मैं सिर्फ मैं हूँ !!

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मैं सिर्फ मैं हूँ !!

जब कोई नहीं होता पास मेरे बातें करने के लिए,
तब मैं तन्हाई में खुद से ख़ूब बातें करती हूँ ।
मैं रोज जीती हूं _रोज मरती हूँ ।
अपनेआप से मैं रोज ही लड़ती हूँ ।
“मैं सिर्फ मैं हूँ ।

कोई और नहीं ।
मैं रोज ही अपने वजूद की तलाश करती हूँ ।
खुशियों के साथ दर्द भी मिले है जीवन में,
इसलिए मैं सपनों में नहीं हकीकत में जीती हूँ ।
श्रृंगार नहीं रखता मायने मेरे लिए ,
पर मैं तन की नहीं मन की सुंदरता रोज गढ़ती हूँ ।
मैं रोज गिरती हूँ । _रोज उठती हूँ ।
अनुभव की सीढ़ी मैं रोज चढ़ती हूँ ।
प्यार, इश्क और मुहब्बत में करती नहीं मैं यकीं,
पर रिश्तों के हर सांचे में ढ़लती हूँ ।
जज्बातों की जब होती नहीं है कदर
तब मैं पन्नों को भरती हूँ ।
नहीं रोती मैं कभी अकेली,
संग कलम की स्याही से कागज को भी रूलाती हूँ ।
तभी _”मैं हाँ मैं ” रूबी ,
हवाओं में कम कविताओं में
खुद को हर पल _हर क्षण जीती हूँ ।
कहने वाले सच ही कहते है कि
मैं कविताएं कम मन की भड़ास ज्यादा लिखती हूँ ।

रूबी प्रसाद
सिलीगुड़ी

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