डॉ.राजकुमार ‘निजात रचित “नदी को तलाश है “काव्य-संग्रह :एक विवेचन (डॉ.पूर्णिमा राय )

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डॉ.राजकुमार ‘निजात रचित “नदी को तलाश है “काव्य-संग्रह :एक विवेचन (डॉ.पूर्णिमा राय )साहित्य क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाने में सक्षम एवं विभिन्न साहित्यिक सम्मान प्राप्त डॉ राजकुमार ‘निजात’जी का काव्य संग्रह “नदी को तलाश है”एस.एन.पब्लिकेशन,नई दिल्ली से सन् 2018में प्रकाशित हुआ है।जीवन एवं समाज के प्रति सकारात्मक भाव रखने वाले कविवर निजात जी के 127 पृष्ठ के इस संग्रह में 186 लघु कविताओं का सुसज्जित ढंग से संकलन सहृदय पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

“नदी को तलाश है”खूबसूरत एवं आकर्षक कवर महज एक खोखलापन नहीं लगता है वरन् साभिप्रायता तथा सार्थकता से परिपूर्ण दिशासूचक दस्तावेज है। वर्तमान के कलेवर को समेटते हुये कवि जीवन व समाज के प्रति चिन्तित है ,इसका सार्थक उदाहरण पृष्ठ 5 पर कवि द्वारा स्वीकारा गया है ।जब वे कहते हैं कि यह संग्रह मात्र 7 दिनों में लिखी 144 लघु एवं 42 सामान्य कविताओं की उपज है।हरेक कविता कवि द्वारा भोगे गये क्षण की नित नवीन अनुभूति लगती है जो कवि के साथ-साथ सामान्य पाठक वर्ग को भरपूर ऊर्जावान बनाती है।

यह सर्वविदित है कि कवि यथार्थपरक भोगे अनुभवों को वाणी देता है जो सीधे पाठक एवं बुद्धिजीवी वर्ग को क्षीण होती जा रही मानवीय संवेदना के प्रति अपना दायित्व निभाने को प्रेरित करता है।कवि को आत्मतुष्टि तब तक नही मिलती जब तक वह अपने रचना संसार से समाज में व्याप्त कुरीतियों को जड़ से समाप्त नही कर लेता और व्यक्ति के अन्तर्मन को बेंध नहीं लेता। कविवर निजात के इस संग्रह की कविताएं काल्पनिक की उपज नहीं है वरन् अनंत ,विस्तृत और व्यापक फलक पर केन्द्रित है।डॉ .पुष्पा रानी ,प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय पृष्ठ 11 पर अपने वक्तव्य में कहती हैं कि “ये कविताएं विचारधारा और नीरस गद्यात्मक से अटी पड़ी कविताओं के बीच लीक से हटकर रची गईं हैं इसलिये यह हमारे लगभग जड़ हो चुके स्वाद में या काव्यात्मकता में भारी फेर बदल भी करती हैं। ” यह कथन अक्षरशः सत्य सिद्ध हुआ है।

पठनीय एवं संग्रहणीय काव्य -संग्रह “नदी को तलाश है”की
सरल व सहज भाषा किसी भी तरह की नाटकीयता से कोसों दूर है ।हृदयस्पर्शी सृजनात्मक कविताएं कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति ही नही करती बल्कि एक ऐसे स्वतंत्र एवं उन्मुक्त संसार की सृष्टि भी करती हैं जहाँ हरेक कविता की भावभूमि हमें अपने से सटी हुई लगती है ।यथा–
सूरज ने /रोशनी की बांग दी/दूर दूर तक /धरती जाग उठी/…(पृष्ठ 15) बेहद खूबसूरती से कवि ने कुछेक शब्दों के माध्यम से बड़ी बात कह दी ।

एक से बढ़कर एक शीर्षक प्रधान कविताएं इस संग्रह की शोभा बढ़ाती हैं। “भिक्षा पात्र ” कविता जहाँ अमीरी का दिखावा व ढोंग का पर्दाफाश करती है वहीं गरीबों की सहृदय भावनाओं का उद्घाटन भी करती है। “द्वार बंद हो गया” कविता आधुनिकता और भौतिकतावादी युग में जी रहे लोगों की मानसिकता दर्शाती है।”बूढ़ा वृक्ष “कविता का निम्न उदाहरण देखिये–
..सुना है /आजकल फल नहीं देते/दादा जी बोले-बेटा/मैं मौसम से पहले ही झड़ जाता हूँ/…

“समय के साथ “कविता भागदौड भरी जीवनशैली का हाल ब्यां करती है—….वह आता है जाता है /समय के साथ /दौड़ लगाता है/पढ़ना सीख जाता है।

आज अकेलापन मानवीय ही नहीं प्राकृतिक रुप से हृदय को कचोटता है “वह अकेली थी” कविता में जहां कवि ने बहुत ही सहज रुप से इस समस्या को दिखाया है वहीं “प्रेमधार” कविता
नया संसार रचने का प्रेम की भावना उपजाने सार्थक संदेश देती है।

“मैं जननी हूँ “कविता धरती माँ के मातृत्व को अंगीकार एवं स्वीकारने के लक्ष्य से सराबोर है।माँ और माँ की शक्ति अथाह है अक्षरशः सत्य है ।जिसका रहस्य यह अनंत असीम कुदरत भी नही पा सकती।
यथा-मैं जननी हूँ/मेरा मातृत्व/ मेरा प्रेम /अनंत अथाह है/ तुम जहाँ नहीं हो /वहाँ तक मेरा प्रवाह है।

आज नारी की उन्नति चरम सीमा पर है पर आज भी वह घिनौनी नजरों से खुद को बचा नही पाती ।नीच मानसिकता के लोग आज भी उसे जीने नहीं देते ।कवि निजात की पृष्ठ 34पर दर्ज कविता “एक वह”इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।यथा —
…न देखती ताकती है इधर उधर /न किसी से बतियाती है/ फिर भी उस पर /कहीं न कहीं से /शामत आ जाती है।

“बिना परिन्दो के” कविता लुप्त हो रहे पक्षियों की प्रजातियों के प्रति चिन्तित है और 21वीं सदी के मानवीय बच्चों के असमय प्रौढ़ होने पर खो रही मासूमियत को पुनः जीवंत करने का अनूठा प्रयास अप्रत्यक्ष रुप से करती है।

निष्कर्षतः “नदी को तलाश है”काव्यसंग्रह महज वैयक्तिकता के क्षोभ की उपज नहीं है वरन् सामाजिक जीवन की आधुनिक भावभूमि की प्रासंगिकता से लबरेज़ है।

डॉ .पूर्णिमा राय
शिक्षिका, लेखिका एवं कवयित्री
ग्रीन ऐवनियू घुमान रोड
तहसील बाबा बका ला
मेहता चौंक 143114
अमृतसर (पंजाब)
ईमेल–drpurnima01.dpr@gmail.com
वेबसाइट-www.achintsahitya.com

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