‘उनका चाँदी का चम्मच’ (डॉ मंजुला चौहान)

2
113

‘उनका चाँदी का चम्मच’ (डॉ मंजुला चौहान)

‘घर में इतनी बड़ी पूजा है। पर अब तक कोई तैय्यारी नहीं हुई। कुछ कहो तो सबको बुरा लगता है। मैंने ही ठेका ले रखा है क्या? मैं भी कुछ नहीं कहती देखूँगी कब तैयारी करेंगे?’ माँ जी बड़ी गुस्से में थीं। सुनंदा अपने काम में व्यस्त थीं। वह कंपनी में काम करती थीं। घर में फुरसरत से बैठने के लिए उनके पास समय नहीं रहता था। सोमेश का भी यही हाल था। विक्रम 10 साल का था स्कूल छूटा तो ट्यूशन, फिर थोड़ा खेल-कूद और रात को जल्दी सो जाया करता था। सुनंदा के पिता का देहान्त हुआ तो सुनंदा माँ को अपने साथ ले आईं। वे बड़े परम्परावादी होने के कारण बेटी और दामाद को हमेशा कोसा करती थी।
सुनंदा अपनी माँ की इस नाराजगी से वाकिफ थी। पर कुछ नहीं कर पाती थी। रोज इनको कौन समझाता फिरे, यही सोचकर वह अपने काम में लगी रहती थी। दो दिन बाद घर में सत्यनारायण की कथा को रखा था। पर तैयारी बिल्कुल नहीं हुई थी। इसी वजह से सुनंदा की माँ अपना मुँह फुलाए बैठी थी। सुनंदा को यह बर्दाश्त न हुआ, उसने माँ से बात की।
‘माँ, क्या हुआ? आप नाराज सी लग रही हैं ?’
माँ ने कुछ नहीं कहा, वह दूसरी तरफ मुँह मोड़कर बैठ गई।
‘माँ मैं आप से कुछ पूछ रही हूँ।’
उन्होंने कुछ न बोला। तभी मंदा आई और कहने लगी,
‘मुझे दो दिन की छुट्टी चाहिए दीदी।’
‘छुट्टी क्यों ?’
माँ का मुँह भी खुला, ‘चलो हो गयी पूजा। अब इसे भी छुट्टी दे दो और खुद भी आफिस में ही बैठी रहो। पूजा का क्या वो तो कभी भी कर सकते हैं, हँ।’ कहकर सुनंदा की माँ वहाँ से चली गई।
सुनंदा अपने गुस्से को काबू में रखते हुए ‘मंदा तुझे पता है दो दिन बाद घर में पूजा है। मैंने तुमसे कहा भी था और आज अचानक छुट्टी। क्या हुआ?’
‘दीदी अब बात ही ऐसी है तो मैं क्या करूँ।’
‘कैसी बात।’
‘मेरे ससुर को अस्पताल में भर्ती किया है। उनकी तबियत बड़ी बिगड़ी हुई है। न गयी तो बड़े ताने सुनने होंगे।’
‘अब का है ना दीदी।’ आगे बात को काटती सी सुनंदा ‘देखो जब तक पूजा नहीं हो जाती तुम्हें छुट्टी नहीं मिलेगी, समझी। जाओ अब काम करो।’ मंदा चुप-चाप चली गई। सुनंदा को पता था कि वह झूठ बोल रही है।
माँ थोड़ी देर बाद कमरे से निकली उनकी बातें सुन चुकी थीं। मंदा को डाँट पड़ी तो वे बड़ी खुश भी हुई। सुनंदा से कड़कती हुई आवाज में बोली ‘पूजा के लिए चाँदी के सामानों का धोना जरूरी है। अलमारी से निकाल के बाहर रख दे, मैं बाद में धो दूँगी।’
‘माँ, आप कुछ मत करो, मंदा से धुलवा दूँगी।’
‘कामवाली है वो तेरी ननद नहीं। इनका भरोसा अच्छा नहीं है।’
‘माँ धीरे बोलो, वह सुन लेगी और वो इतनी बुरी भी नहीं हैं।’
‘ठीक है, जैसे तेरी मर्जी हो।’ सुनंदा आफिस जाने से पहले सारे चाँदी के बर्तन निकाल कर माँ के हाथ में सौंपकर बाहर चल पड़ती है और यह कहना नहीं भूलती है कि ‘देखो माँ यहाँ कामवालियों का मिलना बड़ा मुश्किल है। मंदा से प्यार से काम करवा लिया करो और उसे बीच-बीच में थोड़ा खाने के लिए भी दिया करो।’
माँ फिर से चिड़ गई और बोली ‘तुझे मेरे से ज्यादा उसकी फिकर लगी रहती है? मैं खाऊँ या न खाऊँ, तुझे इसकी फिकर है ? हमेशा मंदा मंदा वो कामवाली है।’
सुनंदा समझ गई इनसे कुछ भी कहना बेकार है। बिना कोई जवाब दिये वहाँ से चली जाती है। पर गाड़ी में बैठे-बैठे माँ की फिकर होने लगी। मुझे माँ से ऐसे बात नहीं करना चाहिए था। पर क्या करूँ ! सोमेश अभी दो दिन बाद आएंगे और बंटी शाम तक आ जायेगा शायद। उसके ट्रिप का आज आखरी दिन है। मुझे भी शाम पर जल्दी जाना चाहिए। कल छुट्टी ले लूँगी। परसों तो वैसे भी छुट्टी है। सुनंदा सोचते सोचते आॅफिस भी पहुँच गई।
घर में सुनंदा की माँ अभी भी मुँह फुलाए बैठी थी। नाश्ता प्लेट में पड़ा-पड़ा ठंडा हो गया था। मंदा बाहर का काम निपटा कर अन्दर आई तो देखा प्लेट में नाश्ता पड़ा है।
‘क्या माँ जी आपने नाश्ता नहीं किया?’
‘अरे वो नाश्ता तो तेरा है, मेरे लिए इस घर में कौन नाश्ता बनाकर देगा।’
‘दीदी तो बड़ी अच्छी है।’
‘हँ’ व्यंग्य से ‘हाँ तुम्हारी दीदी तो दुनिया की सबसे बड़ी अच्छी दीदी है।’
मंदा मुँह बनाते हुए ‘क्या माँ जी आपकी वो बेटी है। माँ के लिए बच्चे बूरे कैसे हो सकते हैं। मुझे तो आप दीदी की माँ कम सास ज्यादा लगती हैं।’ मुँह बनाकर हँसती है।
‘ज्यादा दाँत मत दिखा, अपना काम कर।’
मंदा चुपचाप अन्दर चली जाती है। मंदा की बातें थी तो सच्ची एकदम सच्ची है, इस पर सुनंदा की माँ सोचती रह गई। ‘क्या मैं इतनी सख्त हूँ, अपनी बेटी के लिए। आइंदा थोड़ा ध्यान रखना होगा। पर मैं भी क्या करूँ जब देखो तब काम-काम करती रहती है। घर में जो हो रहा है उसका भी तो थोड़ा ध्यान रखना चाहिए। बहुत कहा, एक ही बच्चे पर आॅपरेशन मत करवा। एक और बच्चा हो जाएगा तो घर में चहल-पहल रहेगी। लड़का भी अकेला पड़ गया है। भाई या बहन होती तो वो भी खुश रहता। आजकल के बच्चे किसी की सुनते हैं? मुझे क्या। कुछ भी करें। पर मंदा की बातों में कितनी सच्चाई है। परसों पूजा है तो तैयारी भी करनी है। चाँदी के बर्तन धुलवा दूँ।’
‘मंदा आवाज लगाती है।
‘जी माँ जी आई’ पर दस मिनट बाद ही बाहर निकली।
‘बाहर निकलने के लिए इतनी देर लगती है?’
‘ओ, हो, माँ जी काम कर रही थी। आधा काम छोड़ आती तो आपसे ही डांट खाती। अब बताइए क्यों बुलाया?’
‘हाँ, ये चाँदी के बर्तन हैं धो देगी, तो मैं पोंछ कर अन्दर रख दूँ।’
‘हाँ, सुबह दीदी ने बताया था। लाइए धो देती हूँ।’
‘ध्यान से हाँ, कोई सामान इधर से उधर न हो।’
मंदा पर वे भरोसा तो बिल्कुल नहीं करती थी। इसीलिए सामने ही बैठी रही। सभी चाँदी के सामान धुल गये। सुनंदा की माँ उन्हें लेकर अंदर आई और अच्छे से कपड़े से पोंछने लगी। पोंछ कर सुखा दिया। थोड़ी देर में मंदा माँ जी का काम खत्म कर घर चली गई। उसका घर पीछे की गली में ही था। विक्रम स्कूल से लौट आया। नानी के साथ खेलता रहा। दोनों ने मिलकर टीवी भी देखी। शाम को सुनंदा आई सारे चाँदी के बर्तन एक दम धुले हुए, चका चक चमक रहे थे।
सुनंदा ने माँ से कहा ‘माँ कितने चमक रहे हैं।’
‘हाँ, चमकेंगे ही मैंने जो धोया है।’
‘आपने क्यों धोये?’
‘तुम्हारी मंदा के सहारे बैठ गये तो हो गया कल्याण।’
‘चलो ठीक पर आइंदा इतना काम मत किया करो।’
‘हाँ तुम कपड़े बदल कर मुँह-हाथ धो लो मैं खाना गरम करती हूँ।’
‘माँ आप बैठो, मैं गरम कर देती हूँ।’
‘ठीक है, मैं विक्रम को बुलाती हूँ।’
‘क्या कर रहा है वो?’
‘कमरे में गेम खेल रहा है।’
सुनंदा अन्दर चली गई।
आज पूजा थी। माँ सुबह 4 बजे ही उठ गई थी। सुबह सब को चार बजे ही उठा दिया था। सोमेश को रात को ही बोल दिया था। सुबह उठते ही मंदा को बुला लाये। सोमेश सुनंदा से कहता है।
‘पूजा हमारे घर में है मंदा बेचारी को चार बजे उठना पड़ रहा है।’
‘सुनंदा हँसती है। शुकर मनाओ माँ ने चार बजे कहा है। सारी रात यही नहीं रोक लिया।’
‘हाँ, सही कह रही हो तुम बेचारी मंदा। मैं बुला लाता हूँ। जल्दी से नहा लो।’
‘हाँ, तुम जाओ।’ सुनंदा नहाकर तैयार भी हो गई। मंदा आई और अपने काम पर लग गई। पंडित भी आये। पूजा की तैयारी भी हो गई। अब पूजा में कौन बैठेगा? पंडित जी के पूछने पर सुनंदा ने कहा विक्रम बैठेगा, ठीक है कहकर पंडित ने पूजा आरंभ कर दी। सारे चाँदी के सामान में चीजें सजा कर रख दी गई थी। पंडित जी बड़े खुश थे। आखिर में यह सब भक्ष-भोजन, फल-फूल, मिठाइयाँ उन्हें ही तो मिलनी थीं। थोड़ी देर बाद पंडित जी इधर-उधर कुछ ढूँढ़ने लगे। माँ जी ने पूछा तो उन्होंने चम्मच माँगी। ‘यही पर होगा देखिए।’
‘अम्माजी यहाँ तो नहीं दिख रहा। दूसरा चम्मच दे दो।’
‘चाँदी का चम्मच है ऐसे कैसे नहीं मिल रहा।’
‘इधर ही कहीं पड़ा होगा बाद में मिल जाएगा दूसरा चम्मच दे ही दो।’ पंडित जी ने हँसते हुए कहा।
‘मंदा जरा एक छोटा सा चम्मच देना।’ माँजी पुकार कर कहती है। मंदा चम्मच लाकर पंडित जी के हाथ में थमाती है। पंडित जी चम्मच लेकर पूजा आरंभ करते हैं। पर माँ जी की नजर सामानों पर ही थीं। चम्मच कहाँ होगा। पूजा समाप्त हो गई, पंडित जी उठे सबको प्रसाद दिया, सुनंदा और सोमेश ने पंडित जी के पैर छुये, आशीर्वाद लिया। उनको जो दान-दक्षिणा देनी थी वह भी दे दिया। वे खुश होकर चले गये। जैसे ही वे गये माँ जी पूजा के सामानों में चम्मच को ढूँढ़ने लगी। जब चम्मच कहीं नहीं मिला तो उन्होंने बड़बड़ाना शुरू कर दिया। सुनंदा कहती है मिल जाएगा यहीं कहीं पड़ा होगा, पर वे नहीं मानीं। विक्रम भी बीच में खेलता बोल पड़ा ‘अरे नानी सिर्फ एक चम्मच ही तो है। आप भी न हमारे अंग्रेजी के टीचर जैसी हो। उनका चश्मा टेबल पर ही होता है। फिर भी सारा स्कूल ढूंड आती हैं।’
‘बेटा वे सादा चम्मच ना है। चाँदी का है।’
विक्रम चिड़ के कहता है। ‘अच्छा-अच्छा ठीक ढूँढ़ती रहो। माँ बाहर खेलने जाऊँ।’
‘हाँ जाओ खेलो।’ सुनंदा उसे भेज देती है।
माँ जी को सिर्फ और सिर्फ मंदा पर ही शक था। सुनंदा को कमने में ले जाकर कहती है। सुनंदा इससे चिड़ जाती है। माँ भगवान के लिए चुप हो जाओ। कल दूसरा चाँदी का चम्मच ला दूँगी और भूल कर भी मंदा से मत पूछना।’ तभी मंदा सुन लेती है। सुनंदा के पैर पकड़ कर कसम खाती है कि उसने कोई चम्मच नहीं चुराया। सुनंदा को यकीन था। मंदा को समझाकर घर जाने को कहा। उसके जाने के बाद माँ-बेटी में झगड़ा भी हुआ।
चार दिन बाद माँ जी ने अपने कपड़ों को बक्से में से निकाल कर सुखाने के लिए मंदा को आवाज देती है। मंदा उनके कपड़ों को एक-एक कर उठाती है। तभी क्षण से कुछ गिरने की आवाज आई। देखा तो वही चाँदी का चम्मच था। जिस कपड़े से माँ जी ने उन्हें पोछा था। उसी कपड़े के साथ बक्से में चला गया था। चम्मच देख माँ जी की आँखें तम तमा गईं। मंदा ने धीरे से चम्मच उठाकर माँ जी के हाथ में देती हुई बोली, ‘लो अम्मा जी आप का चम्मच।’ और चली गई।

डॉ मंजुला चौहान
हिन्दी विभागाध्यक्ष
अक्कमहादेवी महाविद्यालय भागलकोट
0884003700

Loading...
SHARE
Previous articleरेल हादसे की चपेट से अमृतसर डूबा शोक में !!by Dr.Purnima Rai
Next articleहिन्दी भाषा लाएगी कश्मीर के पर्यटन उद्योग के अच्छे दिन ( डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’)
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here