हमने हर आफ़त को हँसकर सर से टाला है।

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ग़ज़ल

हमने हर आफ़त को हँसकर सर से टाला है।
रोज़ नयी उम्मीद- किरन को दिल में पाला है।।

गये ज़माने उजले थे जो सच के हामी थे।
आज समय का चेहरा सचमुच काला काला है।।

नामुमकिन है उसकी फ़ितरत में ग़द्दारी हो।
जिसके मुँह में मेहनत का ही रोज़ निवाला है।।

तन्हा होकर भी खुश रहना सीखा है जब से।
उस दिन से मेरी दुनिया में रोज़ उजाला है।।

नफ़रत की भट्टी में जलता है जो हर लम्हा।
उसके दिल का हर इक गोशा काला काला है।।

और बनाने की कोशिश में दुनिया ख़ूब रही।
हमने ख़ुद को अपने ही साँचे में ढाला है।।

आज उन्हें देखा तो सबने पूछा सिर्फ़ यही।
किसने चन्दा की आँखों में काजल डाला है।।

जान बदन से ग़ायब क्यों हो जाती है तुम बिन ।
कैसा रोग बताएँ जो ये हमने पाला है।।

भारत के बिन ऐसा मंज़र कहीं न पाओगे।
मंदिर भी है मस्जिद भी हमराह शिवाला है।।

नाम तुम्हारा “यास्मीन’ जपती है हर लम्हा।
देखो आकर तुम उसकी साँसों में माला है।।


डॉ.यासमीन ख़ान

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