समझ न पाये वो हमारे दिल-औ’-जज़्बात कोby Dr.Purnima Rai

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समझ न पाये वो हमारे दिल-औ-जज़्बात को!by Dr.Purnima Rai

समझ न पाये वो हमारे दिल-औ-जज़्बात को
तड़पता रहा दिल हमेशा हर दिन हर रात को।।
नाकाम रही हर कोशिश उन्हें अपना बनाने की
हम भी भुला देंगे जनाब पहली मुलाक़ात को।।
बेवजह यूँ इन्तजार करते रहे चकोरी मानिंद
इस बरस भी हो न पाया मिलन बरसात को।।
गम में भी खुशी पाने की चाहत रखते हैं साकी
धूमिल न होने देना कभी अपने ख़्यालात को।।
पनपे मुहब्बत वफा की सरजमीं पे “पूर्णिमा “,
क्यों सह नही पाते रिश्ते छोटे-बड़े आघात को।।


डॉ पूर्णिमा राय
2/10/18

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