साक्षात्कार!!

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साक्षात्कार

बौराना भूलते बिरवे
बांझ होती नदियाँ
अपनी ही बास से
अपरिचित फक्क फूल।
शरद पूर्णिमा की रात
गर्म हवाएँ बेंधती शूल।
आज का कसैला सत्य
केबल से अटकी-भटकी
पतंग-सी संस्कृति।
महाकाव्य की जिल्द में
मसखरों की निष्कृति।
जीवन मूल्यों पर लगे
चमकीले प्राइस टैग
अमोघ अन्नदाता का
आत्महंता में पर्यवसन
सरस्वती का परिहास कर
कमाई करने का जतन।
शिलान्यासों से पूर्व करते
दीमकों का आह्वान।
हादसों से पहले न
जागने की सिरफिरी बान।
लोकतंत्र की तंत्री पर
वही तानाशाही तान।
बस्ती, बाग, बाजार
बेकल और बेजार।
आज का कैसा
भयावह साक्षात्कार।।

ओमीश पारुथी

शिक्षाविद, लेखक, व संपादक।दो काव्य संग्रह,एक कहानी-संग्रह,चार समीक्षात्मक पुस्तकें प्रकाशित।”मंगल विमर्श”मेरे द्वारा संपादित पत्रिका संस्कृति मंत्रालय,केंद्र सरकार द्वारा पुरस्कृत।

 

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