टूटते पत्ते (डॉ मंजुला चौहान)

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‘टूटते पत्ते’ (डॉ मंजुला चौहान)

हाथ में लकड़ी थामे, उठकर बाहर जाने की कोशिश करती है। दो कदम भी आगे नहीं बढ़ पाती। कमला अपने आप से और अपनी किस्मत से नाराज होकर वही कुर्सी पर बैठ जाती है। ‘भगवान अगर मेरा एक हाथ एक पैर तोड़ देता तो अच्छा था। आँखे ले कर मेरा जीना हराम कर दिया है। रमेश के आने तक यहीं बैठे रहना होगा। पता नहीं क्या समय हुआ है? कब वह लौटेगा? तब तक यहीं बैठे रहना मेरी मजबूरी है। इससे अच्छा है उठा ले भगवान।’ कमला अपने आप से बातें करती हुई इधर-उधर गर्दन हिलाती है।
कमला 48 साल की स्त्री है। जिसका एक बेटा रमेश है। एक हादसे में कमला की आँखों की रोशनी चली गई। अब बेटे पर पूर्ण रूप से निर्भर है। सारा दिन घर में ही रहती है। रमेश एक दफ्तर में चपरासी है। सुबह उठकर सारा काम कर माँ को भी तैय्यार करके खाना खिला के उसे एक जगह पर बिठा कर खाने पीने के लिए पास में ही कुछ रखकर बाहर से दरवाजा बंद कर काम पर चला जाता है। फिर श्याम को लौटकर दोनों चाय पीते हैं और बाहर टहलने के लिए ले जाता है। दोनों का समय इसी तरह सामान्य रूप से गुजर रहा था। रमेश माँ से बेहद प्रेम करता था। उसके परिवार में माँ के सिवा कोई था भी नहीं। कमला भी बेटे पर जान छिड़कती थी। एक दिन सुबह का समय था। रमेश जल्दी-जल्दी में रसोई हाल से कुछ गिर गया? माँ ने बाहर से पूछा –
‘बेटा क्या गिरा दिया ?’
‘कुछ नहीं माँ, गिलास हाथ से छूट गया।’
‘इसीलिए कहती हूँ शादी कर ले बहू सारा काम कर लेगी’
हँसता हुआ ‘बहू आएगी तो तुझे भी काम पर लगा देगी, सोच लो।’
‘हाँ, कोई बात नहीं बेटा मैं भी थोड़ा थोड़ा कामकर लूँगी’
‘जाने दो ना माँ, अब आराम से हैं। क्यों मुसीबत मोल ले रही हो।’
हर बार रमेश कुछ न कुछ कह कर शादी की बात टाल देता। कमला हर बार चुप हो जाती। रोज बंद कमरे में सुबह से शाम तक बैठ कर कमला तंग आ जाती थी। पर बेटे पर कभी जाहिर नहीं करती। फिर दो दिन बाद माँ ने रमेश से शादी की बात छेड़ी, तब भी उसने यही कहा। तो माँ ने कहा ‘देख बेटा, शादी जब होगी तब होगी। घर में एक कामवाली को रख लेते हैं। तुम्हारी मदद हो जायेगी और घर में मेरे साथ बैठी रहेगी।’ रमेश सुनकर भी अनसुना कर देता है।
दफ्तर जाने के बाद रमेश सोचता है। माँ के लिए क्या किया जाए शादी करूँ या कामवाली को लाऊँ ? दूसरे दिन उसने माँ से कहा – ‘माँ तुम घर पर अकेली रहती हो ना, सारा दिन तंग आ जाती हो। इसलिए मैंने सोचा है….‘माँ तभी बीच में बोल पड़ी ‘क्या सोचा है, शादी कर रहे हो? बताओ’
माँ का उतावलापन देख रमेश हँस पड़ता है। ‘अरे नहीं माँ, सुनो तो सही मैं तुम्हें एक पार्क में बिठा कर जाऊँगा। सामने मन्दिर है। जिसकी घंटी तुम्हें सुनाई देती रहेगी। पार्क में चहल पहल रहेगी। बच्चों की किलकारियाँ तुम्हें सुनाई देती रहेगी। तुम वहीं बैठी रहो।’
‘पर शाम तक कैसे बेटा ?’
‘शाम तक नहीं माँ तुम दुपहर तक। खाने के समय मैं आ कर तुम्हें घर छोड़ दूँगा। तुम खाना खा कर सो जाना ठीक है।’
‘पर रोज…..!’
‘चलो आज से चलते हैं। तुम्हारे लिए खाने के लिए डिब्बे में कुछ रख लूँगा और पीने को पानी की एक बोतल भी ले लेता हूँ।’ कमला को थोड़ा अजीब तो लगा पर बेटे ने अपने लिए इतना सोचा यही बहुत है। सोच कर चुप हो गई।
रमेश पार्क में पहुँचा, एक बेंच टूटी जिस पर हर समय घाँव रहता है। बेंच मिल गई माँ को वहाँ बिठाया ‘यहाँ से हिलना मत, ठीक एक बजे लेने आ जाऊँगा’ रमेश का हाथ पकड़कर ‘बेटा मुझे बड़ा डर लग रहा है। इससे अच्छा घर ही रहती।’ डरो नहीं आराम से बैठी रहो। पीठ दुखने लगी तो थोड़ा लेट भी जाओ, मैं चलता हूँ।’
रमेश चला गया कमल का दिल जोर जोर से धड़कने लगा। तभी रमेश वापिस दौड़ कर आया। ‘माँ तुमसे एक बात कहना तो भूल ही गया।’
‘बोलो बेटा’
‘कोई तुमसे बात करें तो उनसे बात मत करना ठीक है।’
‘अच्छा, पर तू जल्दी आना बेटा।’
‘हाँ माँ मैं जल्दी आऊँगा।’
दुपहर के 12 बजे कमला को प्यास लग गई। बाजु में रखे थैले पर हाथ फेरा। अन्दर से बोतल निकाली, पानी पिया। वापिस रख दिया। डिब्बा निकाला जिसमें दो रोटियाँ थीं। उसमें से एक रोटी खा ली। नींद आने लगी तो सोचा सो जाये। पर वह सोई नहीं सोचा, लोक क्या सोचेंगे, वह चुप चाप बैठी रही और मन ही मन सोचती रही। ‘मेरा बेटा कितना अच्छा है। भगवान करे ऐसा बेटा सब को दें। मेरे कारण उसने आज तक शादी नहीं की। पता नहीं वह शादी करने का मन कब बनाएगा। मैं तो बोल-बोल कर थक गई हूँ। खाने का मन हुआ तो थैले में डब्बा निकाला और खाने लगी। छुट्टियाँ चल रही थीं। बच्चे वहीं खेल रहे थे। बाॅल आ कर कमला को लग गई। एक 10-12 साल का लड़का था। पास आ कर बोला ‘अंटी बाॅल देना’, बच्चे की आवाज सुनकर कमला ने हाथ बढ़ा कर बाॅल दे दी। लड़का चला गया। पानी पीते-पीते बोतल खाली हो गई। कमला इधर-उधर गर्दन घुमाने लगी। सोचने लगी। अब क्या करूँ, किसी से पूछना चाहती थी। समय क्या हुआ? पर आस-पास कोई हल चल सुनाई नहीं दी। सोचा बेटे का इंतजार कर लूँ ? आधे घंटे बाद रमेश आ गया। कमला के जान में जान आई।
समय बीता, कमला को रोज उसी जगह पर बिठा आता। करीब बीस दिन गुजर गए थे। एक दिन अचानक वहाँ पुलिस आ गई। कमला से पूछ-ताछ करने लगी। कमला डर गई। उसमे समझ में नहीं आ रही था कि सामनेवाले से क्या बात करें। रमेश ने किसी से भी बात करने से मना किया था। कुछ गड़बड़ है पर वह चुप रही। एक उनमें से आगे आया और उसने पूछा –
‘ऐ बुढ़िया कौन हो ? कहाँ से आती हो ?
कमला कुछ न बोली।
‘अंधी के साथ-साथ गूंगी भी हो ?’
कमला डर कर पीछे सरकने लगी।
‘रोज यहाँ कौन ला कर छोड़ जाता है ?
कमला ने मुँह से एक शब्द नहीं निकाला।
उसके पास पड़ा डिब्बे पर उस पुलिस की नजर पड़ी।’ ‘दिखा कितने पैसे मिले हैं ?
कमला के समझ में कुछ नहीं आ रहा था। अब वह आस-पास खड़े लोगों से पूछने लगा। ‘कितने दिन से आ रही है ये बुढ़िया।’ किसी ने महीना कहा तो किसी ने 10-15 दिन कहा।
‘भरपूर माल जमा हो गया है, क्यों ?
कमला के आँखों से आँसू बहने लगे।
‘रोने का नाटक बन्द कर भीख मांगने में शरम नहीं आई। अब पकड़े जाने पर क्या शरम।’
कमला का दिल बैठने लगा। रमेश कब आएगा, यही सोचने लगी।
तभी भीड़ को चीरता रमेश आया। वह कमला के पास जाकर ‘माँ क्या हुआ?’
‘बेटा तू आ गया ये लोग पता नहीं क्या-क्या कह रहे हैं।’
‘माँ डरो मत, कुछ नहीं होगा, मैं हूँ ना!’ रमेश माँ को संभालता है।
पुलिस रमेश को देख कर ‘तू इस औरत का बेटा है?’
‘जी’
‘रोज यहाँ तू इसे बिठा के जाता है?’
वह झेंपता हुआ ‘हाँ’
‘भीख माँगने के लिए?’
‘वो…वो…’
‘वो, वो क्या लगा रखा है बोल।’
सर मुझे माफ कीजिए आईंदा यहाँ नहीं लाऊँगा।’
पुलिस अब थोड़ा ठंडा होकर ‘क्या काम करते हो ?’
‘चपरासी हूँ।’
‘बीवी, बच्चे।’
‘शादी नहीं हूई है सर’
‘तुम्हारी पगार में एक अंधी, बूढ़ी माँ की देख भाल नहीं हो सकता।’
‘सर धीरे से माँ सुन लेगी। उन्हें इस बारे में कुछ पता नहीं।’
‘कैसे इंसान हो तुम छी घिन आती है। ले जाओ आईंदा अगर ऐसा किया तो जेल में बन्द कर दूँगा।’
रमेश माँ को ले कर घर चला जाता है। कमला को सब पता चल चुका था। वह घर पहुँच कर बेटे से कुछ नहीं पूछा। वह एक कोने में बैठ गई। रमेश भी अन्दर ही अन्दर घुट रहा था। उसमे समझ में भी नहीं आ रहा था कि माँ से क्या कहे। दोनों चुप रहे। कमला सारी रात सो नहीं पाई। इधर रमेश भी सारी रात जागता रहा। सुबह हुई रमेश उठकर नाश्ता बनाता है। माँ को उठा कर उनका मुँह धुला कर नाश्ता करवाता है। पर दोनों में कोई बात-चीत नहीं होती। वह तैय्यार हो चलने लगा तो माँ भी झट से उठी,
‘बेटा, मुझे भी साथ ले जा।’
‘कहाँ, माँ ?’
‘किसी मंदिर के पास बिठा आओ। वहाँ कोई पूछेगा नहीं।’
रमेश का गला भर आया। उसने दोनों हाथों से माँ के पाँव कस कर पकड़े और जोर जोर से रोने लगा।
‘माँ मुझे माफ कर दो, मेरा दिमाग फिर गया था। अब से आप घर से कहीं बाहर नहीं जाएंगी।’
कमला का मन भर आया। बेटे को सांत्वना देते हुए, ‘कोई बात नहीं बेटा, जाने दो बुढ़ापा होता ही ऐसा है, दूसरों पर बोझ बनने के सिवा उसका कोई काम नहीं। रहने दो’ रमेश की सिसकियाँ गहरी हो गईं। कमला बेटे की सिसकियाँ सुन नहीं पाई। उसे गले लगा लेती है।

 

डॉ मंजुला चौहान
हिन्दी विभागाध्यक्ष
अक्कमहादेवी महाविद्यालय भागलकोट
0884003700

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