लम्बी सी रातें !!

0
21

हाइकु’

कांपता सूर्य
चहुँ दिशी कोहरा
ठिठुरे जिस्म।
——–////——///

लम्बी सी रातें
सिकुड़े से बदन
कम्पित होठ।
——–///—–///

सूनी सी आँखें
गुम अपनापन
टूटते लोग।
———-////——////

नये दौर में
पल में फिसलते
रेत से रिश्ते।
——///——///—-//

जमती झीलें
कोहरे की चादर
ओढ़े प्रकृति ।
———-////—-////

सिकुड़ी बैठी
बर्फ़ीली सी दुल्हन
शर्म से पानी।


डॉ.यासमीन ख़ान 08-01-2019

Loading...
SHARE
Previous articleप्रश्न हमारा है यह तुमसे ,क्या हम फिर से मिल पायेगें।।
Next articleमाँ, मैंने पैसे बोए थे!
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here