कातर दृष्टि डाले धरती देख रही है अपलक
आसमान में छाए छिट-पुट बादलों की ओर ।
कर रही है विनती
कि
हे बादल,
झम-झम बरसो..
मेरी सूखी नसों में पानी भरकर बचा लो मुझे!!

****************************************

 5 * देख रही धरती (रेनू सिंह

शिवपुरी,टूण्डला,फिरोजाबाद)

1.शीश झुका कर वंदन करना भूल गए,

कर्ज़ भुलाया नाता अपना तोड़ दिया।

प्रदूषण,ओजोन,बम बिस्फोट की हवा

दम घुटने को कैसे माँ को छोड़ दिया।

2.कभी मानवता की फसलें उगा करती,

अब जातिवाद खेती की धुन बजती है।

रंग बिरंगे फूलों की फुलवारी थी,

सिर्फ एक रंग से आज वह सजती है।

3.आधुनिकता के मारे दूर भाग रहे,

कसमें झूठी,वादे सारे सच्चे हैं।

धरती कितनी सदियों से यह देख रही,

मकान पक्के,रिश्ते सारे कच्चे हैं……..

*****************************************

 6* माटी की पीर

(ओम प्रकाश अग्रवाल,”बबुआ” ,मुम्बई)

सूर निराला तुलसी मीरा,
जिस माटी ने जाए हैं।
आज उसी माटी ने तुममे,
अंकुर नए उगाए हैं।।

आओ अपनी माटी का हम,
थोड़ा तो गुणगान करें।
काव्य सृजन की ईश कृपापर,
थोड़ा तो अभिमान करें।।

जिस धरती पर शरण मैथिली,
दिनकर ने अवतार लिया।
रसखान हुए थे जिस धरती पर,
कबीरा ने श्रृंगार किया।।

मनहर काका हाथरसी,
और प्रदीपा वतन दुलारा।
जय रवीन्द्र जय निदा फॉजली,
कितना है उपकार तुम्हारा।।

पुण्य मही की माटी ऐसी,
कण-कण गूँजा करता है।
शब्दों का ये वीर बाँकुरा,
कहाँ किसी से डरता है।।

फिर क्यूँ मौन पटल है बोलो,
क्यूँ मौन विधा अपना ली है।
कहीं व्यस्त हैं आप और या,
तरकश तीरों से खाली है।।

****************************************

      7  * जग जननी (कैलाश सोनी “सार्थक”)

जग जननी की बात करे हम,
इसका खेल निराला है।
इसका मोल चुकाऐ कैसे,
जिसने हमको पाला है।।
सब जीवों का पालन करती
मेरी ये धरती माता,
ये चाहे तो करे अँधेरा
होती रजा उजाला है।।

जात-पात ये नहीं मानती
ये जाने पालन-पोषण,
कोई भूखा रहे नहीं औ’
देती सबको ये भोजन,
हर इक रूप निराला इसका
ये ही इसकी है महिमा।
माँ धरती की पावन माटी
माँ का दिल मतवाला है।।

छाती पर ये हल चलवाती
सब खाद्य देती जन को।
खाकर जिससे जीवन चलता,
चैन मिला है हर मन को।।
नही बोलती दुखड़ा अपना,
इसकी ये ही है माया।
दुख सहकर सुख भर देती ये
माँ बन हमें सँभाला है।।

बड़े- बड़े वीरों को इसने,
जन्म दिया इस माटी में।
पावनता औ’मानवता है,
इसकी हर परिपाटी में।
खून गिरा है मन रोया तब।
मुख से कुछ कैसे बोले।।
जब-जब खूँ से लाल हुई ये,
वो दिन कहती काला है।।

फूल खिलाती औ’ मुरझाती,
खार भी सँग उगाती ये।
महक बढ़ाती चमन खिलाती,
चुभन भी सँग दिलाती ये।
भेदभाव नही करती माता,
सबको रखती इक जैसा।
“सोनी” कहता धरती माँ ने,
सुख में सबको ढाला है।।

***************************************

        8*मुक्तक

रेखराज स्वामी (कोटा ,राजस्थान)

जिस धरती पर बहती गंगा ,
उस धरती को नमन करें !
आओ हमसब मिलकर फिर से,
भारत भू को चमन करें !!
रिषियों की पावन धरती को,
फिर असुरों ने ललकारा है !
रघुवंशी यदुवंशी बनकर  ,
उन दुष्टों का हम दमन करें !!

**************************************** 9*धरती की महानता

(प्रमोद सनाढ्य,
श्री नाथद्वारा,राजस्थान।)

शीश झुकाकर नमन करूं
मैं  इस माटी को वंदन है।

राणा प्रताप की  रण भूमि
“हल्दी घाटी”  अभिनन्दन है।

अभिनन्दन  मेवाड़ धरा
वीरों की धरती वंदन है।

इस माटी का तिलक लगाऊं
इसका रज कण कण चन्दन है।

चेतक की  कुर्बान  धरा,
पूंजा की अमर कहानी है।

तंवर वीर सेनानी  की ये
बचपन और जवानी है।

(यहाँ वीर तंवर की तीन पीढ़ी ने एक साथ युद्ध किया था)

इस के आँगन की रक्त तलाई,
वीरों की  गाथा गाती  है

चैत्री गुलाब  फूलों की खुशबू
घाटी  को  महकती  है।

इस माटी में जन्म लिया मैंने
इस पर मुझ को अभिमान है।

ये मेवाड़ के गौरव वाली
मिट्टी बड़ी महान है।

***************************************

10*  “धरती” (नीरजा मेहता,गाजियाबाद)

जीवन का आधार ये धरती
ऊर्जा का संचार ये धरती।

छाती पर सब वहन है करती
देश का दुलार ये धरती।

सर्दी गर्मी हो या वर्षा
खुशियों की बौछार ये धरती।

अन्न फूल फल से संजोयी
कृषकों का त्योहार ये धरती।

बड़े- बड़े वीर इसपर जन्मे
शहीदों पे न्योछार ये धरती।

राम कृष्ण भी इस पृथ्वी के
बड़े- बड़े संस्कार ये धरती।

प्रलय अकाल भूकम्प दिखाकर
करती हाहाकार ये धरती।

रक्षा करें सब इस धरती की
भरें शपथ हुंकार ये धरती।

जन्में इसकी कोख में हम सब
मरण गोद उपसंहार ये धरती।

*********************************************11 कश्मीर धरा  (प्रमोद सनाढ्य,नाथद्वारा)

—————————-
आज मेरी कश्मीर धरा फिर
खून के आंसू रोई है,
जाने क्यों ये दिल्ली फिर भी
आंख मूंद कर सोई है।

भारत भू के आँचल पर ये
कैसा अत्याचार हुआ
हाथों में हथियार मगर क्यों
सैनानी लाचार हुआ

पाक पड़ौसी आतंकवादी
इस धरती पर डोल रहे
भारत माँ के कुछ भटके भी
उनकी भाषा बोल रहे

सुन लो छप्पन छाती वालों
फिर दुश्मन ललकार रहा,
शेरों के इस आंगन में वो
गीदड़ ख़म फटकार रहा।

देख तुम्हारी चुप्पी भारत
माँ भी आंख भिगोती है
जाग उठो ऐ देश के नायक
अब तो हद ही होती है।

खड़ी सामने तेरी सेना
बस तेरे आदेश में
धुल चटा देंगे दुश्मन को
जाकर उसके देश में।

उस धरती पर तांडव होगा
भारत के सैनानी का
ये इतिहास गवाही देगा
उसकी अंत कहानी का।

आतंकी ना फिर आएंगे
इन परवत की राहों में
केसर कलियां फिर महकेगी
वसुन्धरा की बाहोँ में।

खुशहाली के फूल खिलेंगे
भारत माँ की शान के
दुनियां में फिर चर्चे होंगे
मेरे हिंदुस्तान के।

प्रमोद सनाढ्य”प्रमोद”
नाथद्वारा

********************************************

    12  *  छंद : विधाता

छिपा कर दर्द सीने में सजे अधरों पे लाली है;
धरा आंगन ये है सूना जगत माया निराली है।।

बनी काया ये माटी की करे अभिमान क्यूं इतना;
दिखाया मान जिसने भी गया जग से वो खाली है।।

चुभे खंजर ये नफरत का बढ़े जब पौध कांटों की;
गिराकर दूसरों को कब सजी ये रात काली है।।

गँवाकर नींद रातों की जो बदले सोच लोगों की;
बिछे कदमों में है जन्नत बजाए विश्व ताली है।।

रुहानी नूर को पाकर ये गुलशन महक हैं जाते
दिखे फिर “पूर्णिमा”नभ में खिले वसुधा की थाली है।
***************************************

संकलित

.डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर(पंजाब)

drpurnima01.dpr@gmail.com

 
 
 
Loading...
SHARE
Previous articleतन्हा कवि: प्रमोद सनाढ्य
Next articleहाथी के दाँतby देवराज डडवाल
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

2 COMMENTS

  1. सभी रचनाकारो की रचनाएँ बहुत ही उत्कृष्ट और उम्दा है।
    सभी को बेहतरीन सृजन के लिए हार्दिक बधाई।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here