पिता की क्या कहूँ महिमा पिता ही बागवाँ घर का!!

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पिता की क्या कहूँ महिमा पिता ही बागवाँ घर का!!

बिना मतलब ज़माने में मुहब्बत कौन करता है।
धरा पर ही खुदा जैसी हिफाजत कौन करता है।

कहा बिल्कुल नहीं लब से मगर कैसे सुना उसने
हमारे ख़्वाब आँखों के हकीकत कौन करता है।

मना करती रही मम्मी खिलौने ढे़र भर लाते
खुशी के वास्ते उनपर इनायत कौन करता है।

किसी भी दौर में पीछे रहे ना बेटियाँ उनकी
उसी के वास्ते मीठी मलालत कौन करता है।

अगर परिणाम अच्छा ना मिले केवल निराशा हो
भरे आशा दिली शब्दी नफासत कौन करता है।

बिमारी ने अगर घेरा कभी आकर के बच्चों को
खुदा के सामने बेबस लियाकत कौन करता है।

अगर बच्चों में झगड़ा हो गया बेबात बेमतलब
कड़क आवाज़ से झूठी अदालत कौन करता है।

चमकते चाँद सूरज हो कदम पथ कामयाबी पर
खुदा के सामने ऐसी इबादत कौन करता है।

सताता है जो उसकी बेटियाँ वो कान से सुन ले
नफ़रत घोल कर दिल में शिकायत कौन करता है।

कहा मम्मी ने ऐसे और वैसे बेजवह उनको
उन्हें मम्मी के शब्दों की अकीदत कौन करता है।

पिता की क्या कहूँ महिमा पिता ही बागवाँ घर का
बहाकर प्रेम की नदियाँ जियारत कौन करता है।
संगीता पाठक।

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