काला कुंकुम !!

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काला कुंकुम (डॉ.मंजुला चौहान )

घर में खामोशी थी। सब फोन का इंतजार कर रहे थे। भैय्या आंगन में इधर से उधर, उधर से इधर टहल रहे थे। तभी फोन की घंटी बजी। बाबूजी ने फोन उठाया,
‘हैलो, कितनी देर लगा दी फोन करने में। क्या हो रहा है वहाँ?, अच्छा अब क्या होगा? मैं अगली ही गाडी से चला आता हूँ। (सामने से शायद मना कर दिया हो) अच्छा मैं यहीं रहता हूँ। पर खबर देते रहना।’ फोन रख दिया।
माँ ने पूछा ‘क्या खबर है जी?’
‘ऑपरेशन चल रहा है। कुछ कहा नहीं जा सकता।’
माँ रोने लगी। भाई को भी धक्‍का सा लगा।
मैं अंदर के कमरे में बैठी थी। तभी बुआ ‘मनु, मनु’ पुकारती अंदर आई। और मुझसे लिपट कर रोने लगी। मुझे रोना नहीं आ रहा था, पर बुरा जरूर लग रहा था।
बुआ मेरे सिर पर हाथ फेरती किस्मत को कोसती रही। इतनी छोटी उम्र में क्या क्या देखने को मिल रहा है। तुझे विदेश से आना ही नहीं चाहिए था। माँ अंदर आई और बुआ को समझाने लगी।
‘दीदी, अभी कोई बुरी खबर नहीं है। होसला रखो।’
‘अरे और क्या बुरा होना बाकि है, उसको साँस लेने में भी तकलीफ हो रही है।’
‘फिर भी दीदी इस तरह मनु के सामने ! आप बाहर चलिए।’
‘हाँ हाँ चलती हूँ।’
कभी नहीं सोचा था यह दिन इतनी जल्दी आयेगा। मैंने भगवान से नाता ही तोड़ लिया था। आज उसने मेरी प्रार्थना सुनी। मुझे सुरेन्द्र पहले ही पसन्द नहीं था। बाबूजी ने पता नहीं उसमें क्या देखा, जिस दिन देखने आया था। उसी दिन बात पक्‍की कर दी। किसी ने भी मुझसे पूछने का कष्ट नहीं किया। शादी एक महीने बाद थी। बीच-बीच में मिलने जाता था। पर मुझे उसका बर्ताव अजीब लगता था। कहता था, ‘तुम्हें मंदिर पसंद है या होटल?’ मैंने मंदिर कहा तो, मुझे पता है, तुम्हें होटल पसंद है। चलो होटल चलते हैं।
‘पर मैंने तो मंदिर कहा’
‘लड़कियाँ हमेशा उल्टा ही बोलती हैं’
‘पर मैं सच कह रही हुँ, मुझे मंदिर ही पसंद है।’
‘चलो कोई बात नहीं, मंदिर किसी और दिन चलेंगे। आज होटल ही चलते हैं।’
उसने तो ठान लिया था। किसी की बात न सुनने का। घर पर उसके बर्ताव के बारे में माँ से कहा तो,
‘बेटी शादी से पहले कोई इतना नहीं घुमाता। तुझे घूमाता है, कपडे दिलाता है, जो भी चाहो अभी माँग लो। पर ऐसे बेतुकी बातें सोचा न करो। बहुत प्रेम करता है वो तुझे।’
मनु के समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? फिर उसने अपने भाई से भी बात की तो उसने कहा, ‘देख मनु घर में मेरी बात तो कोई नहीं मानता। अगर मेरी वजह से तेरे रिश्ते में गड़बड़ी हुई तो सब मिलकर मेरी जान ले लेंगे। तू पढ़ी-लिखी है। समझदार है। इसलिए अपनी समस्या का समाधान तुम्हें ही ढ़ूँढ़ना पड़ेगा।’
भाई ने बात तो सही की थी। पर मैं क्या करूँ? जैसे जैसे शादी का दिन नज़दीक आने लगा। उसकी फरमार्ईशें ज्यादा हो गईं। चाहे मैं किसी भी काम में व्यस्त क्यों न होऊँ, उसका फोन आते ही उठाना चाहिए। वरना मेरी तो खैर नहीं। कभी कभी तो जिन्दगी जहन्नुम लगने लगी थी। इस आदमी से मिलने से पहले मैं बहुत खुश थी। पर आज मेरी जिन्दगी में दुख की बदली लग रही थी। अस्पताल से फोन आया ऑपरेशन सही ढ़ंग से हो गया। थोड़ा अच्छा लगा। पर उसे कितनी चोट आयी थी। किस का ऑपरेशन हुआ था। इसका मुझे बिलकुल पता नहीं था। हम सब अस्पताल गये। उसके माँ-बाप सारे भाई-बन्धु वहीं पर थे। मुझे देख सुरेन्द्र की माँ पास आई और लिपट कर रोने लगी। मैंने उनको समझा कर एक कुर्सी पर बिठा दिया। भाई के हाथ कॉफी मंगवाई। उन्होंने मना किया पर मैंने जबरदस्ती कर एक कप कॉफी पिला दी। सब लोग मुझे ही देख रहे थे। ‘देखो, मनु अपनी होनेवाली सास का कितना ख्याल रख रही है।’ सभी की नज़र उस ओर चली जाती है। मनु उन्हें अपने छाती से लगाकर उनका रोना कम करती है। डॉक्टर ने कहा, सुरेन्द्र को होश आ गया है। उससे मिल सकते हैं पर बारी-बारी। सब लोग बारी बारी मिल कर भी आ गये। अब मनु की बारी थी। उसका दिल जोर जोर से धड़कर रहा था। सोचा कोई बहाना बनाकर अंदर जाने से मना कर दूँ। पर सुरेन्द्र की माँ ने मनु से कहा, ‘अब सिर्फ तुम ही उसका हौसला बढ़ा सकती हो।’ मनु यह सुनकर अंदर चली गई। सुरेन्दर उसे देख रहा था। पर बोलने की अवस्था में नहीं था। बेड के पास वाली कुर्सी पर आ कर बैठ गई। उसकी हालत बड़ी नाजुक थी। सुरेन्द्र कुछ बोल नहीं पाया। पर इशारे से पास बुलाता है। पहले मनु को समझ में नहीं आया पर सुनने के लिए उसके पास चली गई। धीमे से सुरेन्द्र ने कहा, ‘खुश हो ना?’ यह सुनते ही मनु पीछे हटी और भागती बाहर निकल आई। उसे सहमी सी देख सुरेन्दर की माँ मनु के पास आकर ‘डरते नहीं बेटे, उसे कुछ नहीं होगा। तुम्हारा प्यार उसे मौत के मुँह से लौटा लाया है। कुछ ही दिनों में वो ठीक हो जाएगा। हौसला रख।’
मनु डरते डरते घर पहुँची, सोच में पड़ गई कि उसने ऐसे क्यों कहा? मैंने तो कभी इस बारे में उससे बात नहीं की ! तो फिर उसे कैसे पता चला या उसने ऐसे ही कुछ कहा होगा, मैं क्यों इतना सोच रही हूँ। खैर सब घरवाले आ गये थे। खाना खाने माँ कमरे में बुलाने आई। मैंने खाने से मना कर दिया। माँ ने कहा ‘इतनी चिन्ता मत कर, चल खाना खा ले।’ ‘आप को लगता है, मैं उसकी चिंता में खाने से मना कर रही हूँ?’
‘तो और क्या बात है?’
‘जिस इन्सान से मैंने शादी करने से भी इनकार कर दिया था, उसके लिए चिंता ! बिलकुल नहीं।’
‘क्या बोल रही है? महीने बाद शादी है और तू।’
‘हाँ है शादी, आप लोगों के खातिर मुझे चुप रहना पड़ रहा है।’
‘मनु, बस कर’
‘क्यों माँ, क्यों बस करूँ, मेरी जिन्दगी है, इस पर मेरा भी हक है।’
‘बेचारा वो अस्पताल में पड़ा जिन्दगी के लिए लड़ रहा है और तू हक की बातें कर रही है।’
‘बेचारा….वा अच्छा है, उसे आप दो महिने पहले मिली हैं। मेरे लिए इतना प्रेम और मैं आप की बेटी जिसे आफ ने जनम दिया है, उसके लिए आप के मन में कोई प्रेम नहीं? क्यों माँ….?’
‘मनु, मैं तुम से बहुत प्रेम करती हूँ। इसीलिए तो कह रही हूँ…..’
बात को काटते हुए ‘क्या कह रही है, बताओ।’ तभी वहाँ बुआ आ गई। बातों पर रोक लगाते हुए ‘चल चल खाना खा ले’
‘आप जाइए मैं बाद में खा लूँगी।’
‘कैसे खाना जाएगा बेचारी परेशान है ना, जाने दो बाद में खा लेगी।
‘हाँ, दीदी चलिए, हम खा लेते हैं।’ मनु चुपचाप खिड़की में देखती रह गई।
सारी रात सोच में ही बीत गई। सुबह माँ मनु को जगाने आई, पर मनु कमरे में नहीं थी। माँ थोडी घबराई सी कमरे से बाहर निकल बेटे को बताया। उसने भी बेपरवाही दिखाते हुए कहा, ‘छोटी बच्ची नहीं है, यहीं कहीं गई होगी। चिल्लाती मत फिरो।’ उसकी बातों से माँ को बड़ा गुस्सा आया। पर क्या करती चुप-चाप किचन में चली गई।
घंटे भर बाद मनु लौटी। मनु को देख माँ ने पूछा, ‘सुबह-सुबह कहाँ चली गई थी?’
‘अस्पताल’
अस्तपाल का नाम सुनते ही माँ की आँखें चमक उठी।
‘क्यों’
‘क्या क्यों एक इनसान अस्पताल में पड़ा पड़ा जिन्दगी और मौत के बीच तड़प रहा है तो मैं कैसे घर में आराम से रह सकती हूँ और वो इन्सान मेरा होनेवाला पति है, माँ?’
उसकी बातों में ताने की बू आ रही थी। ‘ताना दे रही है?’
‘आप को ! आप मेरी माँ है। आप को ताना कैसे दे सकती हूँ?’
‘मनु…’ ’बस करो माँ, पीछा छोड़ दो, शादी कर रही हूँ’
मनु वहाँ से चली गई। माँ उसके पीछे-पीछे दो तीन कदम गई और रुक गई। अब वे भी सोचने लगी। शायद शादी तक यह कुछ गडबड कर सकती है। सोचकर पति से बात करती है। ‘दिमाग खराब हो गया है। उसकी उम्र ३५ साल है, पूछो कोई और लड़का है, तो आज ही यह शादी तोड़ कर कल उसके साथ करवा दूँगा। जाओ कह दो चुप-चाप रहना सीखे।’
पिताजी की आवाज कमरे तक गूँज उठी। मनु सिहर गई। वह अकेले अपने को कमरे में बन्द कर पड़ी रही। शाम को सुरेन्दर की माँ घर पर आई। मनु के माँ-बाप थोडे घबरा गये। पर अपनी घबराहट को छूपाते हुए उनके आदर-सत्कार में लग गये। मनु को बुलाया।
मनु को पास में बिठा कर, ‘देख तुझसे तो कोई बात छुपी नहीं है। सुरेन्दर की हालत देख रही है। एक महीने में उसकी हालत शायद ठीक नहीं हो सकती। इसलिए शादी छः महीने के लिए आगे बढ़ादी है। तुम्हें इससे कोई आपत्ति तो नहीं है?’
मनु यह सुन अंदर ही अंदर बड़ी खुश हुई। पर छः महीने बाद शादी करनी ही पड़ेगी? यह सोचकर उदास भी हुई। पर अब के लिए शादी का टलना खुशी की बात थी। मनु की उदासी देख सुरेनदर की माँ ने उसे गले लगा लिया और कहा,
‘जी छोटा मत कर, मैं समझ सकती हूँ।’
कल तक मनु बड़ी उदास हो कर घूम रही थी पर आज कल मुस्कुराती दिखने लगी। माँ ने उसे कहा ‘ये क्या दाँत निकालती रहती है। अस्पताल में पडे पडे बेचारे सुरेन्दर का चेहरा उतर गया है और तू मुस्कुराती घूम रही है।’
‘माँ, अपनी अपनी करनी है। क्या कर सकते हैं।’
‘छः महीने बाद तुझे उसी से शादी करनी है।’
सुनते ही मनु का दिमाग घूम गया। ‘माँ, आप को सुरेन्दर की माँ होना चाहिए था और उसकी काश, मेरी माँ होती।’
‘अच्छा बात यहाँ तक आ गई।’
‘सत्य बड़ा कड़वा होता है’ मनु इतना कह वहाँ से चली गई।
अस्पताल में मिलने मनु आई तो सुरेन्द्र पहले से बड़ा अच्छा लग रहा था। मनु के आते ही उसकी माँ वहाँ से जाने को तैय्यार हुई। मनु घबरा गई, कहा,
‘आप भी रुकिये ना’
‘तुम दोनों के बीच मेरा क्या काम।’ आँखों से इशारे करते हुए वहाँ से निकल गई। अब क्या करे? कैसे अकेले बैठे। सुरेन्दर उसका हाथ पकड़ धीरे से खींचता है। सहमी सी आकर उसके पास बैठती है।
‘चार दिन से आई क्यों नहीं मिलने?’
‘काम था।’
‘मुझसे भी जरूरी काम था?’
‘नहीं पर था।’
‘चलो शादी छः महीने आगे चली गई। खुश हो?’
‘हाँ’ अचानक ‘नहीं मतलब आप तब तक ठीक हो जायेंगे ना।’
‘ठीक तो मैं अभी भी हूँ। शादी कल ही कर लेते हैं।’
‘कल’ चौंककर।
‘वैसे मैंने वो चिट्ठी पढ़ ली थी।’
मनु के पैर थर-थराने लगे। हाथ ठंडे पड़ गये। आँखें भर आई। तभी सुरेन्दर ने उसके हाथों को अपने हाथ में लेकर ‘पहले थोड़ा गुस्सा आया, बाद में अजीब लगा, और फिर खुश हुआ।’
मनु चौंककर ‘खुश क्यों हुए?’
‘खुशी इसलिए कि मेरी होनेवाली बीवी समझदार के साथ साथ निडर भी है।’
बड़ी-बड़ी आँखों से सुरेन्द्र को देखने लगी।
‘हाँ, मुझे डरपोक बिलकुल पसंद नहीं है। मैं खुश हुँ कि तुमने अपनी मन की बात कहने में पीछे नहीं हटी।’
मनु उसकी बातें सुनकर बड़ी हैरान तो थी ही साथ ही परेशान भी हुई। यह बदलाव है या ढ़ोंग। उसके समझ में कुछ नहीं आया। पर उसकी बातें सुनती रही।
घर लौटकर सिर्फ उसके बारे में सोचती रही पहले के सुरेन्द्र से आज का सुरेन्द्र बड़ा सुलझा हुआ लग रहा था।
चार महीने बीत गये। सुरेन्द्र अब बिलकुल चुस्त-तंदुरुस्त हो गया था। ऑफिस भी जाने लगा था। मनु के साथ उसका व्यवहार बिलकुल बदल गया था। दोनों ने शादी जल्द से जल्द करने का फैसला भी कर लिया। घर पर बात की। सभी राजी हुए और धूमधाम से शादी भी हो गई।
शादी की पहली रात मनु कमरे में सुरेन्द्र का इंतजार कर रही थी। सुरेन्दर आया। उसने कपडे बदले और किताब लेकर पढ़ता हुआ लेट गया। मनु को थोड़ा अजीब लगा पर सुरेन्दर के पास जाकर उसने हँसते हुए कहा,
‘किताब इतनी अच्छी है, जो सुहाग रात होते हुए भी पढ़ रहे हो।’
सुरेन्द्र का कोई जवाब नहीं आया।
फिर मनु ने उसके हाथ से किताब छीन ली और कहा ‘अब क्या पढ़ोगे?’
सुरेन्द्र ने कुछ कहा तो नहीं पर मनु के गाल पर जोर का एक तमाचा पड़ा और कहा ‘मेरी इज्जत से खेलना चाहती थी? शादी तोड़कर मुझे नीचा दिखाना चाहती थी? अब सारी जिंदगी मेरे पैरों में पड़ी रहो।’ कहकर कमरे से निकल गया।
मनु के समझ में आ गया यह बदलाव नहीं था बदला था। आईने में अपने आप को देख रही थी। उसका लाल कुंकुम काला पड़ गया था।

डॉ .मंजुला चौहान
हिन्दी विभाग अध्यक्ष,
अक्कमहादेवी महिला महाविद्यालय,
बागलकोट-५८७१०१, कर्नाटक
फो. न. ८८८४००३७००
Manjularaj4u@gmail.com

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