बच्चों के विभिन्न रंग :हमारे संग

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बच्चों के रंग हमारे संग—विभिन्न कविताएं
आज के दिन पर विशेष भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति विभिन्न कवि कवयित्रियों की कविताओं के माध्यम से निम्नांकित है…….कुल 13 कवितायें सुंदर ,मनोरम भावों की सशक्त अभिव्यक्ति कर रही हैं…

1* धरती के सितारे -डॉ.पूर्णिमा राय,

कुण्डलिनी छंद—-

बच्चे भारत देश के, एक पिता संतान।
रंग लहू का एक है, फैलाएं संज्ञान।।
फैलाएं संज्ञान,सभी मानव हैं सच्चे;
कर लें हम पहचान,कौन भारत के बच्चे।।
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गज़ल /गीतिका ———

ये’ बच्चे तो बहुत भोले बहुत मासूम प्यारे हैं;
उजाला घर में’ करते हैं ये’ धरती के सितारे हैं।।
ये’जब भी बात करते हैं हँसाते हैं जमाने को ;
विधाता को बहुत प्यारे सभी के ये दुलारें हैं।।
चलें माँ बाप के पदचिह्न वो करते नाम हैं रोशन;
बने आदर्श वो सबके सभी उनसे ही हारे हैं।।
बड़ी गाड़ी बड़ी कोठी की सबको चाह रहती है;
मगर माँ बाप पर किसने ये सारे ख्वाब वारे हैं।।
मैं’तुझको पूजता हूँ माँ ते’री सेवा धरम मेरा;
ये’ बातें हैं दिखावे की दिलों में बस अँधेरे हैं।।
बिना माँ-बाप के बच्चे हमेशा दर-ब-दर भटके;
बने हम आसरा उनका वे’ हमपे जान वारें हैं।।
दुआ ये ” पूर्णिमा ” करती हमेशा खुश रहें बच्चे;
इन्हीं के साथ जीवन के सभी सुँदर नजारे हैं।।
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2* समय बड़ा बलवान (नीरजा’कमलिनी’,
गाजियाबाद)

टिक-टिक करती चलती जाती
बिना रुके ये बढ़ती जाती
छूट रहे हैं कितने काम
जल्दी से निपटा लो काम
रखो समय का हरदम ध्यान
है समय बड़ा बलवान।
पहचानो तुम इसका मोल
न समझे तो डिब्बा गोल
कर लो इसका सदुपयोग
व्यर्थ करो न दुरुपयोग
पालन करे,जो उसकी शान
है समय बड़ा बलवान।
ये जीवन का वो सिक्का है
पकड़ा जिसने वो इक्का है
साथ चलोगे सुख पाओगे
बीत गया तो हाथ मलोगे
न जीता इससे पहलवान
है समय बड़ा बलवान।
इसका आदि है न अंत
समय का पहिया है अनंत
जीवन-मरण भी इसके हाथ
हार जीत भी इसके साथ
आधीन इसके,भूत भविष्य वर्तमान
है समय बड़ा बलवान।
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3* नन्हीं चिड़िया (डॉ प्रिया सूफ़ी,होशियारपुर)

कौआ कबूतर तोते से
भरा हुआ है आसमान
नन्हीं मुन्नी चींचीं करती
भूल जाओ अब
चिड़िया का नाम।
सुबह सवेरे उठ जाती थी
चींचीं कर सब को
जगाती थी,
जाने क्या कहती
जाती थी
भूल गए उस समय का
भान,
याद आया क्या
चिड़िया का नाम !?!
चिड़िया हम से
क्या लेती थी
कीड़े-मकौड़े सब
चुन लेती थी
थोड़े बहुत अनाज के दाने
कुछ रोटी के टुकड़े पाने
तिनके छिलके चीथड़े पुराने
बस इतना सा था
उसका दाम
हाय !! कहाँ है अब
चिड़िया का नाम !!
शहर फ़ैल कर बिखर रहा है
खेत-खलिहान सब निगल रहा है
चिड़िया भटक कर मर रही है
घर में भी अब घर नहीं है
कहाँ माँगा था,उसने दान
भूल जाओ अब
चिड़िया का नाम!!
पांखी सारे डरे हुए हैं
सहमे से सब खड़े हुए हैं
कौन कहाँ कब लील ले जाये
मानव सारे भील हुए हैं
संभल जाओ अब ,
समय नहीं है,
क्यों भूले मानव का काम
अब तो ले लो
चिड़िया का नाम!!
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4* बाल दिवस ऐसे मनायें (कविता)अनीता मिश्रा “सिद्धी”,हजारी बाग (झारखंड)

बाल -दिवस पर हर साल
बस खाना -पूर्ति करते हैं
शाला में भाषण देकर ,
नेता अपनी जेब भरते हैं ll
कितने ही निरक्षर, गरीब बच्चे
किताब ,कलम देख न पाते हैं ll
भर -पेट भोजन और तन पर वस्त्र नहीं ,
बालमन क्या पढ़ाई करे?
भूख -गरीबी लाचारी से जीवन हुआ त्रस्त
कैसे स्कूल की तैयारी करे ll
बाल -दिवस हो तभी सफल ,
सभी बच्चो को मिलें समानाधिकार ,
शुल्क कम हो नामांकन का ,
उच्च-शिक्षा पर सबका अधिकार हो ll
इस वर्ष “”बाल-दिवस””ऐसे मनायें
एक गरीब -बच्चे को मिलकर पढ़ायें,
नेक इंसान बनाये ll
पहल हम स्वयं करे,
कारवाँ बन ही जायेगा ।
अगले “”बाल-दिवस””तक
एक नया मुकाम मिल जायेगा ll
आओ सभी मिल संकल्प करे
“”बाल-दिवस””पर अनाथ-गरीब बच्चों पर
कुछ खर्च करें ,भविष्य संवारे ,नाम निखारें ,
उन पर भी कोई गर्व करे ।।
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5* काश!! डॉ.हरिभजन प्रियदर्शी,
मलोट, जिला श्री मुक्तसर साहिब

काश मैं फिर बालक बन जाऊँ।
उन्मुक्त गगन में उड़ कर गाऊँ।।
सबका मनमोहक मैं बन जाऊँ।
बाल रूप निरबैर कहलाऊँ।।
ईर्ष्या-द्वेष के भाव मन में न आवै ।
जाति-धर्म के बंधन से मुक्त हो जावै।।
सबकीे आँखों का मैं सितारा बनूँ
जगत का राज दुलारा बनूँ।।
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6* मुक्तक (राजकुमार सोनी बाराबंकी,उत्तर प्रदेश)

पहनो कपड़े केवल खादी ।
छोटी कर दो जी आबादी।।
होटल बाजी बंद करो सब;
बंद करो खर्चीली शादी।।(1)
साइकिल पर फिर चढ़ना सीखो।
धीरे-धीरे बढ़ना सीखो।।
लूटमार सब बंद करो तुम;
भ्रष्टाचार से लड़ना सीखो।।(2)
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7* चाँद का विवाह (दीपिका कुमारी दीप्ति, पटना)

विवाह का पैगाम एक जब चाँद के घर आया,
शादी की बात सुनकर चाँद फूले नहीं समाया।
शर्ट-पतलून पहनकर झटपट हो गया तैयार,
टाई लगाकर बना दूल्हा चला दुल्हन के द्वार।
चाँद का रोशन चेहरा सबको आया बहुत पसंद,
शुभ मुहूर्त दिखाने वास्ते पंडित बुलाये तुरंत।
एक टीकाधारी पंडित बोला निकालकर पतरा,
अमावस्या शुभ मुहूर्त है आगे फिर है खतरा।
अब शादी का निमंत्रण चाँद देने लगा घर-घर,
चारों ओर उसकी शादी की फैल गयी खबर।
अमावस्या के दिन चाँद की निकली थी बारात,
हाथी-घोड़े, साज-बाज और ढोल-नगाड़े साथ।
बारातियों के संग दूल्हे की सभी ने ली खबर,
पर दूल्हा ही गायब था आया कहीं नहीं नजर।
बोली दुल्हन खोल के घूँघट विवाह नहीं हो पायेगा,
अमावस वाली रात में चाँद कहाँ से आयेगा।
ये सुनकर सब लोग हुए बहुत उदास,
चाँद का विवाह हुआ न टूटी सारी आस ।।
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8*आह्वान (संजीत सिंह, हरदोई ( यूपी )

जागो उठो लक्ष्य पहचानो
करो वही जो मन मे ठानो
सही मार्ग पर चलना सीखो
परिस्थितियों मे ढलना सीखो
रंग ,चमक को तुम ना जानो
मन के पावन सुर पहचानो
करो वही जो मन मे ठानो |

लोगों से तुम मिलना सीखो
पतझड़ मे भी खिलना सीखो
ये जीवन अनमोल बडा है
पथ दुर्गम जोखिम से भरा है
मत हो निर्भर किसी शाख पर
अपने अंदर के बल को जानो
करो वही जो मन मे ठानो |

पग पग पर संघर्ष कडा है
जीता वही जो सतत चला है
नई राह है ,नई आस आस है
हर पल सुंदर और खास है
नव किरणों से खुद को जगाकर
जागृति को ही जीवन मानो
करो वही जो मन मे ठानो |

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(9) मछली (नीरजा ‘कमलिनी’,गाजियाबाद)

एक मछली ऐसी भायी।
जल छोड़कर पेड़ पे आयी।।
बोली मैं भी फल तोड़ूँगी।
फूलों से माला जोड़ूंगी।।
रेल की पटरी पर दौड़ूंगी।
सरपट दूर देश पहुँचूंगी।।
नए नवल खिलौने लूँगी।
वस्त्र पहन के मैं मटकूँगी।।
चिड़ियाघर मैं भी आऊँगी।
आज नहीं तो कल जाऊँगी।।
बर्गर पिज्जा मैं खाऊँगी।
पिकनिक भी खूब मनाऊँगी।
अचानक सर-सर हवा चली।
डर के मछली फिर दौड़ पड़ी।।
इधर-उधर कुछ वो ढूँढ रही।
देख के पानी बस कूद पड़ी।
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10*मेरा बेटा (रंजना नौटियाल,दिल्ली)

वो अब संभलने लगा है
दिल उसका ठहरने लगा है
रहता है कभी खुश तो
कभी गुमसुमी में है डूबता
मौसम की मानिंद बदलने लगा है
वो अब संभलने लगा है
न ही शैतानी है बातों में
न ही चंचलता सी उछल-कूद
न वो कहता है सब है मेरा
मन तन्हाई को मचलने लगा है
वो अब संभलने लगा है
है उम्र चढ़ी यौवन की उस पर
अक्स अपना सा लगने लगा है
बार-बार देखे आईना वो
खुद से प्यार वो करने लगा है
अब न भाये महफिल ,घर , रिश्ते
दोस्तो के रंग में घुलने लगा है
आँखों मे सपने बसने लगे है
उङान ऊँची है पर चिकने है
कमर अपनी वो कसने लगा है
वो अब संभलने लगा है
हौंसलो की डगर पर कदम हैं
उसके जो बढ़ने लगे
एक दिन पूरे करेगा सपने
वो सारे अपने और मेरे
वो अब संभलने लगा है
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11* दोहे (डॉ – अरुण श्रीवास्तव,
सीहोर, मध्यप्रदेश)

बाल दिवस पर आज सब ,इतना रख लो ध्यान ।
मुखड़ों पर हरदम रहे,बच्चों के मुस्कान ।।*1
भोलापन उनका सदा ,बना रहे दिन रात ।
जीवन में हरदम रहे ,नूतन नवल प्रभात ।।*2
जीवन का उनके तमस ,चलों मिटायें आज ।
जिससे वह भी रच सकें ,सुन्दर स्वस्थ समाज ।।*3
बाल दिवस पर आज दें ,बच्चों को आशीष ।
बनी रहे संवेदना ,कष्ट हरें सब ईश ।।*4
बनी रहे मासूमियत ,सबका ही हो ध्यान ।
नये दौर में तब चले ,मेरा हिंदुस्तान ।।*5
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12* अनिरुद्ध (कविता) डॉ.पूर्णिमा राय

सीधा-सादा शांत अनिरुद्ध;
हर पल हँसता रहता है।।
अपनी मीठी बोली से वे
सबके दुख को हरता है।।
रोज सवेरे जल्दी उठकर;
ब्रश मंजन सब करता है।।
हाथ साफ कर खाना खाता;
स्वच्छ देह को रखता है।।
सूरज चंदा प्यारे लगते;
उनके जैसे सजता है।।
गल्ती करके सॉरी बोले;
मात-पिता से डरता है।।
मैडम उसको अच्छी लगती;
सारा होमवर्क करता है।।
अभी दूसरी कक्षा का ही ;
सपनों में रँग भरता है।।
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13* बाल-व्यथा (मेहरू पण्डित प्यासा)

बाल-दिवस पर बच्चों से जब ऐसे खेला जाता है।
देख-देख कर हाल नहीं मन में अब झेला जाता है।
जो निर्धन बच्चों से घर निज में पोंछा लगवाते हैं।
वो चंद लोग बाल दिवस पर भाषण देने आते हैं।
सारा दिन ही तो गँंदगी को हाथ लगाया जाता है।
कूड़ा बीन बीन कर फिर घर बार चलाया जाता है।
पेट भराई खाने में ये बस दुख पीते गम खाते हैं।
कितने बच्चे साल भर में कुपोषण से मर जाते हैं।
जितने बच्चे काम करें हैं नित होटल औ ढ़ाबों में।
बचपन सारा गुजर गया बस सपनों और ख़वाबों में।
खेल खिलोने इन्हें न भाते झाडू बर्तन भाते हैं।
छोटी सी बाल उम्र में मेहनत की रोटी खाते हैं।
मज़दूरी करते बहुमंजिला इमारत बनवाने में।
मगर गर्व होता हैं अपनी झुग्गी में सो जाने में।
आओ हम भी मिलकर सारे काव्य-धर्म अपनाते हैं।
बाल-दिवस पर हम लिखकर अब दुख इनका दर्शाते हैं।
********************************

14*बाल दिवस की शुभकामनाएँ :
आज भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्व• पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म दिवस है…

उन्हें बच्चों से अगाध प्रेम था..स्कूल , मेले , पडो़स एवं हर उस जगह जहां उन्हें छोटे बच्चे मिल जाया करते वो अपना प्रेम उन पर लुटाते..उन्हें गुब्बारे , खिलौने देते..सभी बच्चे उन्हें प्यार से चाचा नेहरू कहने लगे…बच्चों से प्रेम की पराकाष्ठा की सीमा पर चाचा नेहरू ने कहा कि मेरा जन्मदिन अब बालदिवस के रूप में मनाया जाएगा..तब से आज तक प्रतिवर्ष १४ नवम्बर को बालदिवस के रूप में चाचा नेहरू का जन्मदिन पूरा भारतवर्ष मनाता है…
आज हम सुबह जागे ..टेबल पर चाय के साथ अखबार मिला ..चाय की लम्बी चुस्कियों के साथ हमने अखबार पढा़…प्रथम पृष्ठ पर ही बालदिवस की शुभकामना थी…बाल दिवस के दिन बच्चों की खुशियां बढ़ जाती हैं …स्कूल , कालेज, और सभी अन्य संस्थाएं जहां बच्चे रहते हैं शिक्षा प्राप्त करते हैं आज सभी बालदिवस की खुशियाँ मना रहे हैं…मंत्री नेता प्रशासन सब आज भारत के सभी बच्चों को बालदिवस की शुभकामना देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं…क्या हम भूल गए कि जो अखबार सुबह हमारे घर में फेंक गया, जो बाजार में ,फुटपाथ पर सड़कों में भीख मागते हैं, जो होटलों में प्लेट साफ करते हैं..बडे़ दफ्तरों में दफ्तर के बाहर लगे चाय के ढाबे से चाय लेकर देने जाते हैं…वो आफिस सरकारी हो या प्राइवेट.हमें तो चाय पीने से मतलब है..क्या फर्क कि वो चाय लाने वाला कौन था…हमें तो दस रूपये का पान गुटखा खाकर थूंकने से मतलब है..हम क्यूँ दें किसी भिखारी को एक दो रुपए भले वो बेबस लाचार बच्चा क्यूँ ना हो..
हमें क्या फर्क कि जूते पॉलिस करने वाला कौन है…हमारे इरादों में चमक भले न हो जूतों में चमक होनी चाहिए…
फुटपाथ पर कचरों में कबाड़ बिनने वाली कोई बच्ची हो या बच्चा हम क्युँ देखें…हमारे बच्चे तो ऐश्योआराम में हैं ….हर जगह बाल श्रम ..शोषण बच्चों का…क्या आज बाल दिवस के दिन सभी बच्चे खुशियां मना रहे हैं….क्या सब खुश हैं…नहीं….
आज हमारी सरकार अरबों रूपयों सड़क ,बिजली,पानी, और कई विभागों को देती है….महिला एवं बालविकास विभाग को भी करोडो़ अरबों रुपए मिलते हैं…बाल विकास …वाह…क्या सरकार कोई ऐसा कानून, ऐसा नियम, या समाज में हो रहे बच्चों का शोषण बाल श्रम, भीख मांगना..बन्द नही कर सकती…अगर सरकार हर उस बच्चे को पढा़ने लिखाने का जिम्मा उठा ले जो लाचारी..मजबूरी..और अशिक्षा के अभाव में कबाड़ बिनते, भीख मागते , और प्लेट धोते नजर आते हैं…तो हम सभी भारवासियों को वाकई बालदिवस की खुशियां मनाने का हक है…..वरना आज निकलना किसी ढाबे में, बाजार मे , फुटपाथ पर, कचरों वाले क्षेत्र में…. पता लग जाएगा…
आशीष पान्डेय जिद्दी ,

रीवा मध्य प्रदेश
मोबाईल …9826278837
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15*जरा सोचो(मुक्तक रचना)

(1)
रिक्त उदर भरने की खातिर,फैलाए हैं नन्हें कर।
वसन नहीं है तन ढकने को,बच्चे देखो हैं बेघर।।
नज़र उठाकर देखो उनको,कितने बेबस हैं बच्चे,
चाट रहे हैं जूठी पत्तल,बालदिवस के अवसर पर ।।
(2)
बुरी लत में फँसें जो बच्चे,जीवन अपना खोते हैं,
चोर उचक्कों के तमगे वो ,अपने सिर पर ढोते हैं ।।
दिखला दो पथ उनको भगवन,सुन लो विनती मेरी भी
आखिर बच्चे इस दुनिया में,भगवन के सम होते हैं ।।
(3)

कहती है ममता इस जग से,सोचो कुछ तो जग वालो।
बदलेगी बच्चों की हालत,आज कसम तुम भी खा लो।
समय नहीं अब देता कोई, बाल अकेले रहते हैं
समय मिले जो इक पल तुम को,इन बच्चों को दे डालो।।

ममता बनर्जी

गिरिडीह (झारखण्ड)

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16* गवाही ( लघुकथा)
आज 14नवंबर “बाल दिवस” के रूप में जाना जाता है क्योंकि इस दिन स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू जी का जन्म दिन है।जो बच्चों से बेहद प्यार करते थे।बच्चे प्यार से उनको चाचा नेहरू पुकारते थे।गुलाब के फूल जैसे बच्चों के लिये एक दिन मनाने की पुण्य भावना को चिरस्थाई रखने के लिये ही 14 नवंबर का दिन नियत किया गया था।कहते हैं बच्चे भगवान का रूप हैं।शायद सच भी है।पर समय परिवर्तन के साथ -साथ बच्चों के प्रति समाज के लोगों के बदलते व्यवहार को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।बाल मजदूरी की समस्या दिनोंदिन बढ़ रही है चाहे समाजसेवी संगठन इस दिशा में विशेष सहयोगात्मक रूख अपना रहें हैं फिर भी आये दिन सड़कों पर चार पाँच साल से लेकर 13-14 वर्ष के बच्चे छोटी-छोटी चीजें –मूँगफली,चने,झंडे,गुब्बारे ,दिये ,समाचारपत्र आदि बेचते नज़र आ ही जाते हैं।बीते दिनीं हम लोग कार से जा रहे थे ।रास्ते में अचानक जमीन पर एक नुक्कड़ में छोटी सी तरपाल डालकर एक अस्थाई दुकान बनी हुई थी जिसमें मूँगफली,चने गर्म करके बेचे जा रहे थे।सर्दी आ रही है ,सोचा थोड़ी गर्म मूँगफली खरीद ली जाये।यही सोचकर गाड़ी रोक ली।जब मैं सामान लेने के लिए दुकान के पास गयी तो हैरान रह गई ।भट्ठी में आग जल रही थी ।वहाँ तीन बच्चे थे जो महज 3-4-5 साल की उम्र के होंगें।बच्चे हैं ,ये सोचकर मैंने पूछा ,तुम्हारे पिता जी कहाँ हैं?यहाँ कोई बड़ा नहीं हैं ।मेरी बात सुनते ही पाँच साल का बालक फुर्ती से बोला,मैं हूँ न ..इन सबसे बड़ा!! बतायें ,आपको क्या चाहिये?मेरे कहने पर उसके अन्य भाईयों ने शीघ्रता से कुछ चने,मूँगफली गर्म की और लिफाफे में पैक कर के बनते हुये रूपये मेरे हाथों से लेकर बाकी के मेरे हिस्से के रूपये मुझे पूरी समझदारी से वापिस कर दिये। मैंने पूछा,कौन से स्कूल जाते हो ?तब वह बोले,हम नहीं स्कूल जाते ।बिना स्कूल जाने वाले बच्चों की होशियारी देखकर मैं दंग रह गई।मात्र चड्डी ही पहने हुए वे बच्चे बाल दिवस की गवाही नित्य- प्रतिदिन दे रहे थे।उन बच्चों का अक्स आज भी मेरी आँखों के समक्ष घूमता रहता है ।आज के माहौल में सामान्य जन अपने बच्चों का ही पालन पोषण अच्छे से कर लें,इतना ही काफी है।गरीबों और वंचितों के बच्चों को और कुछ नहीं दे सकते तो मात्र प्रेम और अपनत्व के दो बोल ही सुना दें ,शायद इससे उन बच्चों के जीवन का खालीपन भर जाये।उनके मुरझाये चेहरें खिल जायें!!एक प्रयास सिर्फ एक बार!!
…डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।
*********************************

संकलित एवं संपादित
…डॉ.पूर्णिमा राय
शिक्षिका एवं लेखिका
अमृतसर(पंजाब)
drpurnima01.dpr@gmail.com

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