माँ, मैंने पैसे बोए थे!

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माँ मैंने पैसे बोए थे(बाल कविता)
सुशील शर्मा

माँ मैंने पैसे बोए थे।
वो देखो उग आए हैं।
छोटे छोटे पौधे बन कर
देखो वो मुस्काये हैं।

पैसे नही ऊगते बेटा,
माँ हँस करके बोली।
ऊगे हैं माँ वो देखो,
तू कितनी है भोली।

एक चवन्नी का पौधा है,
एक अठन्नी वाला।
दस पैसे के छोटे पौधे,
बीज एक रुपये डाला।

हरदिन इनको पानी देता,
हर दिन खाद चढ़ाता हूँ।
आसपास की घास खोदकर,
इनको रोज बढ़ाता हूँ।

पेड़ बनेंगे जब ये सब,
घर में पैसे बरसेंगे।
चुन्नू ,मुन्नू, सविता, गुड़िया,
मुझसे मिलने को तरसेंगे।

माँ तुझे बाजार घुमा कर,
एक सुंदर साड़ी लाऊंगा।
दादीजी का टूटा ऐनक,
सोने से जड़वाऊंगा।

बाबूजी को मोटर गाड़ी,
मुन्नी को सुंदर लहंगा।
दादा जी को कोट सिला
घर बांधूगा एक महंगा।

माँ सुनकर भोलू की बातें
मन ही मन मुस्काती है।
बच्चों के सपनों को सुनकर।
जीवन आस जगाती है।

सुशील शर्मा

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