तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे!

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तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे!( राजकुमार ‘राज’)

मेरे शहर अमृतसर से महज कोई 16-17 किलोमीटर दूर एक गांव है कोटला सुल्तान सिंह…यहीं पे भारत की गुलाम फ़िज़ाओं में एक फकीर हर रोज सुबह गाता हुआ निकलता था..और उसके पीछे एक छोटा सा बच्चा (जिसका नाम फीको था )चला करता था और उसे गांव की दहलीज के बाहर तक छोड़कर वापस आ जाया करता था..फीको एक मुस्लिम परिवार का बच्चा था और उसका यह नाम मेरे लिए एक रहस्य बना रहा है…फीको का हर सुबह उस गाते हुए फकीर के पीछे चलना और उसे आखरी छोर तक छोड़ कर आना एक गहन रहस्य छिपाए हुए है…यह घटना किसी सूफी कहानी का यथार्थ रूप है कि फकीर इतने बड़े शहंशाह होते हैं जो बिना शर्त सबकुछ लुटा देते है और पीछे चलने वाला मुरीद उनसे बिन मांगे सब पा जाता है…यही तो हुआ था…फीको नाम के इस फीके बच्चे के गले में उस फकीर ने इतना शहद भर दिया था कि इससे सुरीला आज तक कोई गा ही नही पाया…शायद यही कारण था कि यही फीको जब बेशुमार दौलत, इज़्ज़त और नाम कमा चुका था तो इसका सर नमाज़ के सजदे में ज़मीन पे गहरा गड़ता गया..गम्भीर प्रवृति का यही फीको सफेद पोशाक में अक्सर सबको नज़र आता था और भीड़भाड़ से कोसों दूर रहता था…इसकी आवाज़ में वो जादू था कि दुनिया इसे तलाशती थी…यही फीको 1980 में श्रीलंका के आज़ादी दिवस पे जब कोलम्बो में गा रहा था तो 12 लाख लोगों की भीड़ इसे सुनने के लिए उमड़ी थी…किसी फकीर को सजदा करते करते फीको ने इतना संगीत समेट लिया था कि अपने बड़े भाई की नाई की दुकान पे जब यह बच्चा फीको गाता था तो लोग इकट्ठे हो जाया करते थे..बात 1939 की है जब भारत का सबसे नामी गायक कुंदन लाल सहगल लौहोर गाने आया और बिजली चली गयी..सहगल नाराज़ हुए और उस समय इनके भाई की प्रार्थना पर इस 15 साल के फीको को मंच पे चढ़ाया गया और कहते है जब इसने गाना शुरू किया तो लोग सहगल को भूल गए थे…यही पर संगीतकार श्याम सुंदर ने इस बच्चे को मुम्बई बुलाया और 1944 में इसने सबसे पहले फ़िल्म “गुल बलोच” के लिए प्लेबैक गीत गाया..हिंदी फिल्म गांव की छोरी के लिए इसने पहला हिंदी युगल गीत गाया और जिस गाने ने फीको को ख्याति दी वह फ़िल्म अनमोल घड़ी का गीत था जो कि 1949 में बनी थी और नौशाद संगीतकार थे । 1955 से लेकर 1965 तक फीको ने 6 फ़िल्मफ़ेयर हांसिल किए और 1970 तक यह गायक 25000 गीत रिकॉर्ड करवा चुका था…आजतक हिंदी सिने जगत के सबसे चुनिंदा गायकों में यही वो सुर सरताज है जिसकी आवाज़ में सोज,शोखी,दर्द और अल्हड़ता का कमाल का मिश्रण है…यह वो गायक है जो लाइट और क्लासिकल दोनों तरह के गीतों को उस शिखर तक गाने में सक्षम रहा है जो कि किसी और के बस की बात नही…इसकी ज़िन्दगी में एक दौर ऐसा भी आया जब यह सितारा कहीं गुम हो गया था और चारों ओर किशोर कुमार की आवाज़ गूंज उठी थी..लेकिन संगीत की समझ रखने वाले उस बात से अच्छी तरह परिचित हैं कि फीको के सामने सभी फीके रहे हैं…घरेलू जीवन को अपना अधिकतर समय देने वाले फीको की जीवन संगिनी का नाम बेगम विकलिस था और इसकी 7 संताने थी..4 बेटे और 3 बेटियां…
दोस्तो ! आज ही के दिन 24 दिसंबर 1924 को एक गरीब मुसलमान हाजी मोहम्मद के घर जो बच्चा पैदा हुआ उसे हम सब मुहम्मद रफी कहकर बुलाते है…यही बच्चा फीको था…31 जुलाई 1980 की शाम रफी साब J om.prakashफ़िल्म “आसपास ” के लिए एक गीत रिकॉर्ड करवा रहे थे..रात ढलने को आई थी और संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल भी थक गए थे..उन्होंने कहा चलो रफी साब अब बाकी बचा गीत कल रिकॉर्ड कर लेंगे..आप भी थक गए होंगे..आप भी घर जाकर आराम कीजिए… रफी साब आकर कार में बैठे और ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट की..इन्होंने गाड़ी रुकवाई और दोबारा स्टूडियो में गए..संगीतकार प्यारेलाल से बोले कि बाकी गीत भी अभी रिकॉर्ड कर लेते है..कल का क्या भरोसा….और दोस्तो उसी रात लगभग 9-10 बजे के बीच फीको इस संसार को अपने गले की इतनी मिठास दे गया कि आज भी दुनिया उसकी आवाज़ की उतनी ही दीवानी है…शायद फीको ने किसी नगमे में सच ही कहा था कि…

तुम मुझे यूं भुला न पाओगे..
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे…

भारत सरकार ने रफी को पद्मश्री से नमाज़ा…दोस्तो ! एक इंसान 37 बरस पहले दुनिया छोड़ कर जा चुका है ,लेकिन उसकी आवाज़ का शहद हवा में ऐसा घुला है कि यह कानो में रस घोलता रहेगा…एक बात जरूर सांझा करूँगा वो यह कि पंडित रविशंकर(सितारवादक) सुब्बुलक्ष्मी(क्लासिकल गायिका) इनको बेहद कम लोग जानते है..लेकिन इन्हें भारत का सर्वउच्च सम्मान “भारत रत्न” मिला…लेकिन रफी ने अंत तक जो रिकॉर्ड 26 हज़ार से ज्यादा गीत गाए है और जो आज भी सुनने वालों को मीठा सुकून देते है ।

राजकुमार ‘राज’ अमृतसर

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