मुहब्बत का सबक !!

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गज़ल 

मुहब्बत का सबक हमको कभी पढ़ना नहीं आया ।
सियासत भी हमें तुमसे कभी करना नहीं आया

नदी सी तुम मिलो मुझसे समुंदर मैं भी हो जाऊं
बिना तुमसे मिले मुझको कभी बहना नहीं आया

सुना है भावनाओं से जमाना खेलता अक्सर ।
भले बदनाम हो जाऊं मगर छिपना नहीं आया

अँधेरों में सफर हमने करे तय आज भी कितने ।
दुआएँ साथ माँ की हैं कभी डरना नहीं आया ।।

जलाने दीप हमने भी हवाओं में करी कोशिश ।
मगर दीपक को यादों के कभी जलना नहीं आया ।।

मुखौटे ओढ़कर मुझको मिले हैं लोग अब अर्णव
मुझे धोखे की आदत है मगर छलना नहीं आया

 

डॉ अरुण कुमार श्रीवास्तव अर्णव

 

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