युवा देश का भाग्य बना दो (विवेकानंद जयंती पर विशेष)

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युवा देश का भाग्य बना दो
(विवेकानंद जयंती पर विशेष)

सन 1893…विश्व धर्म का मेला…
भगवे से चोले में बैठा हुआ था संत अकेला…
उम्र.. महज़ थी तीस बरस की
पर तरकश में तीर बहुत थे
विश्व-धर्म की महां सभा में…
कहने को तो वीर बहुत थे
सबके अपने अपने दावे
सबका खुद का बखान…
उठा नरेंद्र…दे गया सबको…
धर्म का गीता-ज्ञान
फैल गयी गोरों की आंखे
यह किस धरा का पूत ??
पूर्व-दिशा के ज्ञान-यज्ञ में
पश्चिम का जला ताबूत..
रामकृष्ण की वाणी लेकर
वह बोला “सब जागो”
चहुओर.. बस विवेकानंद को..
देख रहा था..शिकागो
वेदों की वाणी के सारे खोले भेद महान…
संत विवेकानंद भर गया
धर्म-सभा में प्राण…
ज्यादा जीना नही जरूरी
चाहे थोड़ा जीवन पाओ..
कहे विवेकानन्द का जीवन..
कुछ ऐसा दे जाओ…
युगों-युगों तक कर्म तुम्हारे…
बिखरें बनकर धूप…
केवल तुम ही तुम बोलोगे
हो कोई भी रूप…
जीवन बस ऊर्जा का “खेला”..
जगत पसारा तो बस मेला
इस मेले से मोह न करना
जगत डराए.. तो मत डरना..
झूठों संग ,मत प्रीत बढ़ाना…
कायरता के गीत ना गाना…
धर्म-दर्पण में सदा झांकना..
देश-धर्म को ह्रदय बसाना…
गुरु को सब अर्पण कर देना…और भक्ति का मूल्य चुकाना…
धरती माँ का चंदन करना…
निज-माता का वंदन गाना…
अधिकारों की खाल पहनकर…
लाचारों को नही दबाना..
सुनो शिक्षकों..प्राणदाता तुम..
भारत भविष्य के भाग्य-विधाता तुम..
युवा शक्ति को दिशा दिखा दो…
भारत भूमि के भाग्य जगा दो…


राज✍

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