धड़कन by Dr.Purnima Rai

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धड़कन (कविता) by Dr.Purnima Rai

चुप्पी सी छा गई है
मन के आंगन में
धड़कता है दिल बस
तेरे ही लिये!
एक बार
तू भी आकर कह दे
झूठा-सच्चा सा ही
धड़कता है दिल
क्या !तुम्हारा भी
मेरे लिये!!
दिल के न धड़कने का
सवाल उठता ही नही अब
रोज सुन रहा हूँ
बेबसी के आलम में
घुटती हुई सांसों का क्रन्दन
उमड़ आता है आंखों में समन्दर
माँ के कदमों में
है अगर जन्नत
तो प्रेयसी तुम ही हो मेरा
परम वंदन !!

डॉ पूर्णिमा राय पंजाब

drpurnima01.dpr@gmail.com
26/11/18

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