प्रेम संग एकता (दोहे)

0
20

दोहे (सुशील शर्मा )

प्रेम सदा मन राखिये, मानवता हो धर्म।
बन मिसाल उपकार की ,रहे एकता मर्म।

नफरत के बाजार में ,लिए प्रेम के फूल।
सत्य समन्वय शुचि सदा,मानवता हो मूल।

पाखंडों में है बसा ,दुनिया का व्यवहार।
मानवता कायम रहे ,सत्कर्मों की धार ।

बन मिसाल इंसान की ,कर्म साधना धार।
प्रेम एकता बाँट कर ,मानवता व्यवहार।

मज़हब है इंसान का ,प्रेम और आनंद।
जाति धर्म में बाँट कर ,लगा लिए पैबंद।

प्रेम बिका ममता बिकी ,बिका मान सम्मान।
मानवता दिखती नहीं ,दिखता है अभिमान।

साहित्यिक सब हो रहे ,चबली चोर चकार।
प्रेम मगन चोरी करें ,रचनाओं की धार।

जीवन के उत्कर्ष का ,मात्र एक सिद्धांत।
प्रेम समन्वय एकता ,ज्ञान और वेदांत।

 

Loading...
SHARE
Previous articleसमझ न पाये वो हमारे दिल-औ’-जज़्बात कोby Dr.Purnima Rai
Next articleएक जुमला नया उछाला है!!
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here