चप्पल (लघुकथा )by Dr.Purnima Rai

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चप्पल (लघुकथा )Dr.Purnima Rai

आज सब छात्र छात्राएँ बेहद खुश थे।खुश इसलिये कि आज वह एक लंबे अरसे बाद शैक्षिक भ्रमण हेतु सांइस सिटी देखने कपूरथला जा रहे थे। आज सब विद्यालय समय से पूर्व ही विद्यालय पहुँच गये थे।एक जैसी यूनिफार्म पहने सब खिले हुये फूलों की मानिंद प्रातःकाल को महका रहे थे।बस की प्रतीक्षा में पंक्तियों में खड़े छात्र-छात्राओं की हाजरी एक शिक्षिका लगा रही थी। “नवम् कक्षा रोल नंबर ग्यारह कहाँ है?”जल्दी बताओ।शिक्षिका ने तनिक ऊंचे स्वर में कहा । मैडम वह नही जा रही है ।ओके ,बोलकर शिक्षिका सब छात्र छात्राओं को बस की ओर जाने का इशारा करने लगी।अरे कमल! तुम यहाँ हो?तुम को नहीं जाना था तो विद्यालय क्यों आई? सारी कक्षा जा रही है ।उफ यह लड़की!! सीमा मैडम बोली ।मैडम मुझे भी जाना है ।मैं मम्मी को बोलकर आई हूँ ।तो ….फिर जाओ भागो जल्दी !मैं क्षमा मैडम को नाम लिखवा देती हूँ ।कमल मुंह लटकाये बोली,मैडम मैंने नाशता भी नही किया है और मेरे पास साथ ले जाने के लिये भी कुछ नही है ।अरी रजनी !जा जल्दी कैंटीन से मेरे खाते से पांच बिस्कुट के पैकट लेकर दे दो इसको,खुद भी खाना, औरो को भी खिलाना। कमल का चेहरा खिल गया ।चल भाग जल्दी!! ओह !इसने तो चप्पल पहनी हुई है।सीमा मैडम कमल को डांटने लगी।
अरे कोई इसकी चप्पल पहन लो और इसे अपने बूट दे दो ।विद्यालय की इज्जत का सवाल है।क्षमा मैडम ने सीमा मैडम को कहा ,कोई बात नहीं, तस्वीरें खींचते वक्त हम इसको पीछे वाली कतार में खड़ा कर लेंगे। सीमा मैडम बस की ओर जाते हुये कमल को देखकर सोच रही थी कि यही जिंदगी है।

डॉ.पूर्णिमा राय

drpurnima01.dpr@gmail.com

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