ख़ामोश नदी!!

1
59

ख़ामोश नदी

एक ख़ामोश नदी बहती आठो पहर
कल- कल निनाद कर जीवन पर्यन्त
तमाम दरदरे खुरदुरे ज़र्रों के बीच
गिलहरी सा कोमल तन, मन लिये
इठलाती,मुस्काती बलखाती रिझाती
ऊँचे पहाड़ों दर्रो,जंगली पौधों जानवरों के बीच
समेटे जहाँ भर के जज़्बे,ख्वाहिशें,आशाएँ
कशमकश,खुशियाँ ,तल्खियाँ,
गहरी अतृप्त शान्ति
अनगिनत ज्वालामुखी सी हलचल
नैनों में सँजोये जूही से कुछ स्वप्न के फूल
चहकती चिड़िया सी चूड़ियों सी खनखन
सन्तूर सी हँसी की स्वच्छन्द तरंग
हालातों की झाड़ी पर अटकता भटकता वजूद
ख़ालीपन के काँटो यादों से सजा
धज्जी-धज्जी चिथड़े सा बिखरता
फिर जुड़ता, ऊर्जा बटोरता सोखता
अपने ही अधझड़े घुटे मटमैले आँसू..
एक अहद के साथ जीना है
उड़ना है फिर से बाज़ बनकर
खिलना है महकना है, चहकना है
जीवन कैनवास पर नये रंग भरना है।


डॉ. यासमीन ख़ान ,मेरठ

Loading...
SHARE
Previous articleअनसुनी कहानी भिखारी ठाकुर!!
Next articleदेख !दिसम्बर जाता है !
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here