आज तन्हा हूँ मगर तन्हाई का डर नहीं by Dr.Purnima Rai

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आज तन्हा हूँ मगर तन्हाई का डर नहीं by Dr.Purnima Rai

1)
आज तन्हा हूँ मगर तन्हाई का डर नहीं ।
तेरे मेरे प्यार का दिखा कोई घर नहीँ ।।
प्रेम की हर शाख पर प्रेम का जो बीज बोये,
इस जहान में अब नया उगता कोई शज़र नहीँ ।

2)
बात करने के बहाने से बात करता है वो।
मेरे लिये ही रोज क्यों आहें भरता है वो।।
किसी को गम मिले तो चेहरा मुरझा जाये,
नूर -ए-खुदा की मानिंद सब गम हरता है वो।।

3)
मुसाफिर न रुकते चाहे मिले मंजिलों पर अंधेरा ।
समय के साथ चलकर ही बनेगा मुकद्दर तेरा ।।
गिरा कर खुद को खुद से ही दूर जाओगे कहाँ ,
दुआओं के नूर से आबाद है हर पल जहान मेरा ।।

 

डॉ पूर्णिमा राय

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