पौने एक बजे!!

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पौने एक बजे
….

जैसे मोती लिए जलधि में छिपे सीप हैं,
जैसे बीच समुंदर में एकांत द्वीप है।
वैसे ही मेरे उर में अब तुम हो सजे,
ये एहसास हुआ है मुझे,रात को पौने एक बजे।
……

कौन हो तुम बतलाओ,कपटी हो या छलिया,
दिखा गये एक झलक,व्यग्र हुई ये रतिया।
स्वप्न में आकर कहां गये तुम शून्य तिमिर में
रतजगा करवाने आ गये ओ निर्मोहिया।

नींद,चैन,आराम,सुकून,सब तेरी खातिर हैं तजे।
ये एहसास हुआ है मुझे,रात को पौने एक बजे।
…….

जैसे व्योम और अवनि के बीच में जग है,
जैसे जागृत और सुप्त के बीच में मन है।
जैसे निद्रा और जागरण बीच हैं हम सब,
जैसे जीवन-मृत्यु मध्य ये कालचक्र है।

वैसे तुम धूरी,मैं चकरी,चलने में आते हैं मजे।
ये एहसास हुआ है मुझे,रात को पौने एक बजे।


……

जूही, विशाखापत्तनम,

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