कहीं सब लोग करते तो नहीं हैं बात ये मेरी।

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ग़ज़ल

कहीं सब लोग करते तो नहीं हैं बात ये मेरी।
जो कहते हैं कि अब उड़ने लगी है खूब इक तितली।।

वहाँ पे शुक्र का सजदा खुशी के साथ कर लेना।
जहाँ इंसानियत से पुर नज़र आये कोई बस्ती।।

न जाने क्यों बहुत बेचैन हो जाता है मेरा दिल।
सदा जब जब भी आती है किसी बेचैन कोयल की।।

कई भँवरे करें गुंजन लिये रसपान की चाहत।
दुआ करती हूं मैं रब से सदा अपनी हिफाज़त की।।

कली बनने से पहले ही मसल देती है ये दुनिया।
हमारे सामने आते हैं ऐसे रोज़ क़िस्से भी।।

ज़माने को बताओ रास क्यों आईं न ये बातें।
अगर मैंने मुहब्बत की, अगर मैंने मुहब्बत की।।

उसे अब भूल जाओ ये समझकर वो पराया था।
तू लेकर यास्मीं बैठी है अब तक बात ये कैसी।।


डॉ.यासमीन ख़ान 30-11-2018

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