अनोखा आगमन!

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अनोखा आगमन

बूढ़े दिसम्बर की साँस बिफर रही थीं
इच्छाएँ, अपेक्षाएं बिच्छू सी डंक मारती हुई
तन,मन शिथिल करने को युद्ध कर रही थीं,
पटाखों,धमाकों के बीच..
हैलो की गूंज ने तन मन मे प्राण फूंक दिये
आये तुम धन राज दिलो पर राज करने
भाव अभाव सिमट कर
बदल गए उल्लास,परिहास,नई आस में
सारी रात ठंड से लड़कर
आ पहुँचे मेरे क़रीब ,बन कर अज़ीज़
नव रूप, श्रृंगार झंकार लिये,
सुबह होते ही मैंने अतीत भूलकर कर लिया
नव ऊर्जा का आलिंगन आचमन चुम्बन
नव रूप में बदलकर सन
महकाने लगे तुम मेरा तन मन
मैंने किया सब तुम्हें अर्पण
सज गया जनवरी में रूप दर्पण
अवसाद, द्वन्द्व ,किये मैंने तर्पण
शहनाई बजाने लगा सृष्टि का हर कण
अनोखा देखा नव वर्ष आगमन।


डॉ. यासमीन ख़ान 31-12-2018

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